इतने ख़ेमों में बँटे हुए हैं हम
कि समझ में ही नहीं
आता कौन है
दाहिना
और
कौन है वाम, जिनके हाथों में
हो लाठियां उसी को रहता
है हाँकने का हक़,
और वही
ले
जाता है वधस्थल सरे आम।
अदालतों की अब गोया
ज़रूरत ही नहीं
सुबह शाम
चैनलों
में
बैठे होते हैं तथाकथित लोग
बन के इंसाफ़ के पुजारी,
टी आर पी के लिए है
सिर्फ़ मारामारी,
आम जनता
करे भी
क्या,
जो दिखाते हैं आप वही प्रजा
देखती है बेचारी, असल
में ये सभी हैं छुपे
हुए अफीम के
व्यापारी,
बस
एक घूँट विकास ब्रांड का - -
काढ़ा और भूल जाएं
चिंताएं सारी,
तुम मरो
या
जिओ बला से हमारी, ख़ाली
पेट योग करो और ऊपर
वाले पे छोड़ दो पूरी
ज़िम्मेदारी।
* *
- - शांतनु सान्याल

बहुत बढ़िया।
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह ।
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 02 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह ।
जवाब देंहटाएंसारगर्भित प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह ।
जवाब देंहटाएं