इस मिलन बिंदु से, बहुत दूर है समुद्र
का अन्तःस्थल, अभी हमें बहते
जाना है अनवरत, बहुत
कुछ आँखों से रहते
हैं ओझल,
किंतु
उनका अस्तित्व होता है अपनी जगह
यथावत। रात ढल चुकी है तो
क्या हुआ, उजालों ने ढक
दिया है, तारों का
पटल, अभी
तक बहुत
दूर है
समुद्र का अन्तःस्थल। समय वृत्त के
किसी एक बिंदु में, एक मुद्दत के
बाद हम मिले हैं, ज़रूरी है
रखना मध्य अपने,
थोड़ा सा शून्य -
स्थान, मुझे
उतरना
है
अगले फेरी घाट में, और तुम्हें जाना है,
शायद किसी अज्ञात स्थान, पृथ्वी
नहीं रूकती है कभी, अपने
अक्ष में, आवर्तन उसका
चरम धर्म है फिर
भी हम तुम,
मंदिर -
शिखर, नदी पहाड़, जंगल समुद्र, सीप
मोती, बहुलावन के वही शुक सारि,
सुख दुःख, सब कुछ अपनी
जगह हैं विद्यमान,
ज़रूरी है रखना
मध्य अपने,
थोड़ा सा
शून्य -
स्थान - -
* *
- - शांतनु सान्याल

जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज सोमवार (१६-११-२०२०) को 'शुभ हो दीप पर्व उमंगों के सपने बने रहें भ्रम में ही सही'(चर्चा अंक- ३८८७) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी
दीपोत्सव की असंख्य शुभकामनाएं सभी को ।
हटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
'ज़रूरी है
जवाब देंहटाएंरखना मध्य अपने,
थोड़ा सा शून्य -
स्थान..'
-बहुत ज़रूरी है.
दीपोत्सव की असंख्य शुभकामनाएं सभी को ।
हटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
सुन्दर
जवाब देंहटाएंदीपोत्सव की असंख्य शुभकामनाएं सभी को ।
हटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
थोड़ा सा शून्य भी ज़रूरी है...
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना।
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
हार्दिक आभार - - नमन सह।
हटाएंथोड़ा सा शून्य स्थान में मानो गागर में सागर छिपा है।
जवाब देंहटाएंशुभ दीपावली।
हार्दिक आभार - - नमन सह।
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