समुद्र से अंतरिक्ष तक है विषाक्त
कुहासा, गर्भस्थ स्वप्न
खोजते हैं जन्म से
पहले ही मृत
नदी का
वक्षस्थल, हर तरफ है सिर्फ़ आज
के लिए, जीने की अंतहीन
जद्दोजहद, बस्तियों में
बढ़ते जा रहे हैं कल
के बृहत् नगरीय
मरुस्थल।
कहाँ
गए न जाने सभी वो सार्वभौमिक
संकल्प, शुद्ध हवा पानी के
संग जीने का एक मुश्त
अधिकार, अब तो
मरने के बाद
भी दो गज़
ज़मीं
का, नहीं दिखता कोई विकल्प। -
दाहभूमि हो या कोई क़ब्रगाह,
या शहर का गन्दा फुटपाथ,
इंसान मजबूर है वहीँ
पर अपना आश्रय
बनाने के
लिए,
उसी मलिन मृत नदी के सीने में
खो जाते हैं, न जाने कितने
मासूम चेहरे, और जो
किसी तरह शैशव
लांघते हुए
पहुँचते
हैं
कोहरे में डूबी हुई सीढ़ियों तक -
वो वहीँ सो जाते हैं थक हार
के, उन्हें कोई सुबह नहीं
आती, फिर से
जगाने के
लिए।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंसार्थक और सन्देशप्रद रचना।
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (6-10-2020 ) को "उन बुज़ुर्गों को कभी दिल से ख़फा मत करना. "(चर्चा अंक - 3846) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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कामिनी सिन्हा
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंआदरणीय शांतनु जी, पर्यावरण पर बहुत सशक्त रचना। आपकी रचना शहरों के बेतरतीब फैलाव पर करारी चोट करती है।
जवाब देंहटाएंउसी मलिन मृत नदी के सीने में
खो जाते हैं, न जाने कितने
मासूम चेहरे!
बहुत संवेदना भरी रचना!--ब्रजेन्द्रनाथ
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंमें
जवाब देंहटाएंखो जाते हैं, न जाने कितने
मासूम चेहरे, और जो
किसी तरह शैशव
लांघते हुए
पहुँचते
हैं ,,, बहुत सुंदर रचना पर्यावरण पर ,
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
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