कोई नक़ाबपोश चेहरा, निगाहों से सलाम दे गया,
ख़ुश्बुओं की तरह, बिखरने का इक पयाम दे गया,
मुहाजिर परिंदों के मानिंद उड़ते थे सरहदों के पार,
मबहम दायरों में कोई, मुस्तक़िल मक़ाम दे गया,
ख़ानाबदोशों की तरह थी, इस ज़िन्दगी की रवानी,
तोहफ़े में ग़ार ए नशीनी, कोई सुबह शाम दे गया,
यूँ तो आइना है, अपनी जगह बरसों से मुस्तक़ीम,
अक्स को तलाशने का, इक नया सा काम दे गया,
तन्हाइयों में अक्सर, अपने से बात किया करते हैं,
दीवानगी हद से बढ़े, इस की दुआएं तमाम दे गया,
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- - शांतनु सान्याल

बहुत ही सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार आपका ।
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