07 नवंबर, 2020

भस्मीभूत शहर तक - -

कोई वादा नहीं निभाता, निभाना इतना
आसान भी नहीं, ये सभी जानते हैं
फिर भी शिष्टाचार के तहत
वादा किए जाते हैं,
कुछ फूल के
गुच्छे,
कुछ
मौसमी फलों की टोकरी, चेहरे में एक
अजीब सी आकृति, सुख - दुःख
के बाद का एक रहस्यमय
चरित्र, जो कांधे पर
हाथ रख कर,
अस्पष्ट
लहज़े
में
कुछ कहता है, जिसे उसके सिवा कोई
नहीं जानता, खिड़की के उस पार
वसंत नहीं रुकता, सड़क के
किनारे कोई देर तक
इंतज़ार नहीं
करता,
देह
की परछाई बढ़ते जाती है, लेकिन - -
भीतर का स्रोत सिमटता चला
जाता है, अंतोगत्वा सभी
जाने पहचाने दरख़्त
बेलिबास होते
जाते हैं
क्यूँ
न हों. मौसम के साथ बदलना भी तो
ज़रूरी है, कोई अपना वादा नहीं
निभाएगा, दुःख करने से
कुछ न होगा, रात के
आवाज़ में एक
कड़ुवाहट
है वो
साफ़ लफ़्ज़ों में कहती है,कि तुम्हारा
प्रवास ख़त्म हुआ, आग्नेय पथ
से तुम्हें आगे बढ़ते जाना
है भस्मीभूत शहर तक,
कोई वादा नहीं
निभाएगा,
तुम्हें
तनहा पूरा करना है ये सफ़र, तुम्हारे
साथ कोई भी न आएगा - -

* *
- - शांतनु सान्याल


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