बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना, जो हथेली पर रुका
कुछ पल के लिए वो एहसास
ए बूंद है मुहोब्बत, जो
छलक गया मेरी
पलकों से हो
कर, वो
था
सुबह का कोई नाज़ुक सा सपना, बेदाग़
यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना। दिगंत पर आ
कर मैं ढूंढता हूँ शब ए
गुज़िश्ता का निशां,
कौन, किस
सिम्त
जा
मुड़ा कहना है बहुत मुश्किल, सुबह है
वही ताज़गी भरी, वही उन्मुक्त
आसमां, दरअसल पूर्व -
लिखित होते हैं
मिलना
और
बिछुड़ना, बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म
ए अंदाज़ है अपना अपना।
* *
- - शांतनु सान्याल

जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(०७-०४ -२०२२ ) को
'नेह का बिरुआ'(चर्चा अंक-४३९३) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
ह्रदय तल से आभार आदरणीया।
हटाएंबहुत सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार आदरणीया।
हटाएंह्रदय तल से आभार आदरणीय।
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