अंतर पृष्ठ का रहस्योद्धार है बहोत
मुश्किल, जिल्द देख कर नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई,
हर कोई अपने
अंदर लिए
होता
है
मुख़्तलिफ़ शख़्सियत, मुखौटे ओढ़
कर आसान है देना तक़रीर ए
नसीयत, कहने को एक
सी होती हैं सभी
परछाई, जिल्द
देख कर
नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई। एक ही हैं
सभी देह, एक ही सांचे में ढले
हुए, कुछ तपे हुए, कुछ
अध पके माटी के
रेत से मिले
हुए, कोई
नहीं
यहाँ शत प्रतिशत ख़ालिस, आज
नहीं तो कल हर एक को देनी
है भरपाई, जिल्द देख
कर नहीं होता
अंदाज़ ए
गहराई।
* *
- - शांतनु सान्याल

वाह बहुत खूब
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद मान्यवर ।
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