बहुरंगी प्रतिबिंब उभरते हैं इस गहन नदी के अंदर,
ढूंढता है ये जीवन महा अरण्य में, जुगनुओं के घर,
अश्वत्थ की जटाओं से उतरती है मायाविनी रात्रि, -
एक ही सांचे में ढले हम सब, एक ही पथ के यात्री,
प्रति पल अनंत दीपशिखा जागृत हो अंतरतम में,
तिमिर भेद कर प्रवाहित हों सुदूर सागर संगम में,
महामार्ग में आ मिलते हैं, सभी सहस्त्र पगडंडियां,
दो दिन के महोत्सव, पल भर की सभी रंगरलियां,
बहुरूपी है ये चेहरा गांव गंज घूमती है प्रतिच्छाया,
सजल रेखाओं को जग में कौन भला है पकड़ पाया,
इस रात के सीने में हैं, न जाने कितने ही यवनिका,
हाशिए का मर्म अधूरा, वैसे उसने बहुत कुछ लिखा,
शून्यमंच के आगे पंक्तिबद्ध हैं अपनी जगह कुर्सियां, -
नेपथ्य में गुम है कोलाहल, ख़ामोश सी पड़ी तालियां ।
- - शांतनु सान्याल

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