मैंने देखा है दूर तक एक जुलूस, हाथों में लिए
हुए पत्थर, और ओंठों पर मानवता का
सिंहनाद, एक विषाक्त प्रवाह में
बहते हुए लोग, बच्चे, बूढ़े,
जवान, स्त्री, पुरुष, न
जाने किस ग्रह को
करना चाहते हैं
आज़ाद,
हाथों
में लिए हुए पत्थर, और ओंठों पर मानवता -
का सिंहनाद ! रात के अंतिम प्रहर का
कोई दुःस्वप्न, अदृश्य नशे में
धुत लोग, हाथों में लिए
हुए खड्ग - खंजर
बढ़ चले हों जैसे
वध स्थल
की ओर,
न जाने किस मिथ्या प्रतिश्रुति के वशीभूत,
जी रहे हैं लोग विरोधाभास का जीवन,
वसुधैव कुटुम्बकम् के लोग अभी
तक सो रहे हैं बेख़बर, जबकि
हर तरफ है सुलगता
हुआ धर्म -
उन्माद,
हाथों में लिए हुए पत्थर, और ओंठों पर - -
मानवता का सिंहनाद !
* *
- - शांतनु सान्याल

नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 15 जुलाई 2022 को 'जी रहे हैं लोग विरोधाभास का जीवन' (चर्चा अंक 4491) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंवसुधैव कुटुम्बकम् के लोग अभी
जवाब देंहटाएंतक सो रहे हैं बेख़बर, जबकि
हर तरफ है सुलगता
हुआ धर्म -
उन्माद,
हाथों में लिए हुए पत्थर, और ओंठों पर - -
मानवता का सिंहनाद !..
यथार्थ का सटीक चित्रण दर्शाती सामयिक रचना । बहुत बधाई आदरणीय ।
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंवाह , सामयिक सशक्त रचना ...
जवाब देंहटाएंअसंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
हटाएंवाह! बेहतरीन सृजन आदरणीय सर।
जवाब देंहटाएंसादर
असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।
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