29 जुलाई, 2022

सभी थे ख़ामोश - -

हज़ार तिर्यक रेखाओं के मध्य बनता है
एक घोंसला, अथक उड़ानों के बाद
कहीं जा कर कुछ श्वेत वृत्तों
में छुपे रहते हैं पीत -
वर्णी सपनों के
कण,
बारम्बार बिखरने के बाद भी जीवन नहीं
खोता है अपना हौसला, हज़ार तिर्यक
रेखाओं के मध्य बनता है एक
घोंसला । न जाने कितने
सांप सीढ़ियों से
उतर कर भी
हम नहीं
भूलते
आरोहण, ज़रूरी नहीं हासिल हों जीवन
में मनचाही वस्तु, अंतरतम का
संतोष ही होता है सच्चा
आभूषण, न जाने
किसे करना
चाहता है
परास्त,
झूल
रहा है तू अपने ही अंदर, अट्टहास कर - -
रहा है समय का झूला, अंतिम
प्रहर में थे सब चुप, क्या
मेरा ईश और क्या
तेरा मौला,
हज़ार
तिर्यक
रेखाओं के मध्य बनता है एक घोंसला ।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

25 जुलाई, 2022

ख़्वाब बिल्लौरी - -

पिघलती हुई हिमनद के अंतिम नोक पर
कहीं, इक ठहरा हुआ सा बिल्लौरी
ख़्वाब हो तुम, छू लूँ तुम्हें
बेख़ुदी में सुबह से
पहले, कोई
पहेली !
रेशमी धागों में गुथी, वो अक्स लाजवाब
हो तुम, इक ठहरा हुआ सा बिल्लौरी
ख़्वाब हो तुम। अनगिनत हैं
तुम्हारी बज़्म में सितारों
की चहल क़दमी,
कुछ बुझते
चिराग़
के
लौ भी चाहते हैं पुनर ज़िन्दगी, न जाने
कितने जन्मों के बाद  भटकती
रूहों का, पुरसुकूं इन्तख़ाब
हो तुम, इक ठहरा
हुआ सा बिल्लौरी
ख़्वाब हो
तुम।
* *
- - शांतनु सान्याल


 

 

22 जुलाई, 2022

उजाले का क़तरा - -

 

विस्तृत ख़ामोशी में एक अनंत

अंधकार गुफा तलाशती है

एक उजाले का क़तरा,

सभी गुज़र जाते हैं

अपनी अपनी

राह, कहना

बड़ा ही

सहज

है

कि तुम्हें मुझ से है मुहोब्बत बेपनाह, लेकिन ये भी

सच है कि कौन

किस के लिए 

देर तक है

ठहरा, 

अंधकार गुफा तलाशती है एक

 उजाले का क़तरा ।

अक्सर देखता हूँ

मैं एक ग्राफ़,

सूखी और

भरी नदी

के मध्य,

कुछ

सरकते हुए नम बादल खोजते

हैं वीरान पृष्ठों में अतीत के

पद्य, जीवन का रहस्य 

तब लगता है बहुत 

ही गहरा, अंधकार

गुफा तलाशती

है एक उजाले

का

क़तरा ।

**

- - शांतनु सान्याल 




19 जुलाई, 2022

अमिट सत्य - -

मृत्यु अमिट सत्य है अपनी जगह,

और सत्य की मृत्यु

कभी होती नही, वो 

निर्वस्त्र हो कर 

अंतरतम के

सौंदर्य

को

उजागर करता है, सत्य को

कहने और सुनने का 

साहस ही जीवंत

रखता है मानव

को, वो सभी

धर्म एक

दिन

हो जाएंगे विलीन जो रखते

हैं धर्म को मानवता के

शीर्ष पर, समय हर

एक दंभ का मौन

संहार करता

है, सत्य

की

मृत्यु कभी होती नहीं, वो निर्वस्त्र 

हो कर अंतरतम

के सौंदर्य को उजागर

करता है ।

**

- - शांतनु सान्याल

15 जुलाई, 2022

पुनरागमन - -

हर शख़्स की है अपनी कल्पना, अपनी ही
भविष्यवाणी, जल प्रलय हो या हिम -
युग की वापसी, या भस्मीभूत
होती हुई ये ख़ूबसूरत
पृथ्वी, शून्य से
शून्य तक
फिर भी
रहती है कहीं न कहीं, आबाद ये यायावर
ज़िन्दगी ! सभी कुछ बिखर जाएंगे
एक दिन, सरल कहाँ, रेत के
घरौंदों को पागल लहरों
से बचाना, बिखरे
पड़े रहेंगे बस
कुछ सीप
शंख
के खोल, कदाचित मिल जाए तुम्हें कोई
दिव्य मोती, न भूलना, इस किनारे
पर पुनः आना, पाओगे हर
हाल में कहीं न कहीं,
अदृश्य प्रणय की
मौजूदगी,     
शून्य
से शून्य तक फिर भी रहती है कहीं न -
कहीं, आबाद ये यायावर ज़िन्दगी !
* *
- - शांतनु सान्याल   

14 जुलाई, 2022

प्रभात पूर्व जागरण - -

मैंने देखा है दूर तक एक जुलूस, हाथों में लिए
हुए पत्थर, और ओंठों पर मानवता का
सिंहनाद, एक विषाक्त प्रवाह में
बहते हुए लोग, बच्चे, बूढ़े,
जवान, स्त्री, पुरुष, न
जाने किस ग्रह को
करना चाहते हैं
आज़ाद,  
हाथों
में लिए हुए पत्थर, और ओंठों पर मानवता -
का सिंहनाद ! रात के अंतिम प्रहर का
कोई दुःस्वप्न, अदृश्य नशे में
धुत लोग, हाथों में लिए
हुए खड्ग - खंजर
बढ़ चले हों जैसे
वध स्थल
की ओर,
न जाने किस मिथ्या प्रतिश्रुति के वशीभूत,
जी रहे हैं लोग विरोधाभास का जीवन,
वसुधैव कुटुम्बकम् के लोग अभी
तक सो रहे हैं बेख़बर, जबकि
हर तरफ है सुलगता
हुआ धर्म -
उन्माद,
हाथों में लिए हुए पत्थर, और ओंठों पर - -
मानवता का सिंहनाद !
* *
- - शांतनु सान्याल












 

10 जुलाई, 2022

असमाप्त दहन - -

अंतहीन होते हैं अभिलाषित वर्षा वन,
ज्वलंत मरुभूमि की तरह वक्ष -
स्थल में रहते हैं अदृश्य
भावनाएं, इस पार से
उस पार तक
विद्यमान,
फिर भी
रहती
है
सदा, मौन ओंठों पर एक हलकी सी -
मुस्कान, ठूंठ भी तलाशते हैं
अपना प्रतिबिम्ब, मौन
होता है लेकिन जल
दर्पण, अंतहीन
होते हैं
अभिलाषित वर्षा वन । नील पर्वतों से
अब भी उठ रहा है धुआं अनवरत,
कहने को तमाम रात बरसे
हैं बादल, कदाचित
अरण्य गर्भ में
बिखरे पड़े
हैं कुछ
स्वप्न क्षत - विक्षत, फिर भी हर हाल
में, नदी के संग उतरता है तलहटी
की ओर, संघर्षरत ये जीवन,
अंतहीन होते हैं
अभिलाषित
वर्षा वन।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

08 जुलाई, 2022

आज़ादी ए फ़रेब - -

न कहना किसी से किस्सा ए दग़ाबाज़ी,
कहीं लोग दोस्ती करना न छोड़ दें,
वो महज तस्सवुर है या हक़ीक़ी,
मेरा ख़ुदा या तेरा ईश्वर, न
खोल राज़ ए अक़ीदत,
कि राहे यक़ीं पे
लोग चलना
न छोड़
दें,
कहीं लोग दोस्ती करना न छोड़ दें । वो
सभी क़ाबिल ए फ़ख़्र, महल ओ
क़िले ढह गए, ख़ामोश आह
के आगे, कोई दिव्य
किताब की मर्ज़ी
नहीं चलती,
सैलाब

वक़्त के साथ न जाने कितने शहंशाह
बह गए, न बना कांच के सराय
धुंध भरी वादियों में, कि
तेरे अपने भी तेरे
साथ ठहरना
न छोड़
दें,
कहीं लोग दोस्ती करना न छोड़ दें - -
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

03 जुलाई, 2022

हासिल कुछ भी नहीं - -

न जाने कहाँ गुम हैं सभी वो इंसानी क़ैफ़ियत,
हर एक चेहरे के पीछे छुपा सा है कोई न
कोई वहशी सूरत, किस पर करे
यक़ीं, किस से गले मिलें,
न जाने कैसी आग
सीने में लिए
फिरते
हैं
लोग, ख़ून के रंग में कोई फ़र्क़ नहीं फिर भी
न जाने क्यूँ भूल जाते हैं, बार - बार
उसकी असलियत, न जाने
कहाँ गुम हैं सभी वो
इंसानी क़ैफ़ियत ।
सभी पोथी -
पुराण
के
पृष्ठों पर हैं, बिखरे हुए लहू के दाग़, कौन
रोप गया, उर्वर भूमि के नीचे ज़हर के
बीज, धुआं धुआं  सा उठ रहा है हर
तरफ, कुम्हलाए दरख्तों में
झूलते से हैं नफ़रत के
झाग, ये कैसा
जूनून सा
छाया
है
हर सिम्त, जिधर देखो सिर्फ़ है बर्बरियत
और बर्बरियत, सर झुकाए रो रही है
इंसानियत - -
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

14 मई, 2022

निःशर्त हो सब कुछ - -

आंचल की अपनी अलग है मजबूरी
ज़रूरत से ज़ियादा समेटा न
कीजिए, बिखरने दें ख़ुश्बू
की मुग्धता अपनी
ही शर्तों पर,
ब'ज़ोर
हवाओं का रूख़ अपनी तरफ मोड़ा न
कीजिए, दिल की गहराइयों से जो
उठती हैं मौज ए इबादत, वो
आसमां को झुका जाए,
हर एक मोड़ पर
मसीहा नहीं
मिलते,
हर एक शख़्स के सामने अपने हाथ
यूँ ही जोड़ा न कीजिए, न कोई
सरसराहट, न कोई आहट,
मुद्दत हुए गुलशन से
बहारों का कूच
होना, यूँ ही
अचानक
से मेरी
ज़िन्दगी में आप आया न कीजिए, न
जाने क्यूँ वो फेंकते हैं रह रह कर 
इक तिलस्मी छल्ला, अब कोई
ख़्वाब नहीं उभरते मेरी
आँखों में, बेवजह
यूँ ही आधी
रात,गहरी
नींद
को भरमाया न कीजिए, आंचल की
अपनी अलग है मजबूरी
ज़रूरत से ज़ियादा
समेटा न
कीजिए।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
    
 

09 मई, 2022

दो घड़ी के उस पार - -

उतरती दुपहरी में हुज़ूर, सुबह का अक्स
न तलाश करो, चल सको, तो चलो
कि दूर तक कोई मरुद्यान
नहीं, देह से लिपटे हैं
बेशुमार थूअर के
ज़ख़्म, इस
यात्रा में
कहीं
कोई अनुताप के लिए स्थान नहीं, जो -
मिल गया वही था, एक मुश्त
नियति का उपहार, जो खो
गया सो गया उसकी
वापसी का अब
न आस करो,
उतरती
दुपहरी में हुज़ूर, सुबह का अक्स न - -
तलाश करो। अजीब से हैं ये सभी
चाहतों के रिश्ते, इक छोर
से लपेटें, तो दूसरा
छोर ख़ुद ब
ख़ुद जाए 
खुल,
योग - वियोग करते रहे उम्र भर, अंतिम
प्रहर में शून्य के सिवा कुछ न मिला,
इक नशे से कुछ कम नहीं ये
ज़िन्दगी, काश आख़री
पहर से पहले ज़रा
सा जाएं संभल,
धूप - छांव
का ग्राफ
अपनी जगह होता है निरंकुश, जो पल -
हैं हासिल अभी वही हैं अनमोल
मोती, जो टूट के बिखर गए
सो बिखर गए उन्हें
सोच के ख़ुद को
न उदास
करो,
उतरती दुपहरी में हुज़ूर, सुबह का अक्स
न तलाश करो।
 * *
- - शांतनु सान्याल
 नागपुर

04 मई, 2022

मुहूर्तों के उस पार - -

ये काठ के खम्बे ही हैं जो थाम रखे हैं
पुल का अस्तित्व, दोनों पार की
दुनिया है सलामत इसी
एक विश्वास पर,
गुज़रना है
हमें
इसी जर्जरित राह से हो कर, नज़र है
टिकी हुई उस पार की ज़िन्दगी
पर, मुहूर्तों का अंक है एक
भूल भुलैया, उम्र नहीं
गुज़रती सपनों
के पूर्वाभास
पर, ये
काठ
के खम्बे ही हैं जो थाम रखे हैं पुल -
का अस्तित्व, दोनों पार की
दुनिया है सलामत इसी
एक विश्वास पर।
ख़ुशियों की
साझेदारी
में ही
है
छुपी हुई दिल की अदृश्य ख़ूबसूरती,
जबकि आजन्म हम भटकते रहे
इस घाट से उस घाट के
दरमियां, फिर भी
पाना नहीं
आसां,
दुःख
दर्द से मुक्ति, कुछ भी असर नहीं -
होता चाहतों के मोहपाश पर,
ये काठ के खम्बे ही हैं जो
थाम रखे हैं पुल का
अस्तित्व, दोनों
पार की
दुनिया
है सलामत इसी एक विश्वास पर। - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

30 अप्रैल, 2022

ख़ुद से साक्षात्कार - -

जन अरण्य में भी बहुधा जीवन होता है
निःसंग, कहने को झिलमिलाते हैं
हर तरफ आलोकमय माला,
निर्लिप्त सा रहता है
मन का आँगन,
और शून्य
होता
है
देह का प्याला, फिके फिके से लगते हैं
इंद्र धनुष के रंग, जन अरण्य में भी
बहुधा जीवन होता है निःसंग ।
इन विराग पलों से ही
निकलते हैं आत्म
परिचय के
ठिकाने,
वो
सभी चेहरे थे क्षणिक, उभरे और पलक
झपकते ही खो गए किधर, कौन
जाने ? शाब्दिक जाल हैं सभी
आत्मीयता के रास्ते,
कोई नहीं मरता
किसी के
वास्ते,
बस
मृग मरीचिका में ढूंढते हैं हम अविरत
अपना अंतरंग, जन अरण्य में
भी बहुधा जीवन होता है
निःसंग ।
* *
- - शांतनु सान्याल

29 अप्रैल, 2022

समानांतर यात्रा - -

अग्नि - पुष्प की तरह उभर आते हैं वो
सभी निखोज स्वप्न, जो दबे रहते
हैं राखरंगीं सुदूर प्रांतरों में,
अशेष हैं सभी रास्ते,
मृग जलों की
दुनिया के
उस
पार, अदृश्य रात्रि निवास की है अपनी
ही अलग ख़ूबसूरती, उम्मीद के
चिराग़ बुझते कभी नहीं
समय के मध्यान्तरों
में, उभर आते हैं
सभी विलुप्त
स्वप्न,
राखरंगीं सुदूर प्रांतरों में। समुद्र सैकत
पर खड़ा हूँ मैं, ले कर हिय में एक
अगाध तृषा, जबकि कुछ बूंद
ही प्रयाप्त हैं जीने के
लिए, टूटे हार की
तरह अक्सर
हम ढूंढते
है एक
रेशमी डोर, सांसों के मोती पिरोने के -
लिए, मध्यम मार्ग पर चल रहा
हूँ मैं, चल रहे हैं दोनों तरफ
धूप और छाया, प्रकृत
समानान्तरों में,
उभर आते
हैं सभी
विलुप्त स्वप्न, राखरंगीं सुदूर प्रांतरों
में।
* *
- - शांतनु सान्याल
   



28 अप्रैल, 2022

निःशब्द कथोपकथन - -

वो पल थे अविस्मरणीय, जो खुले आकाश
के नीचे बिखर गए, अवाक थे तुम
और मैं भी निःशब्द, सिर्फ़
चल रहे थे अंतरिक्ष
में सितारों के
जुलूस !
तुमने कुछ भी न कहा, लेकिन रूह तक जा
पहुंची तुम्हारी वो अनकही बातें, उन
पलों में हम ने जाना जीवन का
सौंदर्य, उन रहस्यमयी
क्षणों में हम भूल
गए दुनिया
की सभी
घातें,
सिर्फ़ कुछ याद रहा तो वो था परस्पर का
एक ख़ामोश, हमआहंगी वो ख़ुलूस,
अवाक थे तुम और मैं भी
निःशब्द, सिर्फ़ चल
रहे थे अंतरिक्ष में
सितारों के
जुलूस !
इक उम्र से कहीं ज़्यादा हम जी चुके हैं -
उन ख़ूबसूरत लम्हों के दरमियां,
क्या पाया हम ने और क्या
कुछ खो दिया उनका
हिसाब कौन करे,
चाहे बना लो
जितने भी
अमूल्य शीशमहल, पलक झपकते ही
हैं सभी ताश के आसमां, सिर्फ़
रहते हैं सदा रौशन दिलों
में मुहोब्बत के
फ़ानूस,
अवाक थे तुम और मैं भी निःशब्द, सिर्फ़
चल रहे थे अंतरिक्ष में
सितारों के
जुलूस !
* *
- - शांतनु सान्याल  

27 अप्रैल, 2022

शब्द रचना - -

वर्ग पहेली की तरह है ये रात, लफ़्ज़ों
के जाल हैं खुली निगाहों के ख़्वाब,
पलकों के चिलमन में हैं छुपे
हुए, अनबूझ सवालों के
जवाब, कोई ख़ुश्बू
है जो अंदर
तक छू
जाती है रूह की गहराई, इक अंतरंग
छुअन है कोई, या प्रणयी चंद्र -
सुधा, सुलगते पलों में है
ये किस की संदली
परछाई, कुछ
ही पलों
का
है ये खेल पुरअसरार, फिर वही थके
पांव उतरती है चांदनी, बिखरे
पड़े रहते हैं आख़री पहर
बेतरतीब से सभी
साहिल पर
सीप के
खोल,
कुछ शब्द अनमोल, शून्य संदूक में
खोजते हैं हम बेवजह ही गुमशुदा
असबाब, वर्ग पहेली की तरह
है ये रात, लफ़्ज़ों के
जाल हैं खुली
निगाहों के
ख़्वाब।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 

25 अप्रैल, 2022

मिलने की बेक़रारी - -

उतरती है चाँदनी धीरे - धीरे, मुंडेरों से
हो कर, झूलते अहातों तक, फिर भी
मिलती नहीं, रूह ए मकां  को
तस्कीं, इक रेशमी अंधेरा
सा घिरा रहता है दिल
की गहराइयों तक,
हम खोजते हैं
ख़ुद को
अपने ही बिम्ब के उस पार, जबकि ये
वजूद रहता है मौजूद, यहीं पे कहीं,
फिर भी मिलती नहीं, रूह ए
मकां को तस्कीं। हर सिम्त
हैं बिखरे हुए अनगिनत
चेहरे, उम्र गुज़र
जाती है बस
असल
चेहरे की तलाश में, इक लकीर की तरह
खींची हुई है नियति की डोर, दो
स्तंभों के बीच, गुज़रती है
जिस पर ये ज़िन्दगी
लिए सीने में
जीने की
आस,
हज़ार बार टूटे, हज़ार बार जुड़ के उभरे,
बिखरते नहीं फिर भी मुहोब्बत के
एहसास, हर सुबह हम तुमसे
मिलेंगे वहीं ,जहाँ मिलते
हैं रोज़ ये आसमान
और बेक़रार सी
ज़मीं, फिर
भी
मिलती नहीं, रूह ए मकां को तस्कीं । - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

22 अप्रैल, 2022

लापता सूत्र - -

दिन के उजाले में नहीं डूबते अंधेरों के
चिराग़, परछाइयों के हैं सब खेल
जो दिखता है खुली निगाह से
वो नहीं मुक्कमल जहां,
पृथ्वी के उस पार
भी है जीवन
का एक
भाग,
दिन के उजाले में नहीं डूबते अंधेरों के
चिराग़ । राज पथ के दोनों तरफ हैं
दो अलग दुनिया, जोड़ता है
जिन्हें अदृश्य मुहोब्बतों
का पुल, फिर भी
दूरियों को
पाटना
नहीं
आसां, ढूंढती हैं दूर तक किसे तेरी ये -
प्यासी निगाहें, जो खो गए धुंधले
क्षितिज के पार, नहीं मिलता
उम्र भर उनका निशां,
जो छुपा रहा मेरे
अंतरतम में
उस का
कोई न दे पाया सठिक सुराग़, दिन के
उजाले में नहीं डूबते अंधेरों
के चिराग़ ।
* *
- - शांतनु सान्याल

14 अप्रैल, 2022

यथावत हैं सभी रास्ते - -

सभी आवरण देता है उतार, निःशब्द ये
गाढ़ अंधकार, चंद्र विहीन आकाश
में है बदस्तूर सितारों का
उत्थान - पतन, शूल
सेज पर होता है
तब अक्सर
एकाकी
ये जीवन, झुरमुटों से झांकते हैं कुछ -
आत्मीय स्वजन, उजालों तक हैं
सभी सिमित ये अंतरंग
चेहरे, अंधेरे में किसी
को नहीं किसी
से कोई भी
सरोकार,
सभी आवरण देता है उतार, निःशब्द ये
गाढ़ अंधकार। मायाविनी इस रात
की गहराई में ढूंढता हूँ मैं अपनी
ही गुमशुदा छाया, अंतिम
प्रहर में मिलने की
प्रतिश्रुति थी
बहुत ही
झूठी,
क्षितिज पर ठहरा रहा देर तक, लेकिन
मुझसे मिलने वहां कोई नहीं आया,
वही दूर तक फैली हुई है धुंध
की चादर, वही रास्ते
पेंचदार, सभी
आवरण
देता है
उतार, निःशब्द ये गाढ़ अंधकार - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

 

09 अप्रैल, 2022

टूटे हुए मेहराब - -

दूर बहुत दूर तक फैले हुए हैं यादों के
खण्डहर, न जाने क्या चाहते हैं
मुझसे, वो टूटे हुए मेहराबों
से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे, प्राचीन
मठ का
कोई
एकाकी सन्यासी है गोधूलि आकाश,
चाहता है शायद तोड़ना धरती
से अपना मोहपाश, सूखे
पत्ते की है अपनी ही
अलग कहानी,
कोई किसी
के लिए
आख़िर क्यूँ कर ठहरे, वो टूटे हुए -
मेहराबों से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे। वो सभी चेहरों में
ढूंढता हूँ मैं, सुबह
की मुलायम
धूप, एक
अनुबंध
जो
कदाचित बंधा था उन्मुक्त ख़ुशी के
लिए, सुबह से पहले कोई द्वार
पर लगा गया शून्यता का
कुलूप, कहाँ जाएं, किस
से मिलें, दो बात
करें हिय की,
ये शहर
है बड़ा
मायावी, यूँ तो शोरगुल है हर तरफ -
लेकिन एहसास हैं सभी गूंगे
और बहरे, वो टूटे हुए
मेहराबों से झांकते,
अर्ध स्मित
चेहरे।
* *
- - शांतनु सान्याल

07 अप्रैल, 2022

ख़ुद से ख़ुद तक - -

दूसरी मंज़िल से उतर कर पार्क तक - -
सिमटती है ज़िन्दगी, यहाँ सूर्य
तपता है पूरी शिद्दत से,
पल्लव विहीन
मौलश्री के
नीचे
जा कहीं रुकता है कुछ पलों का पर्यटन,
थके हुए चेहरों में अपना अक्स
ढूंढता है ये जीवन । तुम्हारे
देश में शायद, बहती
हों सर्द हवाएं,
यहाँ फ़ुर्सत
ही नहीं
मिलती कि निकलें अग्नि वलय से - -
बाहर, थोड़ी दूर जा टहल आएं,
फिर भी नहीं थमता है
चाहतों का अंतहीन
भ्रमण, थके हुए
चेहरों में
अपना
अक्स ढूंढता है ये जीवन । मन ही मन
बहुत दूर जा कर लौट आया हूँ,
वही नदी के दो किनारे,
इस तट कोलाहल
और उस पार
है विस्तृत
ख़ामोशी,
सोचता हूँ जो कुछ है हासिल इस पल
वही सत्य है, बाक़ी अर्थहीन हैं
सभी दुःख और ख़ुशी,
अशेष रहता है
चिरकाल
स्व -
तर्पण, नियति के हाथ होते हैं हमेशा
ही महा कृपण, थके हुए चेहरों में
अपना अक्स ढूंढता है
ये जीवन ।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
  

06 अप्रैल, 2022

पूर्व लिखित तहरीर - -

बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना, जो हथेली पर रुका
कुछ पल के लिए वो एहसास
ए बूंद है मुहोब्बत, जो
छलक गया मेरी
पलकों से हो
कर, वो
था
सुबह का कोई नाज़ुक सा सपना, बेदाग़
यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना। दिगंत पर आ
कर मैं ढूंढता हूँ शब ए
गुज़िश्ता का निशां,
कौन, किस
सिम्त
जा
मुड़ा कहना है बहुत मुश्किल, सुबह है
वही ताज़गी भरी, वही उन्मुक्त
आसमां, दरअसल पूर्व -
लिखित होते हैं
मिलना
और
बिछुड़ना, बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म
ए अंदाज़ है अपना अपना।
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

01 अप्रैल, 2022

मोतियों का हार - -

न खींच कोई अदृश्य रेखा जीवन वृत्त
के आस पास, मुस्कुराने की कोई
समय - सीमा नहीं होती, कैसे
समझाएं तुम्हें कि ये
हासिल पल है
बेहद
क़ीमती हार, ज़रा सी ग़फ़लत में बिखर
जाएंगे, आईना रह जाएगा स्तब्ध,
निःशब्द होगी सिंगारदानी,
हम खोजते रह जाएंगे
गुमशुदा मोतियों
के ठिकाने,
किसे
मालूम इस धुंध की घाटी में हम सभी  -
किधर जाएंगे, ये हासिल पल है
बेहद क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत में
बिखर
जाएंगे। वर्षावन की ये जिजीविषा नहीं
थमती चाहे कितने ही ऊपर हो
एक बूंद सूर्य किरण, हर
हाल में ज़िन्दगी को
करनी है अंतहीन
यात्रा, पर्ण -
अंचल
की है अपनी अलग ही नियति, क्या -
फ़र्क़ पड़ता है मुझे मिला हो
केवल भीगा स्पर्श, और
तुम्हें असीम मात्रा,
तिलिस्म
छुअन
की
है अपनी अलग तासीर, देखना एक
दिन हम भी निखर जाएंगे,
ये हासिल पल है बेहद
क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत
में बिखर
जाएंगे।
* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 
 
  

28 मार्च, 2022

अनंत साध - -

ज़िन्दगी अक्सर देती है दस्तक
कुछ लम्हों की सौगात लिए,
दहलीज़ पर हो तुम, या
चल रहा हूँ मैं नींद
में इक ख़्वाब
की दुनिया
अपने
साथ लिए, उठ रही है सुदूर नील
पर्वतों से अरण्य पुष्पों की
महक, इक अदृश्य
सांसों का पुल,
प्रसारित
है मुझ
से हो कर तुम तक, ठहरे हुए हैं -
मेघ दल सीने में दबी हुई
बरसात लिए, ज़िन्दगी
अक्सर देती है
दस्तक
कुछ
लम्हों की सौगात लिए । सुबह है
इक बंद लिफ़ाफ़ा पुरअसरार
तहरीरों का, इस रात की
है अपनी अलग ही
कहानी, कोई
गुमशुदा
शहर हो जैसे उजड़े हुए मंदिरों का,
फिर भी ज़िन्दगी को है यक़ीं,
क्षितिज पार है इक नयी
आस की दुनिया कहीं
न कहीं, चल रहा
हूँ मैं अधबुझे
अंगारों
पर उसे पाने की अनंत साध लिए,
ज़िन्दगी अक्सर देती है दस्तक
कुछ लम्हों की सौगात
लिए ।
* *
- - शांतनु सान्याल
 


27 मार्च, 2022

छत विहीन प्रासाद - -

स्मृतियों से पलायन कहाँ आसान,
समय का तेज़ घूमता हिंडोला,
और कोई शून्य से बार
बार फेंके है सुरभित
रुमाल, छूने
की चाह
में अक्सर ख़ुद को न पाएं संभाल,
हथेलियों में बंद जुगनू की
तरह कोई लगे रूह
तक शामिल,
मुट्ठी के
खुलते ही लगे धूसर सा अंतहीन -
नीला आसमान, स्मृतियों
से पलायन कहाँ
आसान।
खिलने के साथ ही है तयशुदा फूल
का मुरझाना, स्वर्ण जड़ित
फ्रेम में चाहे क्यूँ न
हो बहुमूल्य
दर्पण,
नहीं रूकती है चेहरे पर सुबह की -
नरम धूप, उसे तो हर हाल
में है ढल जाना,  छत
विहीन स्तंभ रह
जाते हैं अपनी
जगह ओढ़े
हुए दूर
तक वीरानगी के चादर, धुंध में
खो जाते हैं सभी आनबान,
स्मृतियों से पलायन
कहाँ आसान।
* *
- - शांतनु सान्याल

25 मार्च, 2022

असलाह ज़रूरी है - -

अंतर पृष्ठ का रहस्योद्धार है बहोत
मुश्किल, जिल्द देख कर नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई,
हर कोई अपने
अंदर लिए
होता
है
मुख़्तलिफ़ शख़्सियत, मुखौटे ओढ़
कर आसान है देना तक़रीर ए
नसीयत, कहने को एक
सी होती हैं सभी
परछाई, जिल्द
देख कर
नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई। एक ही हैं  
सभी देह, एक ही सांचे में ढले
हुए, कुछ तपे हुए, कुछ
अध पके माटी के
रेत से मिले
हुए, कोई
नहीं
यहाँ शत प्रतिशत ख़ालिस, आज
नहीं तो कल हर एक को देनी
है भरपाई, जिल्द देख
कर नहीं होता
अंदाज़ ए
गहराई।
* *
- - शांतनु सान्याल

23 मार्च, 2022

कच्चे घड़े का पानी - -

सिमटती नदी के दोनों पार है अनंत
पलाश वन, रेत के आंचल पर
कोई उकेर गया जीवन -
दर्पण, ढूंढते हैं न
जाने किसे
अंतर
के मृग नयन, सिमटती नदी के दोनों
पार है अनंत पलाश वन। कहां
रुकता है कच्चे घड़े का
पानी, वही तुम हो
वही हम हैं
और
ज़िन्दगी है वही, इक बूंद की कहानी,
समेटता हूँ मैं, नाहक ही हथेलियों
पर, गिरते हुए उच्च जल प्रपात
का चंचल पानी, मोह
उतना ही है बेहतर
जिसे भूलने
में हो
ज़रा आसानी, कहां रुकता है कच्चे
घड़े का पानी।
* *
- - शांतनु सान्याल

28 फ़रवरी, 2022

अमन - ताबीज़ - -

जन अरण्य नहीं थमता, उत्सव, समारोह,
युद्ध - त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत, कोई नहीं
सुनता सीमान्त का मौन
क्रंदन, विशालकाय
मीन की तरह
निगल
जाते हैं महादेश, किनारे पर पड़े रहते हैं -
छिन्न भिन्न अर्ध जले हुए मानव
उपनिवेश, कुछ अस्थि पिंजर
कुछ धुंधले स्मृतियों के
अवशेष, बुझ जाते
हैं अपने आप
तथाकथित
मानव
सभ्यता के ज्योत, उत्सव, समारोह,युद्ध
- त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत। कलिंग
हो या सीरिया, ईराक से
ले कर यूक्रेन, वही
जल - साम्राज्य
का विधान,
सिर्फ़
मेरा ही हो हर तरफ वर्चस्व ज़मीं से ले
कर आसमान, हर युग में बदल
जाते हैं इंसानियत के
तजवीज़, कभी
देते हैं धर्म
की दुहाई
और
कभी बांध लेते हैं लोग अपनी बांहों में
नक़ली अमन ताबीज़, हालांकि
सीना रहता है भेदभाव से
ओतप्रोत, उत्सव,
समारोह, युद्ध
- त्रासदी
के मध्य हो कर, बहता जाता है जीवन
स्रोत।
* *
- - शांतनु सान्याल  

    

 

21 फ़रवरी, 2022

किनारे - किनारे - -

बहोत ख़ामोश थे सभी जाने पहचाने
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे, कभी
कहीं वो मिले तो पूछ
लेना ज़िन्दगी
का निचोड़
क्या
था, हर एक क़दम पर सुख दुःख के
नित नए समीकरण देखे, कभी
क्षितिज के ऊपर थे ख़्वाब,
और कभी शून्य में
थे डूबते हुए
सितारे,
बहोत ख़ामोश थे सभी जाने पहचाने
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे । कौन, किस
मोड़ पर मिला और
न जाने किस
अनजान
कूचे
पर खो गया, चाँदनी में थी निखरी -
हुई गुल मोहर की परछाइयां,
कोई किसी का हम सफ़र
नहीं होता फिर भी
दिल फ़रेब हैं
ज़िन्दगी
की
अथाह गहराइयां, कुछ अधूरी सी है
अपनी कहानी, कुछ असमाप्त
से हैं चाहत तुम्हारे, बहोत
ख़ामोश थे सभी जाने
पहचाने चेहरे, न
जाने कहाँ
गुम
हो गए रंगीन अक्स सारे, फिर भी
चल रहे हैं हम जीवन नदी के
किनारे - किनारे - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 








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