इक बूंद उन्वान था, जो बह कर निगाह से उतरा,
शीशे का था चिराग़दान, टूट कर ज़मीं पर बिखरा,
हर चीज़ क़रीब हो मय्यसर, तो बेमज़ा है ज़िन्दगी,
वक़्त की भट्टी में तप कर, ये वजूद और भी निखरा,
ये दुनिया कभी किसी को यूँ चैन से जीने नहीं देती,
आगे बढ़ने के लिए है ज़रूरी, बन जाएं गूंगा बहरा,
पल भर में बदल जाते हैं सभी रंगीन कांच के चेहरे,
रिश्ता ए मुहर है उथला, कहने को चमक है गहरा,
अक्स को आज़ाद करो धूसर आईने के गिरफ़्त से,
धुंध भरे राहों में भला कौन किसी के लिए है ठहरा,
सोच लो साथ चलने से पहले ये सफ़र है अंतहीन,
ज़िन्दगी कहाँ रूकती है, चाहे चमन हो या सहरा ।
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- - शांतनु सान्याल

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