एक अनिःशेष तृषा लिए सीने में,
जब टूट जाए मध्यरात की
गहरी नींद, तब खुले
खिड़की के पार
मैं खोजता हूँ
टुकड़े -
टुकड़े उल्का आलोक, रात्रि तब
लगती है बहुत असहाय,
लंगड़ाते हुए चली
जा रही हो
सुदूर
ओढ़े हुए सदियों पुरानी गहरी -
काली शाल, न जाने कौन
है खड़ा दिगंत पार
हाथों में लिए
उजालों
का
हार, या वो भी मेरी तरह है मृग
तृषा की शिकार, मैं अपलक
उसे देखता हूँ कौतुहल
से, वो चली जा
रही अकेली,
पत्तों
की तरह झर रहे हैं आकाश से -
तारक वृन्द, और छंट रहे
हैं अभिशापित घने
अंधकार, धीरे -
धीरे
क्षितिज में उभर चले हैं, रंगीन
विप्लवी वर्णमाला, फिर
कोई बढ़ाएगा हाथ,
व्यथित
अहल्या को है युग - युगांतर से
प्रतीक्षा, कोई सुबह तो
ले, पुनः कालजयी
अवतार।
* *
- - शांतनु सान्याल

बहुत सुन्दर गवेषणा।
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंआपकी रचनाएं स्वयं में गहरे भाव लिए
जवाब देंहटाएंजिंदगी का चिंतन हैं।
बहुत सुंदर सृजन।
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंलंगड़ाते हुए चली
जवाब देंहटाएंजा रही हो
सुदूर
ओढ़े हुए सदियों पुरानी गहरी -
काली शाल, न जाने कौन
है खड़ा दिगंत पार...
वाह !!!
भावपूर्ण बहुत सुंदर रचना !!!
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
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