आज भी उत्तरी आकाश में, पुरातन
सप्तर्षिमंडल, शून्य में लिखते
हैं सनातनी गान, आज
भी बर्फ़ के स्तूप
में जीवन
का
कहीं न कहीं रहता है दबा हुआ मूल -
स्थान, वृष्टि का आदिम गंध,
मुमूर्षु नदी को मरने नहीं
देता, दवाओं को
अदृश्य हटा
कर
दुआएं दे जाती हैं जीवन को प्रतिदान,
मृत्यु अपरिहार्य है अपनी जगह,
ये सोच के क्यों करें रतजगा,
ग़र उसे आना ही है, तो
वो आएगा, हर हाल
में अदृश्य किसी
अनाहूत -
निर्मेघ
वर्षा
के समान, न कोई दस्तक, न अग्र -
दूत, न अशरीर कोई, न ही मूर्त
अवधूत, आसक्ति सदा से
है अधोगामी, तिर्यक -
गुणन का नहीं
कोई यहाँ
बखान,
सिर्फ़, समय स्रोत में है बहते जाना, -
भूल के सभी अप्राप्त अनुदान,
सप्तर्षिमंडल, शून्य में
लिखते हैं सतत
सनातनी
गान।
* *
- - शांतनु सान्याल

बहुत सुन्दर और सार्थक रचना।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंसुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुन्दर रचना।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
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