04 अक्टूबर, 2020

कितने दिनों बाद - -

कितने दिनों बाद ख़ुद से मुलाक़ात हुई,
चुप्पी सी रही दूर तक, दीवारों के पार,
बस देखता रहा, ज़रा सी न बात हुई।

अक्स था मेरा, या बेकरां ख़ामोशी - -
धुंआ सा, उठ रहा है, वादी ए ख़ाक में,
शायद मकां जलने के बाद बरसात हुई।

सुबह से शाम तक, उजालों ने है लूटा,
झुलसे हुए वजूद के सिवा कुछ भी नहीं,
जिस्म को जलाती हुई चाँदनी रात हुई।

वक़्त का तक़ाज़ा, जाने कहाँ जा रुके,
नंगे पाँव, चल रहे हैं राह ए आतिश पे,
उफ़क़ पार कितनी हंसीं कायनात हुई,

कितने दिनों बाद ख़ुद से मुलाक़ात हुई।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

03 अक्टूबर, 2020

चिरंतन कुछ भी नहीं - -

अशांत नदी, खोजती है तट फेनिल,
ज़िन्दगी फिर चाहती है आश्रय,
नयन नीड़ के अन्तःनिल,
पुनः आज का दिन,
कह रहा है छू
न सके
मुझ को, गोधूलि में बिखर से गए
सभी पल रंगीन, तुम्हारे सभी
अभिलाष सूचि, सीने में
हैं पंजीकृत, कांधे
पर अभी तक
है तुम्हारे
निःश्वास की त्रिकोणमिति, हाथों
में शून्य आवर्त, चलो खोजें
समय के जलपात्र में
कुछ अमूल्य
कौड़ियां,
वही
स्वर्णिम पल जो खो दिए हम ने
अकारण, ग़र तुम्हें मिल जाए
तुम सहर्ष रख लेना सभी
अशरफ़ी, मुझे मंज़ूर
हैं फूटी कौड़ियां,
श्रृंगार रात
का
नहीं चिरस्थायी, अभी माथे पर
हैं रुपहली, रौशनी के झूमर,
रात ढले न हो जाए हर
चीज़ धरासायी,
यहाँ कुछ
भी
नहीं चिरस्थायी - - न तुम न ही
मैं, और नहीं शान से तना
हुआ नीला शामियाना।
* *
- - शांतनु सान्याल  

 

 



होंठों के दोनों किनार - -

वसंत आए गए बहुबार, झरे पल्लव
समय के शाख से बेशुमार, फिर
भी मीठी लम्हों का स्वाद
अभी तक है गीले
होंठों के दोनोँ
किनार,
बांध के रखने की चाह में अक्सर - -
दूर होता जाए अपनापन,
जितना क़रीब जाएँ
उतना ही छूने
की इच्छा
बढ़े,
दूरत्व बढ़ते ही घिर आए असमय -
का सूनापन, कभी कभी पलकों
के बंद लिफ़ाफ़े, गुमशुदा
प्रेम पत्र के पीछे
भागे, और
कभी
हैं आमने सामने संवादविहीन हम
और तुम, चल रहे हैं अवरिल,
मौन आँखों के दरमियां
निबिड़ कथोपकथन,
निर्मेघ आकाश
फिर भी
भीग
चला है अंतर्मन, सिर्फ़ मौन आँखों के
दरमियां हैं निबिड़ कथोपकथन।
* *
- - शांतनु सान्याल

02 अक्टूबर, 2020

मसीहा का पता - -

कुछ धुंधले तारे आँखों में कहीं
डूब गए, कुछ थे नसीब -
वाले उन्हें मनचाहा
आकाश मिल
गया, इक
चुप्पी
सी रही दूर तक जब मैंने चाहा
उन्मुक्त हो कर जीना, सभी
दौड़ आए ले के दवा के
नाम पर नमक की
पुड़िया, शायद
उन्हें मेरे
गहरे
ज़ख़्म का एहसास मिल गया।
खड़ा हूँ मैं दरवाज़े पर पुनः
उनके, सवालों की लम्बी
फ़ेहरिस्त लिए हुए,
फिर वो हैं तैयार
छद्मवेश में,
मायावी
राहतों
के किश्त लिए हुए । अभिशप्त
पत्थरों के शहर में किसी
मसीहा का मिलना
मुश्किल है, घुन
लगे सिंह -
द्वार
के अंतःपुर में, हर एक चीज़ पर
है दाम्भिक ज़ंग का असर,  
शीशे के जिस्म को
निष्पक्ष इंसाफ़
मिलना
मुश्किल है, जो दे जाए जीने का
एक मुश्त अधिकार ऐसे
मसीहा का मिलना
मुश्किल
है।  
* *
- - शांतनु सान्याल









 

अंततः चीत्कार सो गए - -

यही वो पड़ाव है जहाँ चेहरे से उतर रहे
हैं चेहरे, ये बहुरूपियों का है कारवां
न जाने किस, विध्वंस मोड़
पर जा के ठहरे, फिर
वही प्रतियोगिता
दोहरा रहे हैं
लोग ख़ुद
को
मानवता का रहनुमा बतला रहे हैं लोग,
समाधिस्थल पर, उजले पोशाक
पहन कर. अंधकार को जैसे
छुपा रहे हैं लोग, यही
वो जगह है जहाँ
निःशब्द
हो
कर कल रात कितने चीत्कार सो गए -
नींद भी कांप जाती है किसी बुझते
हुए चिराग़ की तरह, सहमे
हुए ख़्वाब, जा बैठे
किसी नागकनि
के जंगल
में,
देखिए कितने सत्यवादी पहरेदार हो -
गए, सिसकियाँ घुट गईं अपने
आप, अंततः सभी चीत्कार
सो गए - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

01 अक्टूबर, 2020

एकल प्रहसन - -

 हम सभी हैं राजपथ के तमाशबीन,
खड़े हैं दोनों किनारे देखने के
लिए, गणतंत्र का एकल
प्रहसन, मुखौटे में
है कहीं छिपा
हुआ
हुकूमत का असली चेहरा, हंसता -
हुआ, शहर कोतवाल तो है
बस, किसी और की
उंगलियों का,
अदना
सा
एक मोहरा, पार्श्व में अभी तक है
जलते मांस का धुआं, वज़ीरे
आला ने फिर लगाई है
बेजान जिस्म की
एक मुश्त
क़ीमत,
मुंह बंद करने का वही एक तरीक़ा
है आदिमयुगीन, हम सभी हैं
राजपथ के तमाशबीन,
अचानक दीवार
के सभी लिखे
हुए नारे,
लग
रहे है बड़े फीके फीके से, पलस्तर
से पहले गिर रहे हैं वर्णमाला  
सारे, बचाव और पढ़ाव
के सिवाय कोई
शब्द वहां
नहीं
मौजूद, कुछ हैं बाक़ी तो वो भी -
हैं अर्थहीन, हम सभी हैं
सिर्फ वस्त्र विहीन,
राजपथ पर
खड़े
मूक तमाशबीन।
* *
- - शांतनु सान्याल


ढलान की दिशा में - -

ज़िन्दगी का नाम है बहना, हर हाल में
बहना, कभी ज़ेरे ज़मीं, तो कभी
चट्टानों को तोड़ते हुए, ऊँची
पहाड़ियों के धूप समेटे
हुए, कभी बादलों
के साए में,
स्मृति
चिन्ह छोड़ते हुए, पेंचदार तटबंधों के
किनारे, उम्मीद के बीज बोते
हुए, उसे गुज़रना है हर
हाल में, धूप छांव
में, भीड़ भरे
शहर
की संकरी गलियों से, निर्जन राजपथ
होकर, किसी साधु के जनशून्य
गाँव में, उसे खेलना है हर
हाल में, कभी राजा के
हार में, कभी
याचक
के तुरुप में, उसे रहना है हर हाल में -
कभी धुंधलाए अक्स में और कभी
पारदर्शी स्वरुप में, उसे बसना
है किनारे की बस्तियों में,
उसे छूना है लुप्त
शैशव की
नाज़ुक
कोंपलें, उर्ध्वमुखी करना है उन्हें भी
एक दिन, शायद उनका भी ज़िक्र
हो बरगद जैसे हस्तियों में,
मुहाने की नियति
अपनी जगह,
कभी कभी
समुद्र
ख़ुद ब ख़ुद ज़िन्दगी से मिलने आए
उसकी जगह।
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 
 



30 सितंबर, 2020

क्षितिज पार - -

कोई नहीं जानता कब और कैसे
बदल जाए हाथों की लकीर,
आज जो है मुकुट में
जड़ा क़ीमती
पत्थर
कल तक था वही अजनबी खदान
का, कोई गुमशुदा फ़क़ीर, यूँ
नज़र अंदाज़ तेरा कहीं
न बना जाए मुझे
ज़माने के
लिए
बेनज़ीर, सजे हैं कोहरे में सर्पिल  
रास्ते, जुगनुओं से आलोकित
हैं दिल की गहराइयाँ,
सिर्फ़ और सिर्फ़
तुम्हारे ही
वास्ते,
अन्तःस्थल में घनीभूत वो सभी
सुवासित मुहूर्त, उड़ना चाहे
तितलियों के झुण्ड,
तोड़ के सभी
रेशमी
धागों के ज़ंजीर, सीने में है कहीं
उष्ण कटिबंध, तेरी आँखों
से उड़ चले हैं महीन
मेघों के अनुबंध,
प्लावित मेरी
सांसों में
डूब रहे हैं कहीं शुष्क नदी के दोनों
तीर, किसे ख़बर क्या होगी
सुबह की तस्वीर।
* *
- - शांतनु सान्याल

सोने की चौखट -

कहाँ हैं पुरानी फ्रेम में नयी तस्वीर वाले,
रोज़ उभरते हैं दर्द ओ ग़म के किस्से,
कहीं चीख भी नहीं पाते टूटी फूटी
शरीर वाले, वही उज्जवल
वर्ण का अहंकार, वही
धर्म के ठेकेदार,
वही हम
और
तुम टूटी फूटी तक़दीर वाले। आज भी -
रहम की भीख मांगते हैं लोग,
आज भी सदियों की तरह
जीने का अधिकार
चाहते हैं लोग,
आज भी
वही
पुराने आईने में रामराज का बिम्ब -  -
तलाशते हैं लोग। यूँ तो घरों में
अभी तक है गहन अँधेरा,
मंदिर नदी घाटों में
है उजाला तो
रहे, मोक्ष
के लिए
शायद चाहिए वसुधैव कुटुंबकम का - -
सवेरा।

* *
- - शांतनु सान्याल  

   


29 सितंबर, 2020

अनसुलझे जीवन के समीकरण - -

यद्यपि कई पहेलियाँ अनसुलझी ही
रहीं, जज़्बाती परतों के नीचे, कई
रहस्य अपने आप ही रास्ता
तलाश कर गए दूर किसी
चिंगारियों के स्वर्ग !
लेकिन तुम्हारा
निःशर्त
प्रणय
ने आख़िर बदल ही दिया मानव - -
निर्मित सभी परिभाषाएँ, और
यही वजह है कि पृथ्वी,
पहले से भी कहीं
अधिक, अब
ख़ूबसूरत
लगती है, कुछ रिश्तों का मौन सौंदर्य
होता है सहस्त्र प्रणय गीत के
बराबर, कुछ अनुराग
कभी सूखते नहीं,
मृत्यु के बाद
भी रहता
है
उनका अस्तित्व, कभी भोर की कच्ची
धूप की दस्तक लिए, कभी ओस
कणों में इंद्रधनुष का बिम्ब
समेटे हुए, और कभी
अशरीर हो कर
भी रहता
है वो
हमारे अनुभूतियों के बहुत अंदर, किसी
अरण्य पुष्प की महक लिए, वो
उतरता है निःशब्द दिल की
असीम गहराइयों में,
अपने आप में
व्यतिक्रम
लिए
हुए वो रहता हमारे साथ हमेशा के लिए,
अनसुलझे, किसी समीकरण की
तरह - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 



आगामी दिन - -

कुछ दर्द रहते हैं उम्र भर, रेशमी कोषों
में बंद, ईशान कोणीय मेघों में
कहीं दफ़न बूंदों के ख़्वाब,
कुछ रिश्ते रहते हैं
गुम, गोधूलि
आकाश
में
तैरते हुए वर्णिल नक़ाब, खोजते हैं उन
विलीन चेहरे को, पंख विहीन भीगे
मेरे ख़्वाब, कभी कभी चुभने
वाला आलपिन, बना
जाता है शेष पथ
रंगीन, टूटी
चप्पल
सीखा जाती है बहुत कुछ ज़िन्दगी का
हिसाब, उतरती धूप दीवारों में
लिख जाती है कहीं रात
का पता, टिटहरी
की आवाज़
ले
जाती है मेघरंग, बंद लिफ़ाफ़ा, शायद
आख़री पहर से पहले, बारिश के
हमराह आ जाए कोई जवाब,
आगामी दिन तक
ख़्वाबों का ज़िंदा
रहना है
ज़रूरी,
हम रहें, या न रहें, हमें यक़ीं है ज़रूर
इक दिन आएगा दुआओं
वाला इन्क़लाब,
हर शख़्स
को
मिलेगी अपने हिस्से की रोशनी, हर -
चेहरे में होगा रंगत ए गुलाब।  
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

 


बारम्बार वापसी - -

जीवन की परिभाषा, उलझा हुआ ऊन
का गोला है, इस सिरे को लपेटो
तो खुल खुल जाए दूसरा
किनारा, चंद शब्दों
के गांठ से उसे
बांधना है
कठिन,
अंतहीन चाहतों का अध्याय, समझने
में जिसे पुनर्जन्म का है सहारा।  
वो ख़्वाब जिसमें हर एक
चेहरा लगे खिलता
हुआ गुलाब,
और
रिश्तों में हो पारदर्शिता अगाध।  उस -
दिव्य स्तर पर काश पहुँच पाए
कभी, अंतरतम का कुहासा
इतना घना कि अपना
बिम्ब भी न देख
पाए कभी।
उस
अदृश्य परिधि में जिस बिंदू से निकले
उसी बिंदू पर पुनः हम लौट आए,
और अधिक, और ज़्यादा
पाने की ख़्वाहिश,
अंदर गढ़ता
रहा
तृषित बियाबान, क्रमशः हम भूलते गए
दूसरों के निःश्वास, मुस्कुराहटों के
नेपथ्य का दर्द, बचाते रहे ख़ुद
को अंधकार गुफाओं से,
पाँव पसारता रहा
लेकिन हमारे
बहुत अंदर
तक
अनिःशेष रेगिस्तान। तुम्हारे चुम्बन - -
आलिंगन, सुखद नज़दीकियां सभी
थे अर्थहीन, रूह को किसी तरह
भी न बाँध पाए, वो घुटता
रहा पिंजर में किसी
अर्ध पंखी शुक
की तरह,
और
कभी किसी तरह उड़े भी तो सुदूर नील -
समुद्र हंसता रहा लवणीय व्यंग्य
की तरह - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

28 सितंबर, 2020

जिओ और जीने दो - -

सब संतुलन का खेल है, दो छोरों के
मध्य खींची हुई है नियति की
रस्सी, जीवन को गुज़रना
है एहतियात से दोनों
हाथ लिए सपनों
के पतवार,
मौसम
गा रहा है रहस्यमयी सुर में सरगम,
संतुलन के खेल में अपने पराए
सभी हैं बराबर, सभी हैं
एक समान दर्शक,
कभी शाबासी  
और कभी
बद दुआ
बेशुमार, लड़खड़ाते कभी संभलते उस
पार पहुँचने की कहानी कुछ भी
नहीं, रस्सी के नीचे थी फूलों
की वीथिका या अशेष
मरुधरा, ज़रा भी
सोचने का
वक़्त
ही न मिला, मेरी आँखों में था उस पार
का बिल्लौरी किनारा, मेरी भूमिका
ही थी सब से अहम, मैंने
निभाया उसे सारा,
न कोई मुझ
से जीता
न मैं
ही किसी से हारा, इसलिए मुझे किसी  
बात का तनिक भी पछतावा न
रहा, "जिओ और जीने दो"
ही रहा ज़िन्दगी का
एकमेव अदृश्य
नारा।
* *
- - शांतनु सान्याल  



निरुत्तर पलों का इतिहास - -


अचानक एक दिन, उसने पूछा - दिल
की गहराइयों का पता, प्रेम की
परिसीमा, न जाने क्या था
उसके अनुभूति का
मापदंड, मैं
निर्वाक
उसे देखता ही रहा, शायद तब सूर्य -
डूबने को था, निःशब्द छपाक
की तरह, उसके आँखों में
तैरते आए नज़र
प्रश्नचिन्हों
के भंवर,
जवाब की तलाश में चुराती रही मेरी
निगाह उसकी नज़र, और उसी
कश्मकश में कब शाम ढली
और कब घिर आया
सुरमयी अँधेरा
पता ही
न चला, कुछ प्रश्न, आजन्म रहते हैं
निरुत्तर, नीरवता के सीने में
उस दिन टूटे थे स्वप्निल
गुलदान, सठिक
विकल्प
खोजना था उन पलों में बहुत कठिन
देह और प्राण के दरमियान,
नज़रअंदाज़ करना भी
न था आसान,
उसके
संक्षिप्त निगूढ़ प्रश्न का उत्तर मैंने
चाहा था गढ़ना अपने इच्छाओं
के अनुरूप, जहाँ प्राण का
मूल्य था नगण्य
और दैहिक
सत्ता
थी अमूल्य, केवल बाह्य आवरण - -
और छद्म रंगरूप, गंध विहीन
पुष्प की नियति, रंगीन
कागज़ों से उभरी
चमकदार
कृति,
शायद यही वजह थी कि कुछ ही पलों
में जल के राख हुए अगर - चन्दन
के धूप, सिर्फ़ उठा गंधविहीन
उर्ध्वमुखी धुआं, और
पृथ्वी पर पड़ा
रहा शापित
निर्जल
देह का कुआं।
 * *
- - शांतनु सान्याल
    
 

 



सर्वदा संभव नहीं - -

पाप पुण्य के चक्रांत में फेंक देह प्राण,
वो अब अर्ध नग्न शरीर लिए चढ़
रहा है मंदिर सोपान, नदी
यथारीति, देखती है
विस्मय से
उसका
ये आडम्बर युक्त आरोहण, उत्तरीय -
विहीन काँधे से छलकना चाहता
पवित्र जल कुम्भ, वो अभी
है महा ऋत्विक, पार
कर आया हो जैसे
क्षीरसागर !
शायद
वो अब पोंछेगा, देवालय का उपास्यमंच,
गूंथेगा कुसुम माला, पत्थर में घिसेगा
चन्दन काठ, जगाएगा पञ्च
प्रदीप, किन्तु ह्रदय शंख
यथावत है निःशब्द,
ध्वनि विहीन
चाहे
जितना फूंको, प्रतिध्वनि लौट कर नहीं
आएगी, तुलसी माला छू कर वो
करना चाहता है प्रायश्चित,
लेकिन उसके देह कोष
में हैं सहस्त्र माया
आबद्ध ! वही
आदिम
युगीन आग्नेय खेल, बलात प्रस्फुटन
का है वही नेपथ्य दलपति, विश्व
में सिर्फ वही नहीं नक़ाबपोश,
समस्त तथाकथित
दिव्यलोक के
ठिकाने
है उन्हीं छद्म पुरुषों के पास, उन्हें ज्ञात
है कैसा रखा जाए समाज को अपनी
मुट्ठी में, वही धीमे ज़हर का
दीर्घकालीन असर,
अपने वजूद
के लिए
जादू का खेल और अंत में अपने माथे
पर रंगीन पंखों का गुच्छ ! जो
कहना चाहता है, वही एक
है श्रेष्ठ पुरुष, धर्म
का एकमात्र
पुरोधा,
समाज केवल है उसका अनुचर, शोषण
का चाबुक है उसके हाथ वो जहाँ
चाहे वहां ले जाएगा हाँक
कर, लेकिन उसी
बिंदू पर है
ठहरा
हुआ आगामी काल का महाभारत किसी
अदृश्य शंख के उद्घोष पर - -
* *
- - शांतनु सान्याल


27 सितंबर, 2020

निजस्व वानप्रस्थ - -

वैराग्य के मुखौटे को रख आया है जीवन
उसी दिवार के मायावी कील पर, यहीं
पर सत्य का है बहु प्रतिबिम्ब,
अंदर के कलंकित नायक
का आर्विभाव ! ख़ुद
के अंदर ख़ुद
को खो
के
पाना, चक्रव्यूह तोड़ के अभिमन्यु का - -
पुनर्जन्म, अनावृत्त शरीर का
अदृश्य अंगार शयन, चेहरे
पर जमे परतों का
क्रमशः पतन,
उज्जवल
रात में
हिमनद का अदृश्य गहराई में विगलन, -
आँखों के सामने चरमरा के टूटता
अंतर्मन का दर्पण ! इन्हीं
टूट - फूट के मध्य
छुपा होता है
उद्भासित
रहस्य
का जगत, पाप पुण्य का लेखाचित्र - - -
पुनः प्रवर्तन, उष्ण आंच से
निस्तार, परिपूर्ण
जीवन की
मन्त्र
प्राप्ति, स्वमूल्यांकन की पुनरावृत्ति, - -
चार दीवारों में रह कर भी छू न
पाए जिसे दुनिया की कोई
रंगीन आसक्ति, ख़ुद
के भीतर निजस्व
वानप्रस्थ।
 * *
- - शांतनु सान्याल
 
     


  

उत्तरायण का इंतज़ार - -

धुंधभरे जिल्द की किताब को रख दो
कहीं कांच की अलमारी में बंद,
जीवन की वास्तविकता
ग़र जानना हो
तो मिलो
उस
अंधकार गली के किसी मोड़ पर जहाँ
शैशव एक ही रात में पहुँच जाता
है पूर्ण वयस्कता की ओर,
सूर्य की प्रथम किरण
में खिलने की
चाह
असमय ही मर जाती है सीने के - -
बहुत अंदर, श्वासरुद्ध  और
धुंएँ के मध्य कहीं
जीवन करता
है मौन
संधि,
परस्पर जहाँ शिकायत की कोई भी
जगह नहीं, सिर्फ़ वर्तमान के
साथ समझौता, जहाँ
अतीत और
भविष्य
की बातें जीवाश्म से अधिक कुछ -
भी नहीं, उन धुंधभरे गुमशुदा
पृष्ठों में हांफ उठते हैं कुछ
निःशब्द चेहरे, कुछ
कुछ फेर लेते
हैं नज़र
अजनबी की तरह, जहाँ खुल जाती
हैं अपने आप आत्मीयता की
गिरह, उन्हें मालूम है
उन्हें उठाने के
लिए कोई
अर्जुन,
कोई मसीहा न आएगा, उम्र भर वो
सिर्फ करते हैं प्रतीक्षा किसी
उत्तरायण का - -
* *
- - शांतनु सान्याल    





26 सितंबर, 2020

यात्री विहीन सफ़र - -

उस रेशमी अंधकार में जान पाना
नहीं था आसान, कहाँ हैं
अंतिम घाट की
सीढ़ियां और  
कहाँ
है नदी गह्वर, सिर्फ़ अंदाज़ से -
जीवन बढ़ता गया, उसकी
प्रणय गभीरता की
ओर, अदृश्य
भावनाओं
की
उन जलज लतिकाओं में, खोजता
रहा उसके सीने का मर्मस्थल,
सिर्फ अनुमान से अधिक
कुछ भी न था, कभी
किनारे से सुना
उसका
अट्टहास, और कभी मृत सीप के -
खोल में देखा चाँदनी का
उच्छ्वास, वो कोई
सुदूरगामी ट्रेन
थी मध्य -
रात
की, यात्री विहीन, देवदार अरण्य
के स्टेशन में रुकी कुछ पल,
अंतिम प्रहर के स्वप्नों
को बिठाया और
सुदूर कोहरे
के देश
की ओर गई निकल, निष्पलक -
मैं देखता रहा उन्हें दूर तक,
शायद उनका गंतव्य
हो क्षितिज के
उसपार,
किसी शिशु की निश्छल मुस्कान
में हों कदाचित उनका घर,
किसी मरुभूमि के टीले
पर वो मेघ कण की
तरह जाएं
बिखर,
किसी बंजारे प्राण को मिल जाए -
गुमशुदा अपना घर।
* *
 - - शांतनु सान्याल


 
 
 



सुबह का विष पान - -

क्या तुम अब तक बैठे हो घुटने में
सर को छुपाए, अलिंद से उतर
कर बहुत पहले दोपहर की
धूप जा चुकी है सुदूर,
पोखर किनारे
खड़ा
एकाकी खजूर पेड़ पर लौट आई है
मायावी अंधकार, थम चला
है पक्षियों का कलरव,
क्या तुम अभी
भी खोज
रहे
हो बासी फूल के नीरस गंध, अतीत
के पृष्ठों में लिखी कोई अबूझ
कविता, जीवन तो है चिर
उद्दाम, खेलता है लुक -
छुप नियति के
साथ, अब
भी
रात है बहुत बाक़ी, आलोक - छाया -
का खेल, अभी तो सिर्फ आरम्भ
की है बेला, कौन है मृग और
कौन मृगया, सब कुछ
है अनागत के
गर्भ में
समाहित, खोने और पाने के मध्य
ही छुपा है जीवन का सारांश,
ब्रह्मशिरा हर युग में
उभरती है दिगंत
पार, हर युग
में जन्म
लेता
है कोई न कोई तारणहार, हर एक - 
सुबह निगलती है विषाक्त
अंधकार - -
* *
- - शांतनु सान्याल





 


25 सितंबर, 2020

ख़्वाब का ठिकाना - -

अपने आप खुल चले हैं लम्हों की
सिटकनी, सिर्फ़ कुछ स्तम्भ
हैं बाक़ी, उन्मुक्त हैं सभी
प्राण द्वार, रिक्त है
पिंजर, कोहरे
में है
प्रवाहित अनबूझ ख़्वाहिशों की -  
बालकनी। अकस्मात मौन
है छद्मवेशों का शहर,
अचानक तुम
और मैं
फिर
हैं अंतर्लीन, कदाचित बहुत पास
है आख़री पहर। तुम्हारे सीने
में है कहीं आबाद, सुख
का देश, ख़ाना -
बदोश -
दर्द
मेरे चाहें वहां अदृश्य प्रवेश। कोई
मेघ संग उड़ता ख़त, छूना चाहे
मेरी पलकों को, शायद
उसे मालूम है रत -
जगे ख़्वाब का
ठिकाना,
कुछ
कविताएं शीर्षकविहीन,परिचित
गंध लिए, दुआओं के मौन
शीत स्पर्श रख जाती हैं
चुपचाप उष्ण माथे
पर, फिर कोई
विवर्ण
पलों को चाहता है निशिपुष्प से
सजाना, उसे मालूम है रत -
जगे ख़्वाब का ठिकाना।
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

   

 
 
 
 


विप्लवी बिहान - -

एक अनिःशेष तृषा लिए सीने में,
जब टूट जाए मध्यरात की
गहरी नींद, तब खुले
खिड़की के पार
मैं खोजता हूँ
टुकड़े -
टुकड़े उल्का आलोक, रात्रि तब
लगती है बहुत असहाय,
लंगड़ाते हुए चली
जा रही हो
सुदूर
ओढ़े हुए सदियों पुरानी गहरी -
काली शाल, न जाने कौन
है खड़ा दिगंत पार
हाथों में लिए
उजालों
का
हार, या वो भी मेरी तरह है मृग
तृषा की शिकार, मैं अपलक
उसे देखता हूँ कौतुहल
से, वो चली जा
रही अकेली,
पत्तों
की तरह झर रहे हैं आकाश से -
तारक वृन्द, और छंट रहे
हैं अभिशापित घने
अंधकार, धीरे -
धीरे
क्षितिज में उभर चले हैं, रंगीन
विप्लवी वर्णमाला, फिर
कोई बढ़ाएगा हाथ,
व्यथित
अहल्या को है युग - युगांतर से
प्रतीक्षा, कोई सुबह तो
ले, पुनः कालजयी
अवतार।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

24 सितंबर, 2020

एकाकी यात्रा - -

 कुछ लोग अंदर से होते हैं सघन
आभासी, बाहर से धुले हुए,
उजले उजले से, कोरे
कपड़े की तरह,  
करते हैं
इकट्ठे सिर्फ शाबासी। कुछ लोग -
बाहर से होते हैं धूसर, किंतु
अंतर में छुपाए रखते
हैं मरूद्वीप, जैसे
मुक्ता छुपा -
रखे कोई
सीप।
किताबों में जो ढूंढते हैं रूपकथा,
वो क्या जाने ज़िन्दगी की
वास्तविकता, अग्नि -
पथ में चले बग़ैर
मुश्किल है
जलने
की
अभिज्ञता। तुम क्यूँ न जीत लो  
सारी दुनिया, दर्पण उतार
ही देगा तुम्हारे छद्म -
आवरण, अंतर्मन
के आगे तुम
निर्वस्त्र
खड़े
हो, बिखरे पड़े हैं चारों तरफ बस
चमकीले मिथ्याचरण। अपने
ही यक्ष प्रश्नों का उत्तर
देना यहाँ आसान
नहीं, सभी
अपने
पराए लौट गए, उठता रहा धूम्र
वलय उर्ध्वमुखी, तुम्हारे
हाथों में अब कोई भी
आसमान नहीं,
आकाश
पथ
में तुम्हारी है एकाकी यात्रा, यहाँ
किसी से कोई जान पहचान
नहीं, न सराय, न कोई
रहनुमा, तुम हो और
महाशून्य, यहाँ
कोई वास
स्थान
नहीं।
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

हथेलियों में बंद धूप का वृत्त - -

सारा शहर भीगा, रस्ते घाट भीगे,
कपोत काग भीगे, झरोखों
से लिपटे उजालों के
याद भीगे, बहुत
अंदर है कोई
गंधक का
खदान,
न बुझे न ही परिपूर्ण सुलगे बस
दूर तक धुंआ सा उठे, सभी
सीमाबद्ध हैं अपने ही
दायरों में, कैसा
लेना देना,
कोई
सोए इस तरह की उम्र भर न -
जगे, कभी सजल लम्हों
में उतरती रही रोशनी
तेरी निगाह से,
कभी तेरी
आंखों
में बहुत धुंधला सा आसमां लगे,
मैंने पूछा है तेरा पता डूबते
तारों से, उभरते सुबह
के उजालों से,
कभी तू
है मेरे
मुट्ठी में तितली की मख़मली - -
एहसास लिए कभी
गुमशुदा मशालों
का कारवां
लगे,
छप्पर के किसी छेद से उतरती
है वो ख़ुशी, कुछ पलों के लिए
ही सही तू मेरी हथेलियों
में ठहरे हुए विद्रोह
का निगहेबां
लगे ।
* *
- - शांतनु सान्याल

23 सितंबर, 2020

क्षणिक सुख - -

कभी स्थिर पलों में, बहुत कुछ कहने
की चाह में, कांपते हैं होंठ, कभी
बहुत कुछ कहने के बाद भी
रह जाती है, दिल की
बात दिल में,
कभी
निगाहों में उभरते हैं महीन बादलों के
कण, कभी डूब जाती हैं पलकें
अपने ही साहिल में। कोई
नहीं रुकता किसी के
लिए, ज़िन्दगी
का सफ़र
किसी
ख़्वाब ए दरख़्त से कम नहीं, दूर से
देखो तो वादी ए नील नज़र आए,
क़रीब पहुंचो तो उष्ण बालू
का है टीला, माया मृग
की तरह दौड़ता
रहता है
ख़्वाहिशों का ये बेलगाम सिलसिला।
चाहते हो मुझे छूना, नज़दीक
से अनुभव करना, अपनी
हथेलियों में रखना,
कुछ पलों का
सुख, ये
जान के भी, मामूली सा बुलबुला हूँ -
पानी का, रख लो मुझे जहाँ
चाहे, तुम्हारी हो मर्ज़ी,
न हो जाए पटाक्षेप
पलक झपकते,
मेरी रंगीन
कहानी
का।
मामूली सा बुलबुला हूँ पानी का - - -
* *
- - शांतनु सान्याल

 




पुनः देह प्रवेश - -

 

बरामदे की आयु समाप्ति की ओर है
या धूप की है अपनी निर्वाचन
विधा, कहना कठिन है,
लेकिन यही तो है
जीवन की
वास्तविकता, समय का स्रोत कभी
नहीं रुकता बहा ले जाता इस
पार उस पार सब कुछ,
दोनों किनारे में
पड़े रहते
है कुछ
स्मृति के धूसर खोल, और विस्मृत
गीतों के स्वरलिपि, जीवन नैया
अपने लय में बहती जाती
है सुदूर अज्ञात द्वीपों
की ओर, फिर
भी मन
लौट के देखना चाहता है पीछे छूटे
हुए घाट, मंदिर की सीढ़ियां,
और सुदूर टिमटिमाते
हुए साँझ बाती,
और मद्धम
सुरों
में सांध्य आरती, कहीं बहुत दूर तुम
अभी भी खड़ी हो, धुंधलके में
लेकर आँखों में स्वप्न
अंजलि, इतना
सहज नहीं
मायावी
दीपों को नदी के तट पर यूँ ही बहा
देना, अचानक सब कुछ जैसे
सहस्त्रमुखी आरसी -
नगर, चारों तरफ
प्रतिध्वनित
ख़ुद का
प्रतिफलन, शेष प्रहर में नदी का - -
सहसा सूख जाना, पलातक
भावनाओं का पुनश्च
देह के टूटे पिंजर
में लौट आना,
बरामदे
की
एक मुट्ठी धूप की चाहत आसानी से
ख़त्म कभी होती नहीं - -  
* *
- - शांतनु सान्याल





अंतहीन नीरवता - -

तुम्हीं गढ़ने वाले, तुम्हीं हो उपासक
और तुम ही हो डूबाने वाले,
समझ के परे है ये
विनिमय का
खेल।
फिर भी मैं हमेशा की तरह दौड़ आती
हूँ, वही शिउली गंध भरे पथ से
तुम्हारे द्वार, तुम्हारे हाथों
ही होता है मेरा समर
श्रृंगार, और हो
उठती हूँ
रण -
वीरांगना, करती हूँ रिपु दल का संहार,  
मुझे ज्ञात है, बहुत कठिन है उस
हाड़ मांस के असुर का दमन,
दिग दिगान्तर में बिखरे
हुए हैं सहस्त्र बीज
के अंकुरण,
तुमने
केवल खेला है गुड़ियों का खेल, शायद
इसी कारण मैं रह गई मात्र माटी
की प्रतिमा, और खेल के अंत
में बहा दी गई मलिन
स्रोत में, चिर
उपेक्षित
अबला के रूप में, तुमने गढ़ा अवश्य
लेकिन प्राण प्रतिष्ठा रही अधूरी,
इसलिए मेरी नियति रही
केवल मृण्मयी,
अंतहीन  
नीरवता की प्रतीक, सिर्फ़ एक मौन - -
प्रतिमा।
* *
- - शांतनु सान्याल


22 सितंबर, 2020

पुनर बलिदान - -

उस आर्द्रा नक्षत्र के, गाढ़
तमस वर्षा की रात में,
तुमने दिया था मुझे
अभयदान, मैंने
चाहा था
सिर्फ
कुछ प्रहरों का आश्रय, ये
जान कर भी कि मैं हूँ
एक शत्रु देश का
पलातक
सैनिक,
रुधिर झरित बाहु पर - -
तुमने बाँधा था
विश्वास का
 छिन्न
आँचल, उस करुणाधारा
में परितृप्त हुआ  
आहत देह
प्राण,
समवेत कण्ठों से उठा - -
तुम पर देश द्रोह का
अभियोग, क्रोधित
था सम्पूर्ण
बुद्ध -
विहार, संघ प्रमुख ने - -  
दिया तुम्हें मृत्यु
का उपहार,
तुम्हारे
दो प्राञ्जल नेत्रों में था
मुक्ति द्वार, मैंने
किया मुक्ति -
स्नान,       
चैत्य
प्रांगण में थी अपार  - -
भीड़, लांछित,
अपमानित
चेहरे में
थी
लेकिन तेजस्विनी हंसी,
और हाथों में विष पात्र,
तुमने कहा ये नहीं
अवसान, हे !
तथागत
मानवता के लिए पुनः
प्रस्तुत होगा मेरा
बलिदान - -  
* *
- - शांतनु सान्याल    





काश जान पाते - -

वो आदमी जो फूटपाथ पे रात
दिन, धूप छांव, गर्मी सर्दी
अपने हर पल गुज़ार
गया, काश जान
पाते उसके
ख़्वाबों
में ज़िन्दगी का अक्स क्या था,
वो शख़्स रोज़ झुकी पीठ
लिए बड़ी मुश्किल
से रिक्शा
चलाता
हुआ
कल शाम गिर कर उठ न पाया,
काश जान पाते कभी उसके
 दिल में सुबह की
तस्वीर क्या
 थी वो
चेहरा गुमसुम रेस्तरां में आधी
रात ढले काम करता रहा,
उम्र भर गालियाँ
सुनता रहा,
काश
जान पाते उसके बचपन के हसीं
लम्हात क्या थे, वो बूढ़ा
माथे पे बोझ लादे
हुए मुख़्तलिफ़
ट्रेनों का
पता
देता रहा, मुद्दतों प्लेटफ़ॉर्म में
तनहा ही रहा, काश जान
पाते उसकी मंज़िल
का पता क्या
था, शहर
के उस बदनाम बस्ती में,पुराने
मंदिर के ज़रा पीछे, मुग़लिया
 मस्जिद के बहोत क़रीब,
शिफर उदास वो
बूढ़ी निगाहें
तकती
हैं गुज़रते राहगीरों को, काश
जान पाते उसकी नज़र
में मुहब्बत के
मानी  
क्या थे, वृद्धाश्रम में अनजान,
भूले बिसरे वो तमाम आँखें
झुर्रियों में सिमटी
जिंदगी, काश
जान
पाते, वो उम्मीद की गहराई
जब पहले पहल तुमने
चलना सिखा था,
वो मुसाफिरों
की भीड़,
कोलाहल, जो बम के फटते
ही रेत की मानिंद बिखर
गई ख़ून ओ हड्डियों
में काश जान
पाते कि  
उनके लहू का रंग हमसे कहीं
अलहदा तो न था, ख़ामोशी
की भी ज़बाँ होती है,
करवट बदलती
परछाइयाँ
और
सुर्ख़ भीगी पलकों में कहीं,
काश हम जान पाते
ख़ुद के सिवा भी
 ज़िन्दगी
जीतें हैं
और भी लोग - - - - - - -
* *
- - शांतनु सान्याल

निकटवर्ती लोग - -

निःशर्त कुछ भी नहीं है इस
जगत में, फिर भी
अच्छी लगती
है झूठी
प्रतिश्रुति, कुछ भीगा भीगा
सा मनुहार, ज़रा सा  
ही सही कुछ तो
रहे मेरे
भीतर,ग्रीष्म शेष की अनाहूत
सांध्य वृष्टि, कदाचित
सोंधी गंध बन
जाए एक
दीर्घकालीन अनुभूति, बहुत -
दिनों के पश्चात वो झांक
गए अधखुले दरवाज़े
से, कहने को यूँ
तो वो हैं
बहुत
निकटवर्ती, दरअसल हर कोई
है अपनी ही परिधि में
उलझा हुआ, किसे
कौन कहे भला
बुरा, सब
कुछ
तो है अपनी ही निर्मिति, बस
वक़्त के प्रवाह में ख़ुद को
बहाना है ज़िन्दगी,
अच्छी लगती
है झूठी ही
सही
प्रतिबिम्ब की शून्य प्रतिश्रुति।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

21 सितंबर, 2020

विसर्जन पथ - -

अनंत काल तक मैं लौटना चाहूंगा उसी
नदी के किनारे, जहाँ छूती हों वट -
जटाएं बृहत् नदी के धरातल,
निःसीम आकाश के
तारे जिसके
वक्ष में
लिखते हैं कृष्ण राधा की पदावली, मैं -
जन्म जन्मांतर तक रहना चाहूंगा
उसी घाट के पत्थर में, जहाँ
उजान प्रवाह के नाविक
बाँध जाते हैं अपनी
मयूरपंखी नौका,
मैं बारम्बार
आना
चाहूंगा उसी धूसर गली में,जहाँ खेलते
हैं बच्चे नदी - पहाड़, वहीँ कहीं मैं
छूना चाहूंगा बचपन की जल -
छवि, ग़लत शब्द विन्यास
का प्रथम प्रणय पत्र,
जो अप्रेषित
रहा
आज तक, मैं हज़ार बार आना चाहूंगा
उसी पगडण्डी में, जो जाती है नदी
की ओर, जहाँ से देवी लौट
जाती है कैलाश, उसी
जल गर्भ में डूब
के देखना
चाहूंगा
जीवन का  वास्तविक प्रतिबिम्ब - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

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