26 अक्तूबर, 2020

अंकगणित के बाहर - -

उड़ता हुआ कोई ख़त, ड्रोंगो की तरह
कलाबाज़ी दिखाता हुआ, मेघ को
अपने हाथों, धीरे से सरकाता
हुआ, उतरे कभी अधपके
धान के दहलीज़,
ओस की बूंदों
से है लिखा
हुआ,
मेरे घर का पता, सुख गंध को तुम -
बांट देना सभी को, चाहे हो
कोई अनाम परिंदा, या
सदियों से मौन
खड़ा, मेड़ों
पर एक
टक
देखता मेरा मित्र बिजूका ! दुःख की
तलछट रहने देना, जीवन नदी
के अतल में, बिखेर देना
ख़ुशियों की हेमंती
धूप, नभ - जल -
स्थल में,
वो
शून्य, रिक्त लिफ़ाफ़ा है, मुझे मंज़ूर,
जो दे आया हो, तमाम उदास
चेहरों को, ख़ुशियां भरपूर,
खोल दी है, आज मैंने
बंद मुट्ठी, हालांकि
तिर्यक रेखाओं
के सिवा
यहाँ कुछ भी नहीं, विकल्प है तुम्हारे
उँगलियों के अग्र भाग, निःस्व
होना भी, आत्म सुख से
कुछ कम नहीं,
समय की
तीस्ता
नहीं
रूकती किसी के लिए, सभी अंकीय -
वस्त्र, उतार कर मैंने ली है गहन
डुबकी, उभर गया तो सुबह
मिलेंगे, ग़र डूब गया
तो मेरी नियति।
* *
- - शांतनु सान्याल













13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर मंगलवार 27 अक्टूबर 2020 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. शांतनु जी ... नमस्कार,

    सुख गंध को तुम -
    बांट देना सभी को और दुःख की
    तलछट रहने देना, जीवन नदी
    के अतल में...वाह अध्यात्म और काव्य का इस तरह सम्म‍िश्रण...बहुत खूब ल‍िखा

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  3. देखता मेरा मित्र बिजूका ! दुःख की
    तलछट रहने देना, जीवन नदी
    के अतल में, बिखेर देना
    ख़ुशियों की हेमंती
    धूप, नभ - जल -
    स्थल में,...वाह !बेहतरीन सृजन सर।

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति! हार्दिक साधुवाद!--ब्रजेन्द्रनाथ

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