फ़र्श में बिखरे हुए हैं कांच के ख़्वाब,
और मेज पर कुछ इत्र की बूंदें !
उंगलियों में बींधे हैं किसी
के प्रगाढ़ नुकीले स्पर्श,
जगाता हूँ मैं ख़ुद
को आधी -
रात,
नीम बेहोशी से, फिर किसी ने कहा
है बहुत कुछ, वक़्त को रोक कर,
बेहर्फ़, ख़मोशी से। अजीब
सा इक गहरा सुकून
है किसी की गर्म
सांसों में, रूह
बोझिल
लौट
आती है बारहा, बेजान जिस्म को -
जिलाने के लिए, दवा ओ दुआ
के दरमियां है, बहुत थोड़ा
सा फ़ासला, लेकिन
कोई अक्सर
आता है
इन
दोनों के बीच से निकल कर, मुझे
दर्द से मुकम्मल निजात
दिलाने के लिए,
बेजान इस
जिस्म
को
जिलाने के लिए। समेटता हूँ मैं - -
अपना वजूद, रखता हूँ फिर
एक नया ख़ाली इत्रदान
मेज के ऊपर, कोई
ख़ुश्बू मेरे सीने
से पार हो
कर,
भर जाती है ज़िन्दगी का सूनापन
दूर तक - -
* *
- - शांतनु सान्याल
20 अक्टूबर, 2020
इत्रदान - -
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आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" गुरुवार 22 अक्टूबर अक्टूबर 2020 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंसार्थक प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंकभी कभी अपनी ही मनःस्थिति का प्रतिबिंब किसी रचना में देखना हतप्रभ कर जाता है। बहुत गहन भाव।
जवाब देंहटाएंआपके उद्गार कविता को पूर्णता प्रदान करते हैं, आपने बिलकुल सही कहा है, कभी कभी दो विभिन्न व्यक्तियों के मनोभाव में साम्यता होती है, और यही ज़िन्दगी के अनजाने पहलू हैं, हार्दिक आभार - - नमन सह ।
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