तथाकथित मानवता केवल मम त्वम्
में ही परिवृत, धर्म दर्शन, पोथी
पुराण, सब कुछ अधिनायक
के हाथ, हम आज भी
है वंचित अग्नि -
स्नान के
लिए,
युग बदले, इतिहास के पन्ने बदले, -
लोगों ने छुआ चंद्र भूमि लेकिन
हम आज भी हैं अस्पृष्ट,
भटकते हैं लेकर
कांधे में मृत
पार्वती,
दो गज़ ज़मीन भी नहीं श्मशान के लिए,
अपनी लकीरों में ही जीना सब कुछ
नहीं इंसान के लिए। कुबेर का
धन है तुम्हारे पास, जो
चाहे बनालो, लौह
प्रतिमा हो
या गढ़
लो काञ्चन पीठस्थान या कोई बुर्ज -
आलिशान, न निकल पाए अगर
मम त्वम् के आवृत से तो
मुश्किल है करना
मुक्ति स्नान,
अनवरत
स्व परिक्रमा, जिसका नहीं कोई भी
अवसान - -
* *
- - शांतनु सान्याल

बहुत सुन्दर।
जवाब देंहटाएंहिन्दी दिवस की अशेष शुभकामनाएँ।
हिंदी दिवस की असंख्य शुभकामनाएं - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 14 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहिंदी दिवस की असंख्य शुभकामनाएं - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंशुभकामनाएं हिन्दी दिवस की।
जवाब देंहटाएंआपको भी हिंदी दिवस की असंख्य शुभकामनाएं नमन सह ।
जवाब देंहटाएं