भीड़ भरे राहों में, ख़ुद को तन्हा न कीजिए,
मिलने की चाह हो, कोई तक़ाज़ा न कीजिए,
दहलीज़ के पार, बेहद ख़ूबसूरत लगे दुनिया,
घर के अंदर रहने वालों को, रुस्वा न कीजिए,
बहोत ही मुश्किल से मिलते हैं, दिलों के पुल,
डुबकनी कश्ती की तरह, यूँ दग़ा न कीजिए,
घूमते आईने की तरह है, मौसम का मिज़ाज,
बंद आंखों से हर शख़्स पर, भरोसा न कीजिए,
न जाने किस छत पर, जा गिरे बर्क़ ए ख़तर,
खुल कर हंसिये यूँ मुंह दबाए हंसा न कीजिए,
बर्ग ए कंवल की तरह हो, ज़िन्दगी का दामन,
मुखौटों के आड़ में दुनिया को ठगा न कीजिये ।
* *
- - शांतनु सान्याल

वाह ! बेहतरीन शायरी
जवाब देंहटाएंदहलीज़ के पार, बेहद ख़ूबसूरत लगे दुनिया,
जवाब देंहटाएंघर के अंदर रहने वालों को, रुस्वा न कीजिए,
बहुत ख़ूब !! अति सुन्दर सृजन!!
सुन्दर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार ।
हटाएंवाह ! बहुत खूब। हर पंक्ति में गहन अर्थ।
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार आदरणीया ।
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