कुछ भी न मिल पाएगा, चाहो तो ढूंढ लो,
कुंडी विहीन है, जीवन का संदूक, बस
कुछ है तो बाट जोहते अंधियारे,
तह किए हुए कुछ पुराने
गंध की किताबें,
कुछ उतरती
धूप की
टूटी
मेहराबें, झांकते हैं रिश्तों के कुछ काग़ज़ी
फूल, उड़ रहे हैं पीले पत्ते, बेतरतीब
से बिखर चलें हैं ख़तों के टुकड़े,
कोई चल रहा है एकाकी,
रेल की पटरियों के
सहारे, सिर्फ़
कुछ है
तो
बाट जोहते अंधियारे। तुम्हारे चश्में का
नंबर ज़रूर अलहदा है लेकिन, सच
है, कि वो भी नहीं बदल सकते
सामने का परिदृश्य, हम
ज़िन्दगी किसी और
से बदल, तो नहीं
सकते, फिर
भी किसी
रोज़,
तुम्हारी आँखों से नयी सुबह देखेंगे
अवश्य, अभी तो लेकिन नहीं
बदल सकते सामने का
परिदृश्य।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंवाह, क्या खूब लिखा है आपने।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
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