Friday, 4 November 2011


परिचित किनारा 

मखमली अहसास में कोई गीत लिखना 
लौटतीं हैं शाम ढले यादों की कश्तियाँ -
जाते जाते गोधूलि को मेरा प्रीत लिखना,
तुलसी तले माटी का दीप जब जले -
हथेली पर काजल से मनमीत लिखना, 
पीपल के पातों में रुक जाएँ हवाएं, न 
बुझे लौ दुआ के ,इसे बहुगुणित लिखना,
बिखरते बूंदों में हैं कहीं बच्चों की हंसी 
किलकारियों से उसे अनगिनत लिखना,
पसीने और कच्चे धान की ख़ुश्बू मिला 
वो नदी बहते धारों में हारजीत लिखना,   
झूलतीं बरगद की जटाएं ज़रा ठहरो -
चांदनी में नया प्रणय संगीत लिखना, 
अनजान हूँ मैं इन भूल भूलैयों से, हो 
सके तो किनारों मुझे परिचित लिखना. 

-- शांतनु सान्याल  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

2 comments:

  1. मखमली अहसास में कोई गीत लिखना
    लौटतीं हैं शाम ढले यादों की कश्तियाँ -
    जाते जाते गोधूलि को मेरा प्रीत लिखना,
    तुलसी तले माटी का दीप जब जले -waah

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  2. thanks respected rashmi ji - regards

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