कई बार जी चाहता है, समय को बांध दें,
किसी रंगीन पतंग के साथ, उड़ा
दें, महानगर के आकाश,
काट दें, निरर्थक
सिलेबस
की
डोरी, उड़ने दें ज़िन्दगी को उन्मुक्त नील
मलंग के साथ। कई बार मन करता
है, दौड़ कर जाएँ, सुदूर बर्फ़ की
वादियों में, हटा दें सभी
श्वेत अवसाद की
परतें, झांक
कर
देखें, उसके सीने की हिमनदी और कुछ
नग्न चिनार, ज़िन्दगी को गले
लगाएं, किसी और ढंग के
साथ। कभी कभी
दिल करता
है उतार
आएं
सभी ज़ख्मों के लिबास, ओढ़ लें सारे -
जिस्म पर जलप्रपात, उभरने दे
दिल की गहराइयों से कोई
इंद्रधनुष अकस्मात !
बूंदों के पैरहन
हों, हज़ार
रंग
के साथ, भीगने दें ज़िन्दगी को किसी
अवमुक्त सारंग के साथ - -
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंसुन्दर रचना।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंअद्भुत
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
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