कोई इस राज्य का बेटा कोई उस
प्रान्त की बेटी, नि:संतान
सा लगे है क्यों देश
मेरा, इतनी
आत्मीयता
पहले
तो देखी नहीं, मैं भिन्न भाषी हूँ -
लिहाज़ा मुझे असमय कोई
अन्न नहीं देगा, मेरे
माथे में लिखा
है प्रवासी
होने
का मुहर, इतनी भारतीयता पहले
तो देखी नहीं, इतनी आत्मीयता
पहले तो देखी नहीं। न जाने
किन क्षितिजों को छूना
चाहते हैं लोग, यहाँ
दो वक़्त की
चिंता
से आगे नज़र जाती नहीं, न जाने
किस अंधी सुई में रेशमी धागा
पिरोना चाहते हैं लोग, न
जाने किन क्षितिजों
को छूना चाहते
हैं लोग।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंआपका आभार, नमन सह।
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जवाब देंहटाएंहाटेशवरी.......
आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
13/09/2020 रविवार को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में. .....
सादर आमंत्रित है......
अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
https://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद
आपका आभार - - नमन सह।
हटाएंआपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (13-09-2020) को "सफ़ेदपोशों के नाम बंद लिफ़ाफ़े में क्यों" (चर्चा अंक-3823) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
--
आपका आभार, नमन सह।
जवाब देंहटाएंवाह!बहुत खूब!!
जवाब देंहटाएंआपका आभार, नमन सह।
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंआपका आभार, नमन सह।
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