बचपन से उम्र के आख़री पड़ाव
तक श्रेणी भेद मिट न
सका, सूती कपड़ा
बल्कि अमीरों
का शौक़
बन
गया, रफू वाले रिश्तों को हाथ -
से ढकने की अब ज़रूरत
नहीं। वही तने हुए
वक़्त के तंबुओं
में जागती
है रातें,
घूमती हुई रंगीन तख़्ती पर वही
चाकुओं की बौछार, उनके
लिए आजन्म सुरक्षित
है दर्शकों की पहली
क़तार, सभी
जानते
हैं उतरन की चमक, हर एक -
को परिचय देने की अब
ज़रूरत नहीं । दायरा
घटाना या बढ़ाना
उनके बाएं
हाथ का
है खेल, उनका हर एक क़दम -
है उनका अपना संविधान,
अभी तक है ज़िंदा
हमारा भी
आत्म -
सम्मान, हर एक से सलाह - -
लेने की अब ज़रूरत
नहीं । ये वही
लोग हैं
जो
डूबते जहाज को सब से पहले
छोड़ जाते हैं,ये वही लोग
हैं जो ख़ुद क़ानून
बना कर
सरे -
आम तोड़ जाते हैं, टेरिलीन - -
का ज़माना गुज़र गया,
इनसे डरने की अब
ज़रूरत नहीं ।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
जवाब देंहटाएं