24 अक्तूबर, 2020

पुरातन कथा नए जिल्द में - -

इस मायावी शहर से निकलती नहीं
कोई चोरगली, खोजता हूँ मैं,
आधी रात, कोहरे में
तैरता हुआ एक
मुट्ठी, नील -
आकाश,
यूँ तो,
तुम हो, मेरे सांसों के बेहद क़रीब, -
फिर भी ज़िन्दगी, छूना
चाहती है, उड़ते हुए
ज्वलंत फ़ानूस,
कुछ ओस
में भीगे
हुए
सुरभित आभास। कहाँ पर जा उतरती
हैं ये प्रणय सीढ़ियां, धुंध में गुम हैं
हिमगिरि की चोटियां, तुम्हारे
सारे देह में हैं टिमटिमाते
जुगनुओं के लिबास,
कहाँ पर है इस
सफ़र का
अंतिम
सिरा, मुझे नहीं ज़रा भी उसका, कोई
एहसास। तुम्हारा निशांत से पूर्व
यूँ वन्य लता हो कर, जिस्म
ओ रूह को जकड़ लेना,
तोड़ देता है ऊँचे
चिनार का
अदृश्य
सन्यास, स्वर्ण हिरण की तरह रात्रि
धीरे - धीरे, देहान्तर की ओर है
अग्रसर, क्षितिज का कोई
अनाम तारा लिखता
है रात की कहानी,
मैं और तुम
वही
पुरातन दो चरित्र हैं अपनी जगह - -
सुबह के जिल्द में हैं बंद, कुछ
ख़ूबसूरत लम्हों के अज्ञात
विन्यास।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

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