चेहरों के साथ मुखौटों का भी होता है निरंतर
बदलाव, रात के सीने पर बढ़ता जाता है
रहस्य का गहरा जमाव, हमारी
तलाश सिर्फ़ नारी पुरुष तक
आ कर जाती है सिमट,
नेपथ्य में कहीं खो
सा जाता है
इंसान,
अनुपचारित रह जाता है अंतरतम का घाव, -
रात के सीने पर बढ़ता जाता है रहस्य
का गहरा जमाव । बेसुध सा पड़ा
रहता है महानगर, सुनसान
सा राज पथ लगे घातक
जैसे कोई अजगर,
हर कोई यहाँ
रहता है
इक
दूजे से जानबूझ कर बेख़बर, बहुत कुछ रहता
है अमुद्रित, कोई नहीं पढ़ता रेखांकित
ख़बरों के बाहर, झिलमिलाहट
तक सिमित रहते हैं सभी
नज़रें, अपने आप
आख़िर बुझ
जाते हैं,
सीने
के धधकते हुए अलाव, रात के सीने पर बढ़ता
जाता है रहस्य का गहरा जमाव ।
* *
- - शांतनु सान्याल

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