अन्धकार से उजाले की ओर
बढ़ते ही, प्रथम अनुभूति
और क्रन्दन का एक
अद्भुत सा मेल
होता
है, नाल से अलग होते ही
ऋणानुबंध का खेल
होता है ।प्रथम
आलिंगन
और
लताओं का बढ़ना, प्रथम
किरण और पंखुड़ियों
का खुलना, सब
कुछ अपनी
जगह होते
हैं पूर्व
निर्धारित, सजलता का
ढलान की ओर बहना,
तुम्हारा मुझे गहरी
निगाह से देखना,
अदृश्य संधि के
तहत ये
सभी होते हैं परिभाषित ।
तिमिर - आलोक के
मध्य कहीं छुपा
है वो स्पर्श,
जो कभी
बना दे मिट्टी को सोना
और कभी स्वर्ण हो
जाए भस्म, बन
जाए कोई - -
अभिशप्त
मृतिका,
उस प्रणय लकीर पर है -
लिखी हुई सृष्टि
की सजल
गीतिका ।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर
जवाब देंहटाएंआपका आभार, नमन सह।
जवाब देंहटाएंभावों की सुन्दर माला पिरोई है आपनो।
जवाब देंहटाएंआपका आभार, नमन सह।
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