एक सितारे के टूटने से फ़लक वीरां नहीं होता,
अमावस हो, या चाँद रात वो परेशां नहीं होता,
चाहतों की भीड़ में है इक मुश्त सुकूं की खोज,
हर एक घर अंदर से, राहते आशियां नहीं होता,
तक़दीर से मिलते हैं ज़िन्दगी में हमराह वाक़ी,
हरएक ख़ाली दामन पे ख़ुदा मेहरबां नहीं होता,
कहने को लुटा हूँ बारहा इस तिलस्मी शहर में,
आदतन अब, फ़रेबी बातों से मैं, हैरां नहीं होता,
न वो नेकी रही, न ही दरिया का है कोई सुराग़,
गले मिलने भर से कोई पूरा आशना नहीं होता,
ज़रूरी तो नहीं कि नरम धूप तुम तक ही पहुंचे,
सिर्फ़ किसी एक के लिए नीला आस्मां नहीं होता ।
* *
- - शांतनु सान्याल

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 29 नवम्बर 2022 को साझा की गयी है....
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
आपका असंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-11-22} को "उम्र को जाना है"(चर्चा अंक 4622) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
असंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंबहुत ही बढ़िया सृजन बधाई आपको
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार ।
हटाएंचाहतों की भीड़ में है इक मुश्त सुकूं की खोज,
जवाब देंहटाएंहर एक घर अंदर से, राहते आशियां नहीं होता,..
.. जीवन की सटीक अभिव्यंजना करता लाजवाब शेर ।
असंख्य आभार ।
हटाएंजी शान्तनु जी, जितना सुन्दर आप हिन्दी में लिखते हैं उतना ही उर्दू में भी।एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाई और शुभकामनाएं।सभी शेर बहुत उम्दा हैं।सादर 🙏
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार ।
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