पारदर्शी शरीर लेकर फिर चलो
निकलें प्रस्तरयुगीन नगर
में, असीम शून्य में
है कहीं नक्षत्रों
का महा -
उत्सव, विलीन हो के हम भी
देखें पत्थरों के डगर में,
खुलने को हैं अधीर
हरसिंगार गंध -
कोष, बह
कर
हम भी देखें छायामय प्रहर में,
आरोह - अवरोह से बंधी है
जीवन सेतु, पार हो
लें मिल के हम
भी इस
कुहासा से ढके अंतहीन लहर में,
ये पल हर हाल में हैं अमर्त्य,
जी लें इसे अंतःकरण से,
फिर कभी सोचेंगे
क्या
फ़र्क़ था अमृत और ज़हर में - !
* *
- - शांतनु सान्याल

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 17 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपका हार्दिक आभार - - नमन सह ।
जवाब देंहटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंआपका हार्दिक आभार - - नमन सह ।
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