न जाने किस दिगंत में खो गए वो सभी
वृष्टि वन के यात्री, दूर अरण्य में
उभर रहे हैं अग्निरेखाएं
सर्पाकार, महुआ
फूल झर
चलें
है असमय ही, न जाने कौन थे वे महत
मानव, जिन्होंने कहा था " इंसानियत
से बढ़ कर कुछ भी नहीं" न जाने
किस दुनिया के थे, वे लोग
जिन्होंने बोया था
ज्वलंत ज़मीं
पर एक
मुट्ठी
सजल सपनों के बीज, जीवन के पुष्प
वीथिकाओं में गहराया था सघन
मेघों का आकाश, सोचने में
अच्छा ही लगता है
काश उनकी
सपनों
के
बीज अंकुरित होते, किन्तु वो अंतःनील
बारिश वाष्पित हो, न जाने कहाँ
विलीन हो गई, सीने का
पिंजर यथावत रहा
झुलसता मरू -
धरा,
असमाप्त दहन चिरस्थायी, हज़ार फणों
की रात्रि, दंशित, घर्षित, शोषित
निष्प्राण सा जीवन, प्रभात
यहाँ है प्रतिबंधित,
तमाम रात
क्रय
विक्रय, बाह्य जगत में महा अंधकार - -
सिर्फ़ निःशब्द हाहाकार, शेष प्रहर
के आकाश कुसुम करते हैं मूक
अट्टहास, कितने ही सीप,
शंख, निर्वस्त्र देह,
मुखौटे, भंग
मेरुदंड
बिखरे पड़े रहते हैं जनसमुद्र के किनारे,
कौन किस की ख़बर लेता है, धीरे
धीरे समुद्र की लहरें सरक जाती
हैं तट से बहुत दूर, जाने
अनजाने कहानियों
के पृष्ठों में खो
जाते हैं
तमाम चेहरे, परित्यक्त पृथ्वी के अंतिम
छोर में, काश, वृष्टि वन के यात्री फिर
लौट आएं एक बार - -
* *
- - शांतनु सान्याल

हार्दिक आभार - - नमन सह । शारदीय नवरात्रि की शुभकामनाएं आपको भी।
जवाब देंहटाएंसुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह । शारदीय नवरात्रि की शुभकामनाएं.
हटाएंबहुत बढ़िया🌻
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह । शारदीय नवरात्रि की शुभकामनाएं.
हटाएं