26 नवंबर, 2020

शुक्रिया उधार रहा - -

खिड़की के उस पार हो तुम, इस
पार है केवल कांच पर तैरता
विश्वास, दीर्घ यामिनी
है गहराती हुई कोई
नहीं यहाँ, सिवा
मैं और दीर्घ
निःश्वास,
वक़्त
के शाखों से पत्ते झर चले, मेल  
जोल कम हो चली है, वक़्त
भी कुछ बूढ़ा चला है,
डायरी के पृष्ठों
में दबा हुआ
गुलाब
ने
देखा है स्मृतियों का तिल तिल -
मरना, अंधेरे में न जाने
कौन है जो अल्बम
की दुकान
लगा
चला है, खंड विखंडों में जीवन
का बिखराव रुकता नहीं,
ख़्वाब एक टूटा हुआ
आईना है हर
प्रश्न का
उत्तर
देता नहीं, कोहरे में गुमशुदा सी
है अहसासों से बड़ी वो नेह
की नदी, उस पार कोई
खड़ा भी है या नहीं,
कहना है बहुत
कठिन, ये
कौन
है अदृश्य नाविक, हाथ थामे मुझे
पार कर गया, शुक्रिया कहें
तो किस से, उसकी
छुअन के सिवा
अब कुछ
भी
दिखाई देता नहीं, ख़्वाब एक टूटा
हुआ आईना है, हर एक प्रश्न
का उत्तर देता
नहीं।

* *
- - शांतनु सान्याल


6 टिप्‍पणियां:

  1. खिड़की के उस पार हो तुम, इस
    पार है केवल कांच पर तैरता
    विश्वास !
    सुंदर उपमाएँ, सुंदर रचना।

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  2. कोहरे में गुमशुदा सी
    है अहसासों से बड़ी वो नेह
    की नदी, उस पार कोई
    खड़ा भी है या नहीं,
    कहना है बहुत
    कठिन, ये
    कौन
    है अदृश्य नाविक, ....।बहुत ख़ूब...।सुंदर सृजन...।

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