काठ का पुल था कदाचित कोई, अदृश्य
घातों ने ढहा दिया, समय की नदी
कहाँ रूकती है, उस पार के
गगनचुंबी पहाड़ियों
में रहते हो कहीं
तुम, हमारा
माटी से
बंधे
रहने के सिवा कोई उपाय नहीं, नियॉन -
से हैं रौशन तुम्हारे ख़्वाबों के बरामदे,
लेकिन मिट्टी के दीयों में रखते हैं
हम ख़ुशियों की लौ सभी के
लिए, कभी उतरो ऊँची
उड़ानों से नीचे,
बहुत नेक
दिल है
ये ज़मीं, मुस्कानों से खुलते हैं अक्सर
यहाँ फूलों के दरीचे, धुंधली आँखों
मैं तैरते हैं उजानमुखी नाव,
बरगद, घाट, मंदिर -
शीर्ष, गोधूलि में
नदी गुलाल,
आँगन
के मध्य तुलसी वृन्दावन, साँझ ढले - -
बढ़ती जाए आत्मीयता की छाँव।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंआपकी इस प्रस्तुति का लिंक 5.11.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
दिलबागसिंह विर्क
हार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 5 नवंबर 2020 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंबहुत सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंबेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंबहुत सुंदर अहसास समेटे अभिनव सृजन।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
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