गिरते पत्तों के शब्द सुन पाओगे
बहुत क़रीब, जब चेहरे में
उभर आएंगे, लकीरों
के रेगिस्तान,
आरशी का
नगर
अचानक लगेगा जनशून्य, पारद
विहीन नीला आसमान ।
उंगलियों के अग्र भाग
में है कोई सोने की
काठी, कभी
वृद्ध सीने
पर
दुआओं के छुअन तो आज़माओ,
कुछ सहयात्री पीछे कहीं छूट
गए हैं, रात ढलने में
अभी वक़्त है
बाक़ी,
कुछ देर के लिए ठहर तो जाओ ।
मुझे मालूम है, हर तरफ़
है चुप्पी, लेकिन
इतनी
ख़ामोशी भी ठीक नहीं कि दम
ही निकल जाए,आनेवाली
सुबह के इंतज़ार में
यूँ रतजगा
ठीक
नहीं, कल की चाहत में कहीं - -
आज का दिन हाथों से यूँ
ही न फिसल जाए ।
राजा निर्वस्त्र
है, ये सभी
को है
पता, सभी लगे हैं बांधने प्रसंसा
में पुल, कि कितना महीन
है आवरण, वो तुतली
ज़बान है, किधर
जिसने
दिखाया था उसे, नन्हें हाथों से
वास्तविकता का दर्पण !
* *
- - शांतनु सान्याल

आदरणीय शांतनु जी, नमस्ते👏! आपने बाइस्कोप के माध्यम से बहुत से परिदृश्य दिखाए हैं। मुझे मालूम है, हर तरफ़
जवाब देंहटाएंहै चुप्पी, लेकिन
इतनी
ख़ामोशी भी ठीक नहीं कि दम
ही निकल जाए,आनेवाली
सुबह के इंतज़ार में! सुंदर अभिव्यक्ति!--ब्रजेन्द्रनाथ
हार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंवाह।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंआपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 23 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंजिसने
जवाब देंहटाएंदिखाया था उसे, नन्हें हाथों से
वास्तविकता का दर्पण !
सुन्दर
हार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएं