अनंत काल तक मैं लौटना चाहूंगा उसी
नदी के किनारे, जहाँ छूती हों वट -
जटाएं बृहत् नदी के धरातल,
निःसीम आकाश के
तारे जिसके
वक्ष में
लिखते हैं कृष्ण राधा की पदावली, मैं -
जन्म जन्मांतर तक रहना चाहूंगा
उसी घाट के पत्थर में, जहाँ
उजान प्रवाह के नाविक
बाँध जाते हैं अपनी
मयूरपंखी नौका,
मैं बारम्बार
आना
चाहूंगा उसी धूसर गली में,जहाँ खेलते
हैं बच्चे नदी - पहाड़, वहीँ कहीं मैं
छूना चाहूंगा बचपन की जल -
छवि, ग़लत शब्द विन्यास
का प्रथम प्रणय पत्र,
जो अप्रेषित
रहा
आज तक, मैं हज़ार बार आना चाहूंगा
उसी पगडण्डी में, जो जाती है नदी
की ओर, जहाँ से देवी लौट
जाती है कैलाश, उसी
जल गर्भ में डूब
के देखना
चाहूंगा
जीवन का वास्तविक प्रतिबिम्ब - - -
* *
- - शांतनु सान्याल

हमेशा ही तरह सराहनीय सृजन आदरणीय सर।
जवाब देंहटाएंसादर
तहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत उम्दा रचना।
जवाब देंहटाएंपधारें नई रचना पर 👉 आत्मनिर्भर
तहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंतहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंसराहनीय रचना
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह ।
जवाब देंहटाएंवाह!लाजवाब सृजन ।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंआदरणीय शांतनु सान्याल जी, नमस्ते 👏!
जवाब देंहटाएंआपकी इस रचना में अभिव्यक्ति की गहराई है। बहुत सुंदर रचना! मुझे ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं:
वहीँ कहीं मैं
छूना चाहूंगा बचपन की जल -
छवि, ग़लत शब्द विन्यास
का प्रथम प्रणय पत्र,
जो अप्रेषित
रहा
साधुवाद! --ब्रजेन्द्रनाथ
तहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।
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