जुनून ए मंज़िल थी उसे मील के पत्थर याद नहीं,
इक क़तरा ही काफी था, अज़ीम समंदर याद नहीं,
आबरंगी थे सभी ख़्वाब के झिलमिलाते से पैरहन,
बस ओंठों पर है सुकूं अमृत था या ज़हर याद नहीं,
हौले से किसी ने फेरा है सर पर दुआओं वाला हाथ,
पलकों पे थे शबनमी बूंदे, रात का सफ़र याद नहीं,
इक छुअन, जो ज़िन्दगी को उबार ले अभिशाप से,
बस जी उठे हैं दोबारा, दवाओं का असर याद नहीं,
अनगिनत सीढ़ियों से हो कर पहुंचे है उसके दर पे,
इत्मीनान सा है दिल में बाक़ी गुज़रबसर याद नहीं,
उस दहलीज़ में जा कर तिश्नगी को निजात मिली,
अक्स रहे ख़ालिस शीशे पार का रहगुज़र याद नहीं,
* *
- - शांतनु सान्याल

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