नदी हर मोड़ पर ख़ुद को मोड़ लेती
है, कभी इस किनारे लहलहाते
धान के खेत, कभी उस
किनारे रेतों के देश,
छोड़ जाती है।
हम बढ़ते
जाते
हैं हर पल नवीनता की ओर, जिसका
कोई भी सीमान्त नहीं, स्वप्न
हो या सत्यानुभूति, सिर्फ़
इस पल में है कहीं
सभी समाहित,
शून्य
के सिवा कुछ भी इसके उपरांत नहीं।
ये सही है, कि मैं घिरा हुआ हूँ
सघन मेघों के हाथ, ये
न ही बरसेंगे, न ही
तूफ़ान को देंगे
निमंत्रण,
कुछ
प्रहरों का है आतंक, सूरज डूबते ही -
ये क्रमशः पा जाएंगे किसी
चित्रकार का आमंत्रण।
आस्था की सतह
होती है बहुत
ही नाज़ुक
टूटने
में
एक पल है काफी, जोड़ने में उम्र ही
न गुज़र जाए, अतीत के कोहरे
में जो खो गया सो गया,
उसे ढूंढने में कहीं,
वर्तमान हमें ही
न बिसर
जाए।
* *
- - शांतनु सान्याल

जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२८-११-२०२०) को 'दर्पण दर्शन'(चर्चा अंक- ३८९९ ) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंएक पल है काफी, जोड़ने में उम्र ही
जवाब देंहटाएंन गुज़र जाए, अतीत के कोहरे
में जो खो गया सो गया,
उसे ढूंढने में कहीं,
वर्तमान हमें ही
न बिसर
जाए।
वाह!!
उम्दा।
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंअतीत के कोहरे
जवाब देंहटाएंमें जो खो गया सो गया,
उसे ढूंढने में कहीं,
वर्तमान हमें ही
न बिसर
जाए।
एकदम सटीक...लाजवाब सृजन
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंसुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबेहद नाजुक अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंनदी हर मोड़ पर ख़ुद को मोड़ लेती...
जवाब देंहटाएंबहुत खूब...
बहुत खूब...
बहुत खूब...
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएं
जवाब देंहटाएंआस्था की सतह होती है बहुत ही नाज़ुक टूटने में एक पल है काफी,जोड़ने में उम्र ही न गुज़र जाए।
सही कहा आपने।
आस्था और विश्वास एक नाज़ुक डोर ही है कौन सा प्रहार उसे खण्ड़ित कर दें,और वापस उस अवस्था को प्राप्त करना बहुत कठिन है।
यथार्थ चिंतन।
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
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