किसी दस्तक के इंतज़ार में रातभर, करवट बदलती रही ज़िन्दगी, कोहरे के चादर
खींच कर सो गईं सभी गहरी
घाटियां, सो गए जंगल -
पहाड़ नदी, ऊंघती
सी हैं सितारों की
महफ़िल, धुंध
में खो सी
गई
चाँदनी, सुबह की तलाश में दूर तक यूं ही - - भटकती रही ज़िन्दगी, किसी दस्तक
के इंतज़ार में रातभर, करवट
बदलती रही ज़िन्दगी ।
शीशे के उस पार
हैं बूंद बूंद
वाष्प
कण,
पिघलने की ख़्वाहिश लिए सो रही है इक बर्फ़
की नदी, सीने में उठ रहे हैं जिसके असंख्य
हिमस्खलन, अंतरतम में है छुपा हुआ
कोई सदियों से सुप्त आग्नेयगिरि,
जाने कौन है जो सुबह से
पहले समेट लेता है
मुझे अपने
अंदर,
रात भर आकाश कुसुम की तरह जलती बुझती
रही ज़िन्दगी, सुबह की तलाश में दूर तक
यूं ही भटकती रही ज़िन्दगी ।
* *
- - शांतनु सान्याल
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