एक दिन ज़रूर आएगा,वो अनागत
प्रभात, जिसके आँचल में पुनः
मुकुलित होंगे, आसन्न
प्रजन्म के प्रसून,
उस दिगंत
रेखा
से फिर उभरेगा नव युग का सूरज
अकस्मात, उस कच्ची धूप
की वादी में फिर उड़ेंगे
सहस्त्र पारदर्शी
तितलियां,
खिलेंगे
सभी
चेहरे नई उम्मीद के साथ हाथों में
उठाए नव सृजन की पताकाएं,
खुल जाएंगे उस मन्नत
की सुबह, ज़ुल्म ओ
सितम की
बेड़ियाँ,
उस
प्रातः के वक्ष स्थल से होंगी नव -
जात स्रोत का उदय, सभी
अभिशापित प्राणों को
मिलेगा नवीन
जीवन का
वरदान,
उस
अयाचित काल में हम तुम रहें न
रहें, लेकिन पृथ्वी की गोद
में उभरेंगे सदियों से
दबे कुचले वो
सभी बीज
जो
अंकुरित हो न सके, पुनः किशलयों
में बिखरेगी, बूंद बूंद अदृश्य
सत्ता की ओस, सभी
नकारात्मक सोच
का होगा एक
दिन पवित्र
हृदयों
से सदा के लिए प्रस्थान, इसी धरा
से पुनः जन्म लेंगे छायादार
वृक्ष महान - -
* *
- - शांतनु सान्याल

आशा जगाता सृजन।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 30 नवंबर नवंबर 2020 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (३०-११-२०२०) को 'मन तुम 'बुद्ध' हो जाना'(चर्चा अंक-३९०१) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुंदर।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंआशावादी भावों को पिरोकर सुंदर सृजन किया है आपने।
जवाब देंहटाएंअद्भुत शब्द संयोजन।
अप्रतिम, अभिनव।
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंअति सुंदर प्रस्तुति ।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
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