श्रृंखल विहीन पलों में, उत्ताल नदी
ग्रास कर जाती है सब कुछ, घर -
द्वार, बरामदा से ठाकुर -
दालान, आँगन का
बागान, नदी,
सह -
अस्तित्व में रह कर भी बहुत कुछ
चाहती है ख़ुद के लिए एक
स्वाधीन आसमान।
नदी अपने गर्भ
में रखना भी
जानती
है
बहुत कुछ और अगर कोई उसे करे
अपमानित, तो उगल जाती है
तलछट की तमाम काई -
भरी रेत, विनिमय
से बंधी है ये
सृष्टि,
नदी हो या स्त्री, हर एक को चाहिए -
प्रतिदान, अगर वो देना जानती
है तो उसे छीन लेना भी
आता है, चाहे हो
अन्तस्थ की
निर्मलता
या
खोया हुआ आत्म सम्मान, नदी युगों
से रखती है अपने सीने में नव -
युग का आह्वान, हर एक
को चाहिए, कुछ न
कुछ प्रतिदान।
* *
- - शांतनु सान्याल

बहुत सार्थक।
जवाब देंहटाएंधनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ आपको।
हार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
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