आज और कल के मध्य, न जाने कितने -
ही ख़्वाबों का है, एक लंबा सा सिलसिला,
शेष भाग का हिसाब होता है बेहद उबाऊ,
कितना कुछ टूटा, क्या कुछ साबुत मिला,
खिड़की के उस पार है डूबता हुआ सूरज,
रात के सीने पर, बिहान की आधारशिला,
समय के साथ दीवारों पर उभरते है दरार,
चाहे गृहनिर्माण रहा हो, सठिक नपातुला,
आख़िर क्यूं इतना अहंकार देह प्राण पर,
तै है उसका कुम्हलाना जो सद्य है खिला,
ताउम्र कोई अंतहीन समीकरण नहीं होता,
शून्य हथेली पर न शिकायत न कोई ग़िला ।
* *
- - शांतनु सान्याल

सादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (6-11-22} को "करलो अच्छे काम"(चर्चा अंक-4604) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
असंख्य धन्यवाद नमन सह ।
हटाएंबहुत ही सुन्दर
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद नमन सह ।
हटाएंशेष भाग का हिसाब होता है बेहद उबाऊ... गज़ब कहा सर, बहुत ही सुंदर।
जवाब देंहटाएंभावों और प्रतिको की नवीनता हमेशा आपके लेखन में उभरकर आती है।
सराहनीय।
असंख्य धन्यवाद नमन सह ।
हटाएंसुन्दर रचना! अभिव्यक्ति की नवीनता!
जवाब देंहटाएंबिहान का आधारशिला या "की आधारशिला"
साधुवाद!--ब्रजेन्द्र नाथ
कृपया मेरे ब्लॉग marmagyanet.blogspot.com पर "पिता" पर लिखी मेरी कविता और मेरी अन्य रचनाएँ भी अवश्य पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएं.
पिता पर लिखी इस कविता को मैंने यूट्यूब चैनल पर अपनी आवाज दी है. उसका लिंक मैंने अपने ब्लॉग में दिया है. उसे सुनकर मेरा मार्गदर्शन करें. सादर आभार ❗️ --ब्रजेन्द्र नाथ
आप बिल्कुल सही है त्रुटि हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ शुक्रिया आदरणीय गहराई से पढ़ने के लिए, नमन सह ।
हटाएंआख़िर क्यूं इतना अहंकार देह प्राण पर,
जवाब देंहटाएंतै है उसका कुम्हलाना जो सद्य है खिला,
जीवन संदर्भ पर चिंतनपूर्ण रचना ।
दिल की गहराइयों से शुक्रिया ।
हटाएंबहुत ही सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया ।
हटाएंवाह बेहतरीन सृजन
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से आभार ।
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