21 अक्टूबर, 2022

सिलवटों का रहस्य - -

अनंतकाल तक कोई नहीं रहता किसी के
साथ, फिर भी किसी प्रहरी आत्मा की
तरह हम चाहते हैं अदृश्य वृत्त
रेखा अपने आसपास, एक   
ऐसा तिलस्मी संदूक
जिसके अंदर हों
सप्तरंगी
मोहक
रेशमी लिबास, हम चाहते हैं अदृश्य वृत्त
रेखा अपने आसपास। न जाने कितने
तहों में हैं बंद, ख़्वाहिशों के अंबार,
ऊपर से है कुनकुना धरातल,
अंदर में छुपा रहता है
अनबुझा अंगार,
समुद्र तट
पर सूर्य
का  
सहपलायन संयोग था या पूर्व नियोजित,
रात भर अंधेरा करता रहा उजाले की
तलाश, हम चाहते हैं अदृश्य
वृत्त रेखा अपने आसपास।
सिलवटों में कहीं है छुपी
हुई ज़िन्दगी की
कहानी, हम
हर एक
सुबह
हथेलियों से करते हैं उसे सपाट, अक्स
नहीं खोलता लेकिन रहस्य भरा
कपाट, वही दूर तक होती है
अंतहीन ख़ामोशी, उठ
जाते हैं जब मायावी
हाट, तब हम
करते हैं
वृत्त
रेखा से बाहर निकलने का प्रयास, हम
तोड़ना चाहते हैं परिधि रेखा जो
घिरा होता है आसपास !
 * *
- - शांतनु सान्याल    सिलवटों का रहस्य - - in video form
 



 


20 अक्टूबर, 2022

अतृप्त अनुराग - -

ऊंची इमारतों से बचते बचाते आज भी
पहुंचती है सर्दियों की नरम धूप,
पुरातन आरामकुर्सी पर
कोई हो या नहीं,
वो दे जाती
हैं ज़िंदा
होने
का सबूत, बालकनी भी जैसे जी उठता
हो उसके साथ, जी उठते हैं सभी
ज़िन्दगी के गुज़रे हुए पल,
कुछ सुरभित छुअन,
कुछ अदृश्य
सिहरन,
खिल
उठता है धुंधलाए दर्पण में मुरझाया - -
हुआ रूप, ऊंची इमारतों से बचते
बचाते आज भी पहुंचती है
सर्दियों की नरम धूप ।
फिर चिराग़ों को
है दिवाली
का
इंतज़ार, अंधेरे से उजाले की ओर फिर
ज़िन्दगी जाने को है बेक़रार, कोई
यक़ीं करे या नहीं, हर एक रात
उन्मुक्त आकाश का बाट
जोहती है ये ज़मीं,
ख़ुद को ढालना
चाहती है
वो -
आकाश गंगा के अनुरूप, अनगिनत
सितारों का सौंदर्य अनूप, ऊंची
इमारतों से बचते बचाते
आज भी पहुंचती है
सर्दियों की
नरम
धूप ।
* *
- - शांतनु सान्याल  

अतृप्त अनुराग - -VIDEO FORM


 




19 अक्टूबर, 2022

बूंद - बूंद ख़्वाब - -


वो ख़्वाब जो गिरते हैं अंध गुफाओं में बूंद -
बूंद भूमिगत जल की तरह, समय बना
देता है हर एक को झूलता हुआ
बिल्लौरी झाड़ फ़ानूस,
उजालों के हरि -
लूट में लोग
अक्सर
रौंद जाते हैं नाज़ुक भावनाएं बासी फूल - - 
की तरह, वो ख़्वाब जो गिरते हैं अंध
गुफाओं में बूंद - बूंद भूमिगत
जल की तरह। उस मोड़
पर हम नहीं लौटना
चाहते जहाँ से
ज़िन्दगी
ने किया था सफ़र का आगाज़, लेकिन शून्य
मील का पत्थर उम्र भर करता है हमारा
पीछा, चाह कर भी हम उसे नहीं
कर सकते नज़र अंदाज़,
उसे हम ढोते हैं
अपने अंदर
किसी
अदृश्य दख़ल की तरह, वो ख़्वाब जो गिरते
हैं अंध गुफाओं में बूंद - बूंद भूमिगत
जल की तरह। प्रारब्ध का होता
है अपना ही अलग विधान,
कल, आज और परसों
के मध्य झूलता
रहता है किसी
लोलक
की
तरह इंसान, कोई नहीं परिपूर्ण सुखी यहाँ -
कुछ आग सुलगते हुए, कुछ दबे रहते
राख के बहुत अंदर, बुझना है
सभी को एक दिन क्या
भिक्षुक और भला
क्या सिकंदर,
फिर भी
हर
हाल में ज़िन्दगी लगती है ख़ूबसूरत किसी
अनदेखे मंज़िल की तरह, वो ख़्वाब
जो गिरते हैं अंध गुफाओं में
बूंद - बूंद भूमिगत जल
की तरह।
* *
- - शांतनु सान्याल
बूंद - बूंद ख़्वाब - - video form

 

 

 






 

16 अक्टूबर, 2022

ख़ुश्बुओं का सुराग - -

मुझे मालूम है दिगंत की सत्यता, कभी
नहीं मिलते पृथ्वी और आकाश, वो
जो एक हल्की सी रेखा उभरती
है सुदूर अँधेरे और उजाले
के दरमियां, बस वही
बांधे रखती इस
ज़िन्दगी को
अपने
साथ, कुछ यादों की परछाइयां, कुछ -
सूखे ज़र्द गुलाब, इसके अलावा
कुछ भी तो नहीं मेरे पास,
मुझे मालूम है दिगंत
की सत्यता, कभी
नहीं मिलते
पृथ्वी
और
आकाश । उम्र के सभी पृष्ठ क्रमशः झर
जाते हैं आख़िर में रह जाता है देह
का कमज़ोर जिल्द बाकि, फिर
भी अनपढ़ा रहता है सांसों
का किताब, हज़ारों
से मुलाक़ात
हुई फिर
भी
हो न सका दिल का मिलाप, कहने को
यूँ तो न जाने कितने ही बार मुझ
से मिले हैं आप, फिर भी यूँ ही
बरक़रार रहा कुहासामय
एकांतवास, मुझे
मालूम है दिगंत
की सत्यता,
कभी
नहीं मिलते पृथ्वी और आकाश । इस
मेले की वास्तविकता अपनी जगह
है स्थिर, घूमते हुए हिंडोले से
लगता है सारा शहर यूँ
तो बहुत ही सुन्दर,
ज़मीं पर हो
बिखरा
हुआ
जैसे आकाशगंगा, रात ढलते ही क्रमशः
खुलने लगते हैं धीरे धीरे रेशमी
मोहपाश, पड़ी रहती है यूँ
ही बेतरतीब सी इत्र -
दानी, उड़ जाते
हैं सभी बूंद -
बूंद
सुवास, मुझे मालूम है दिगंत की सत्यता,
कभी नहीं मिलते पृथ्वी
और आकाश ।
* *
- - शांतनु सान्याल,  ख़ुश्बुओं का सुराग - - IN VIDEO FORM



   


 

14 अक्टूबर, 2022

आईने के उस पार - -

ज़िन्दगी क्या है ये सोचने का समय ही नहीं
मिलता, हम बिना सोचे ही गुज़र जाते
हैं बहुत दूर तक, अचानक चेहरे
की झुर्रियों को देख ठिठक
जाते हैं, बहुत देर के
बाद हम अक्स
के क़रीब
होते
हैं लेकिन उसे पहचान नहीं पाते, हम जान के
भी ख़ुद को जान नहीं पाते। आईने के उस
पार हैं सभी रिले रेस के सह खिलाड़ी,
अपनी अपनी कामयाबी का
जश्न मनाते हुए, हमारे
हिस्से की धूप से
हमें कोई भी
शिकायत
नहीं,
ज़रूरी नहीं कि दिल मिल जाए किसी से हाथ
मिलाते हुए, उजालों की चाहत किसे नहीं
होती, लेकिन ये भी सच है कि हर
एक सुबह को लोग मेहरबान
नहीं पाते, हम जान के
भी ख़ुद को जान
नहीं पाते।
* *
- - शांतनु सान्याल     

video form of आईने के उस पार - -


 

12 अक्टूबर, 2022

कारागृह - -

अक्सर नहीं मिलते दो रास्ते, एक ही उद्गम
से निकल कर, कुछ तलहटी से हो कर
पहुँच जाते हैं अपनी मंज़िल की
ओर, कुछ रास्ते उम्र भर
करते हैं आत्म खोज,
वो बनाते हैं एक
आकाशगंगा
अपने ही
अंदर,
अक्सर नहीं मिलते दो रास्ते, एक ही उद्गम
से निकल कर । कुछ रिश्ते रहते हैं पूरी
तरह से मौन, अपरिभाषित, फिर
भी निभाते हैं बख़ूबी से अपना
किरदार, कुछ लोग बहुधा
मिल कर भी, दिल
से नहीं रखते
कोई भी
सरोकार, फिर भी हम हाथ मिलाते हैं किसी
औपचारिकता के वश, गुज़रते हैं बड़ी
ही ख़ूबसूरती से ज़रा संभल कर,
अक्सर नहीं मिलते दो रास्ते,
एक ही उद्गम से निकल
कर । कुछ रूह उम्र
भर चाहती है
कारागृह,
किसी
के मोहपाश में ख़ुद को बांधे रखना, नहीं
चाहती उससे आज़ाद होना, किसी
एक बिंदु पर वो खो जाते हैं
किसी अरण्य स्रोत की
तरह उत्स विहीन,
उनकी क़िस्मत
में शायद नहीं
होता पुनः
आबाद
होना,
अंतिम पहर उन्हें मिलती है असीम शांति,
ओस की नन्ही बूंदों के साथ पृथ्वी
पर आ, जब वो जाते हैं दूर
तक बिखर, अक्सर
नहीं मिलते
दो रास्ते,
एक ही
उद्गम से निकल कर - -
* *
- - शांतनु सान्याल

11 अक्टूबर, 2022

अंतःस्थ ध्वनि - -

आधी रात, जब तेज़ बारिश रुकी, छत
से उतरती हुई बूंदों का टुप टाप और
अंतःस्थ घड़ी की टिक टिक के
मध्य, ज़िन्दगी मणियों
का गणन करती
रही, वो सभी
चेहरे जो
कल
तक थे बहुत ही चमकीले, धीरे धीरे -
दूर कोहरे में कहीं गुम से हो गए,
अपाहिज भावनाएं फिर भी
उनका अंध - अनुसरण
करती रही, अंतःस्थ
घड़ी की टिक -
टिक के
मध्य,
ज़िन्दगी मणियों का गणन करती - -
रही । काश गुज़रा वक़्त लौट आता ठीक
जैसे लौट आती है दिवाली हर
वर्ष, कभी पहले कभी कुछ
देर से, जल उठते हैं
बुझे हुए सभी
रंग मशाल,
अंतःस्थ
घड़ी
अब ज़रा सी आहट से चौंक जाती है, न
जाने किस पल रुक जाए सांसों का
सफ़र, फिर भी हम टूटते
तारों से कहीं आगे
बढ़ना चाहते
हैं, देखते
हैं एक
टक आकाश को, ठीक उसी तरह बचपन
में कभी देखा था, गुड्डे गुड्डियों का
शहर, एक पिघलता हुआ
अहसास, चीभ में
कहीं ज़रा से
चिपके
हुए,
पिपरमिंट का ठंडा सा स्वाद, ख़्वाब के - -
अबेकस में कहीं, बूंद बूंद चाँदनी
मुझ से मेरा ही हरण करती
रही, अंतःस्थ घड़ी की
टिक - टिक के
मध्य,
ज़िन्दगी मणियों का गणन करती - - - -
* *
- - शांतनु सान्याल










 

07 अक्टूबर, 2022

नव परिधान - -

वो एक दरवाज़ा है जो मुद्दतों से कभी खुला
ही नहीं, बेरंग, ज़र्द, कुहासा रंगी कोई
उतरन, अन्तःस्थल में है एक
विस्तीर्ण मरुद्यान, न
कोई चाबी न ही
कोई कुलूप
से बंधा
हुआ है अंतरतम का द्वार, सिर्फ आगंतुक
का है इंतज़ार, ये वो पांथशाला है जहाँ
हर किसी को मिलता है शरण,
क्या हुआ जो बाहर से
लगता है, बेरंग,
ज़र्द, कुहासा
रंगी कोई
उतरन ।
वो
सभी सीढ़ियां जो ले जाती हैं गहन से - -
गहनतम की ओर, काञ्चन काया
पड़ी रहती है दर्शक विहीन मंच
के उपर एकाकी, निःशब्द
रूह बढ़ जाती है किसी
अज्ञात भोर की
ओर, पड़े
रहते
हैं
कुछ पुष्प गुच्छ दहलीज़ के उपर, थम से
जाते हैं एक ही पल में सभी चिराग़ों
के उष्ण सिहरन, उड़ जाती हैं
तितलियाँ सुदूर कहीं,
छोड़ कर रेशमी
कोष का
उतरन ।
* *
- - शांतनु सान्याल  



06 अक्टूबर, 2022

असमाप्त अंतर्यात्रा - -

 एक सुनसान द्वीप में ज़िन्दगी देखती
है दूर तक एक निःशब्द, ख़ामोशी
का शहर, किनारे की ज़मीं
हज़ार बार टूट कर
भी, विक्षिप्त
लहरों से
नहीं
करती कोई समझौता, चट्टान कभी नहीं
सरकते हैं अपनी जगह से तिल भर,
ज़िन्दगी देखती है दूर तक एक
निःशब्द, ख़ामोशी का
शहर। वक़्त के
थपेड़े सिर्फ़
कुछ
रेत बना सकते हैं लेकिन वजूद को मिटा
सकते नहीं, तुम्हारे निगाह में है अगर
अंतहीन गहराई, कोई भी तिलस्मी
ख़्वाब बरगला सकते नहीं,
चट्टान को दर्द नहीं
होता, वो सब
कुछ
महसूस करता है चिर मौन रह कर,
वो स्थिर हो कर भी अपने अंदर
चलता रहता है उम्र भर,
ज़िन्दगी देखती है
दूर तक एक
निःशब्द,
ख़ामोशी का शहर - -
* *
- - शांतनु सान्याल

28 सितंबर, 2022

अज्ञात स्वर्ग - -

उस एक बिंदु तक पहुँचने के लिए हर शख़्स
रहता है बेक़रार, कभी चाहता है ओढ़ना
इंद्रधनुषी पोशाक, सजल बूंदों के
चन्द्रहार, कभी गहन चुप्पी
और कभी उन्मुक्त
जल प्रपात, हर
एक चेहरे
के नेपथ्य में छुपे होते हैं अदृश्य प्रतिबिंब कई
हज़ार, उस एक बिंदु तक पहुँचने के लिए
हर शख़्स रहता है बेक़रार। उस क्षण
भंगुर ख़्वाब में है अज्ञात स्वर्ग
का कोई नाज़ुक अहसास,
या प्रणय सुधा की
प्यास, हर
एक सोच में रहती है किसी न किसी मंज़िल
की आस, अंदर का रहस्य होता है बहुत
गहरा, आंखें देखती हैं केवल फूलों
से सजा मुख्य द्वार, उस एक
बिंदु तक पहुँचने के लिए
हर शख़्स रहता है
बेक़रार। हम
बहुधा उसे
पा कर भी खो देते हैं, बहुत कठिन है अग्नि
वलय से हो कर गुज़रना, हर हाल में तै
है मुट्ठियों में बंद, मोह माया का
एक दिन बिखरना, अनंत
कालीन प्रयास से
कहीं जा कर
मिलता
है विश्वसनीयता का पुरस्कार, उस एक - -
बिंदु तक पहुँचने के लिए हर शख़्स
रहता है बेक़रार।
* *
- - शांतनु सान्याल




15 सितंबर, 2022

त्रिकोण के मध्य - -

 

कुछ नदियां अपने गर्भ में रखती

हैं अंतहीन गहराइयां, देह की

असंख्य शिराओं से हो 

कर बहते हैं अणु

जल स्रोत, वो

बहा ले जाते

हैं अपने

संग

सड़े गले फूल, शव वस्त्र, भीगे

हुए मोह डोर, स्वप्निल नेहों

की जालीदार  छाइयाँ ।

कई रातों की कोई

सुबह नहीं 

होतीं

फिर भी उन्हें चलना होता है

दिगंत पार तक, जीवन के

वक्ष स्थल में जलता

रहता है एक 

अमरदीप,

बस हम

देख

नहीं पाते इस पार से उस पार

तक, सुबह घास के ऊपर

बूंद बूंद बिखरी होती

हैं अनगिनत 

कहानियां ।

हर एक

प्रातः

मैं चाहता हूं एक नई शुरुआत,

कुछ वृक्ष आकाश कभी

नहीं छूते लेकिन

उनके अदृश्य

मूल वसुधा

के सीने

में 

आंक जाते हैं नए पौधों के देश

विराट, कभी नहीं मरती

 नारी, नदी और वृक्ष 

की परछाइयां,

इन्हीं तीनों

के मध्य

मैं

खोजता हूँ अपने अस्तित्व की

अशेष गहराइयां ।

**

- - शांतनु सान्याल 



26 अगस्त, 2022

नियति के हवाले - -

एक अजीब से ऊहापोह में जी रहे हैं सभी,
राग दरबारी के सुर में सुर मिलाते
हुए, रंगीन प्यालों में भर कर
असत्य का विष पी रहे
हैं सभी । किसी
एक बिंदु
पर
आ रुक सी गई है उत्क्रांति, मुखौटे पर है
दर्ज, पुरसुकून अमन की कशीदाकारी,
दरअसल सीने के अंदर है मौजूद
अशांति ही अशांति । चौखट
पर आ कर न आवाज़
दो यूँ सूदखोर
महाजन
की
तरह, कुछ वक़्त चाहिए वजूद को फिर
से टटोलने के लिए, मृत नदी की
तरह बेसुध पड़ा है चिराग़ों
का जुलूस, बहुत कुछ
खोना होता है,
खुलेआम
सच
बोलने के लिए । तथाकथित मसीहा ने
ही कल रात जलाई है बस्तियां,
आज सुबह वही शख़्स
दे रहा है दोस्ती
पर तक़रीर,
लोग
भी
हैं वही लकीर के फ़क़ीर, कर रहे हैं सिर
झुकाए तस्लीम अपनी बिखरी
हुई तक़दीर।
* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 


25 अगस्त, 2022

पांथ पखेरू - -

उस पथ का हूँ पांथस्थ मैं जहाँ मिलते
हैं सागर और आकाश, कुछ पल
का ठहराव, कुछ पल ख़ुद
से संवाद, यूँ ही चलता
रहता है जीवन
प्रवास,
समय का हिंडोला नहीं थमता, कभी
तुम हो शून्य पर, और मैं पृथ्वी
पर एकाकी, कभी खिलते
हैं नागफणी के फूल,
 और कभी
असमय
मुरझाए मधुमास, दिवा - निशि अंतहीन
है अंतरतम की यात्रा, उतार चढ़ाव,
शहर जंगल, सरल वक्राकार,
शब्दों का उत्थान पतन,
पीछे मुड़ कर देखने
का नहीं मिलता
अवकाश,
यूँ तो हर शख़्स है यहाँ अपने आप में
गुम, फिर भी पहचानते हैं मुझे
चाँदनी रात, जुगनुओं के
नील प्रकाश, भोर
के बटुए में
बंद सुबह
की
नाज़ुक धूप, गुलाब खिलने की एक
छोटी सी आस, मरुद्यान में
कहीं है एक कुहासामय
पांथ शाला, कुछ
पल का विश्राम,
कुछ क्षण
पुनर्जीवन का एहसास, अश्रु बूंद के - -
अतिरिक्त भी बहुत कुछ है
मेरे पास, उस पथ का
हूँ पांथस्थ मैं जहाँ
मिलते हैं सागर
और आकाश,
आहत
पांथ पखेरू को है पुनः उड़ने का विश्वास !
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

13 अगस्त, 2022

माया मृदंग - -

न तुम कुछ कह सके, न ओंठ मेरे ही हिले,
सब कुछ अनसुना ही रहा, सिहरन के
मध्य, सिर्फ़ बजता रहा समय
का मायामृदंग, सुबह की
बारिश में फिर खिले
हैं नाज़ुक गुलाब,
शायद दिन
गुज़रे
अपने आप में लाजवाब, कुछ दूर ही सही
चले तो हम एक संग, सिहरन के
मध्य, सिर्फ़ बजता रहा
समय का माया -
मृदंग । एक
बिंदु
रौशनी जो उभरती है दिगंत रेखा के उस
पार, बौछार से फूल तो झरेंगे ही
फिर उन का शोक कैसा,
बादलों के नेपथ्य
में है कहीं
उजालों
का
शहर, ये अँधेरा है कुछ ही पलों का इनका
भला अफ़सोस कैसा, किनारे पर आ
कर कहाँ रुकते हैं महा सागर के
विक्षिप्त तरंग, सिहरन के
मध्य, सिर्फ़ बजता
रहा समय का
माया मृदंग ।
* *
- - शांतनु सान्याल
   

11 अगस्त, 2022

रूपांतरण - -

एक पगडंडी झाड़ियों से ढकी हुई, जाती है
बहुत दूर, छुपते छुपाते, उस जगह
जहाँ पर उतरती है सुरमयी
शाम, ऊँचे ऊँचे पेड़
की परछाइयां,
सहसा
जी
उठते हैं एक दूसरे को छूने के लिए, उन - -
निस्तब्ध पलों में हमारे दरमियां,
दस्तक देते हैं जल प्रपात
की रहस्यमयी कुछ
सरगोशियां,
धूसर
पर्वतों में दिन का सफ़र होता है तमाम,
उस जगह पर हमारे सिवा कोई
नहीं होता, जहाँ पर उतरती
है सुरमयी शाम। उन
निझुम पलों में
ज़िन्दगी
छूना
चाहती है प्रणयी अन्तःस्थल, ईशान - -
कोण में उभरते हैं धीरे धीरे कुछ
मेघ दल, हवाओं के साथ
उड़ आते हैं हज़ार
ख़्वाहिशों के
चिरहरित
जंगल,
कुछ ख़्वाबों के कोष खुलने को होते हैं
तब बेक़रार, रेशमी गुच्छों से
उभर कर रात करती है
तब ज़िन्दगी का
स्वागत, जिस्म
को मिलता
उन पलों
में इक
पुरसुकूं आराम, तितलियों के नाज़ुक
परों पर लिखा होता है कहीं
तुम्हारा मधुर नाम !
* *
- - शांतनु सान्याल
















09 अगस्त, 2022

अस्वीकृत चिट्ठी - -

उस अथाह गहराई तक उतरना चाहूंगा, जहां
लफ़्ज़ों का तिलिस्म थक जाए, एक
एहसास जो ख़ामोश रह कर
भी दिल की परतों को
खोल दे, जो आज
तक कोई न
कह सका
वो बात
सरे आम बेझिझक सभी से बोल दे, मैं न - -
चाह कर भी आज, इस पल, तुम से
क्षमा चाहता हूँ ताकि तुम्हारे
दिल में नफ़रतों का
उठता हुआ
बवंडर
रुक
जाए, उस अथाह गहराई तक उतरना चाहूंगा,
जहां लफ़्ज़ों का तिलिस्म थक जाए।
तुकबंदियों से कहीं मीलों दूर हैं,
संवेदनाओं की दुनिया,
कुछ जुगनुओं की
टिमटिमाहट
में खेलते
हैं अर्द्ध
नग्न बच्चे, मासूम सीने के पृष्ठों में, कहीं - -
आबाद हैं मानव बस्तियां, टूटते ख़्वाबों
से कोई कह दे कि बिखरने से पहले,
नम पलकों पर इक शबनमी
फ़ाया रख जाए, उस
अथाह गहराई
तक उतरना
चाहूंगा,
जहां
लफ़्ज़ों का तिलिस्म थक जाए। चाँद के अक्स
से पेट की भूख नहीं थमती, ख़ुदा के लिए
झुलसा हुआ ख़्वाब न दिखाए कोई,
ख़ाली मर्तबानों में हैं बंद,
छतों की नरम धूप,
अर्थहीन है इस
पल चाहतों
को पुनः
सेंकना,
शब्दों के खेल से यूँ बारहा दिल को न बहलाए
कोई, मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा राहतों
का झूठा ख़त, नामावर से जा कहे
कोई, दहलीज़ पे ही वो रुक जाए,
उस अथाह गहराई तक
उतरना चाहूंगा,
जहां लफ़्ज़ों
का
तिलिस्म थक जाए - -
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

 
















07 अगस्त, 2022

जी उठेंगे इक दिन - -

हम लापता ज़रूर हैं लेकिन विलुप्त नहीं,
प्रवासी पक्षियों के साथ एक दिन
लौट आएंगे, हमारा इंतज़ार
करना, हम अदृश्य हैं
लेकिन गुप्त
नहीं, हम
लापता
ज़रूर हैं लेकिन विलुप्त नहीं । परछाइयों
के शहर में झांकती हैं कुछ रौशन -
दान की रौशनी, अंधेरों का
गणित अपनी जगह
है यथावत, दो
दिन की
होती
है
सिर्फ़ रुपहली चाँदनी, पल भर के लिए
हम ने मूंदी है पलकें, सीने का
आग्नेय गिरि लेकिन
विसुप्त नहीं,
हम लापता
ज़रूर
हैं
लेकिन विलुप्त नहीं । मुकुट विहीन है
ज़िन्दगी तो क्या हुआ, पतझर
केवल किसी एक के लिए
आख़री वसीयत
तो नहीं, वो
सभी
सूखी टहनियों में कुछ ख़्वाब अभी तक
हैं ज़िंदा, ये ज़मीं और खुला खुला
सा आसमां किसी एक शख़्स
की मिल्कियत तो नहीं,
ओझल हैं बहरहाल
ज़माने की
नज़र
से,
जी उठेंगे ज़रूर इक दिन, हम कोई - -
पत्थर अभिशप्त नहीं, हम
लापता ज़रूर हैं लेकिन
विलुप्त
नहीं ।
**
- - शांतनु सान्याल  

   
 




04 अगस्त, 2022

उजान देश की ओर - -

हो चाहे सघन बरसात की रात, या धूसर
ग्रीष्म आकाश, सतत प्रवाहित हो
तुम, कभी पारापार अंतहीन,
और कभी संकुचित
जलधार, तुम्हें
नहीं ज़रा
भी
कोई अवकाश, हो चाहे सघन बरसात की
रात, या धूसर ग्रीष्म आकाश। तुम्हें
बांधने की तमाम कोशिशें होती
हैं विफल, फिर भी स्पृहा
तंतुओं से हो कर तुम
सतत अदृश्य
बहते हो,
कभी इस मोड़ से मुड़ कर कभी भंवर पथ
से हो कर अनजान किनारों से गुज़रते
हो, स्पृहा तंतुओं से हो कर तुम
सतत अदृश्य बहते हो। इस
बहाव यात्रा की मंज़िल
का पता कोई भी
नहीं जानता,
मौन सभी
अपनी
जगह पड़े रहते हैं, अर्द्ध डूबे हुए जर्जर घाट,  
उदासीन संध्या की नीरवता, दूर तक
उठता हुआ धुआं, अवहेलित
टूटी हुई नाव, स्मृतियों
की उम्र होती है
बहुत छोटी,
सभी
उभरे हुए द्वीप एक दिन क्रमशः हो जाते
हैं शून्य सपाट, मौन सभी अपनी
जगह पड़े रहते हैं, अर्द्ध डूबे
हुए जर्जर घाट।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 



02 अगस्त, 2022

अपरिभाषित पल - -

 

मायामृग की तरह भटका हूँ मैं सघन अरण्य
से ले कर विस्तृत आकाश गंगा के रास्ते,
फिर भी अशेष ही रही नील मायावी
रात्रि, झरते हुए निशिगंधा के
फूल, अंतहीन सुरभित
अभिलाष, चक्रमध्य
से ले कर अनहद
तक किया,
उन्हें
तलाश, अनबुझ ही रही फिर भी जीवन की
प्यास, तट बदलती नदी हो या अपलक
निहारती यामिनी, दूर तक थी
असीम शून्यता, जा चुके
थे सभी दिगंत पार,
जीवन के सह -
यात्री, फिर
भी
अशेष ही रही नील मायावी रात्रि । कस्तूरी
गंध की तरह हैं उन्मत्त सभी जीवन की
चाहतें, टीस की अंध गहराइयों में
खोजता हूँ, बेवजह ही मैं पल
भर की राहतें, किसे क्या
मिला या न मिला  
सब कुछ है
लिखा
हुआ,
नियति की है अपनी ही मजबूरी, कभी मिले
ऐसे के बिछड़े ही न थे, कभी लोगों ने
ख़ुद ही बनायीं सहस्त्र कोस की
दूरी, कभी हुई सघन वृष्टि
जिसकी कोई उम्मीद
न थी, और कभी
लौट आई
सारा
शहर घूम के, फिर भी सूखी की सूखी ही रही
मेरे मन की रंगीन छतरी, फिर भी अशेष
ही रही नील मायावी
रात्रि।
* *
- - शांतनु सान्याल

29 जुलाई, 2022

सभी थे ख़ामोश - -

हज़ार तिर्यक रेखाओं के मध्य बनता है
एक घोंसला, अथक उड़ानों के बाद
कहीं जा कर कुछ श्वेत वृत्तों
में छुपे रहते हैं पीत -
वर्णी सपनों के
कण,
बारम्बार बिखरने के बाद भी जीवन नहीं
खोता है अपना हौसला, हज़ार तिर्यक
रेखाओं के मध्य बनता है एक
घोंसला । न जाने कितने
सांप सीढ़ियों से
उतर कर भी
हम नहीं
भूलते
आरोहण, ज़रूरी नहीं हासिल हों जीवन
में मनचाही वस्तु, अंतरतम का
संतोष ही होता है सच्चा
आभूषण, न जाने
किसे करना
चाहता है
परास्त,
झूल
रहा है तू अपने ही अंदर, अट्टहास कर - -
रहा है समय का झूला, अंतिम
प्रहर में थे सब चुप, क्या
मेरा ईश और क्या
तेरा मौला,
हज़ार
तिर्यक
रेखाओं के मध्य बनता है एक घोंसला ।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

25 जुलाई, 2022

ख़्वाब बिल्लौरी - -

पिघलती हुई हिमनद के अंतिम नोक पर
कहीं, इक ठहरा हुआ सा बिल्लौरी
ख़्वाब हो तुम, छू लूँ तुम्हें
बेख़ुदी में सुबह से
पहले, कोई
पहेली !
रेशमी धागों में गुथी, वो अक्स लाजवाब
हो तुम, इक ठहरा हुआ सा बिल्लौरी
ख़्वाब हो तुम। अनगिनत हैं
तुम्हारी बज़्म में सितारों
की चहल क़दमी,
कुछ बुझते
चिराग़
के
लौ भी चाहते हैं पुनर ज़िन्दगी, न जाने
कितने जन्मों के बाद  भटकती
रूहों का, पुरसुकूं इन्तख़ाब
हो तुम, इक ठहरा
हुआ सा बिल्लौरी
ख़्वाब हो
तुम।
* *
- - शांतनु सान्याल


 

 

22 जुलाई, 2022

उजाले का क़तरा - -

 

विस्तृत ख़ामोशी में एक अनंत

अंधकार गुफा तलाशती है

एक उजाले का क़तरा,

सभी गुज़र जाते हैं

अपनी अपनी

राह, कहना

बड़ा ही

सहज

है

कि तुम्हें मुझ से है मुहोब्बत बेपनाह, लेकिन ये भी

सच है कि कौन

किस के लिए 

देर तक है

ठहरा, 

अंधकार गुफा तलाशती है एक

 उजाले का क़तरा ।

अक्सर देखता हूँ

मैं एक ग्राफ़,

सूखी और

भरी नदी

के मध्य,

कुछ

सरकते हुए नम बादल खोजते

हैं वीरान पृष्ठों में अतीत के

पद्य, जीवन का रहस्य 

तब लगता है बहुत 

ही गहरा, अंधकार

गुफा तलाशती

है एक उजाले

का

क़तरा ।

**

- - शांतनु सान्याल 




19 जुलाई, 2022

अमिट सत्य - -

मृत्यु अमिट सत्य है अपनी जगह,

और सत्य की मृत्यु

कभी होती नही, वो 

निर्वस्त्र हो कर 

अंतरतम के

सौंदर्य

को

उजागर करता है, सत्य को

कहने और सुनने का 

साहस ही जीवंत

रखता है मानव

को, वो सभी

धर्म एक

दिन

हो जाएंगे विलीन जो रखते

हैं धर्म को मानवता के

शीर्ष पर, समय हर

एक दंभ का मौन

संहार करता

है, सत्य

की

मृत्यु कभी होती नहीं, वो निर्वस्त्र 

हो कर अंतरतम

के सौंदर्य को उजागर

करता है ।

**

- - शांतनु सान्याल

15 जुलाई, 2022

पुनरागमन - -

हर शख़्स की है अपनी कल्पना, अपनी ही
भविष्यवाणी, जल प्रलय हो या हिम -
युग की वापसी, या भस्मीभूत
होती हुई ये ख़ूबसूरत
पृथ्वी, शून्य से
शून्य तक
फिर भी
रहती है कहीं न कहीं, आबाद ये यायावर
ज़िन्दगी ! सभी कुछ बिखर जाएंगे
एक दिन, सरल कहाँ, रेत के
घरौंदों को पागल लहरों
से बचाना, बिखरे
पड़े रहेंगे बस
कुछ सीप
शंख
के खोल, कदाचित मिल जाए तुम्हें कोई
दिव्य मोती, न भूलना, इस किनारे
पर पुनः आना, पाओगे हर
हाल में कहीं न कहीं,
अदृश्य प्रणय की
मौजूदगी,     
शून्य
से शून्य तक फिर भी रहती है कहीं न -
कहीं, आबाद ये यायावर ज़िन्दगी !
* *
- - शांतनु सान्याल   

14 जुलाई, 2022

प्रभात पूर्व जागरण - -

मैंने देखा है दूर तक एक जुलूस, हाथों में लिए
हुए पत्थर, और ओंठों पर मानवता का
सिंहनाद, एक विषाक्त प्रवाह में
बहते हुए लोग, बच्चे, बूढ़े,
जवान, स्त्री, पुरुष, न
जाने किस ग्रह को
करना चाहते हैं
आज़ाद,  
हाथों
में लिए हुए पत्थर, और ओंठों पर मानवता -
का सिंहनाद ! रात के अंतिम प्रहर का
कोई दुःस्वप्न, अदृश्य नशे में
धुत लोग, हाथों में लिए
हुए खड्ग - खंजर
बढ़ चले हों जैसे
वध स्थल
की ओर,
न जाने किस मिथ्या प्रतिश्रुति के वशीभूत,
जी रहे हैं लोग विरोधाभास का जीवन,
वसुधैव कुटुम्बकम् के लोग अभी
तक सो रहे हैं बेख़बर, जबकि
हर तरफ है सुलगता
हुआ धर्म -
उन्माद,
हाथों में लिए हुए पत्थर, और ओंठों पर - -
मानवता का सिंहनाद !
* *
- - शांतनु सान्याल












 

10 जुलाई, 2022

असमाप्त दहन - -

अंतहीन होते हैं अभिलाषित वर्षा वन,
ज्वलंत मरुभूमि की तरह वक्ष -
स्थल में रहते हैं अदृश्य
भावनाएं, इस पार से
उस पार तक
विद्यमान,
फिर भी
रहती
है
सदा, मौन ओंठों पर एक हलकी सी -
मुस्कान, ठूंठ भी तलाशते हैं
अपना प्रतिबिम्ब, मौन
होता है लेकिन जल
दर्पण, अंतहीन
होते हैं
अभिलाषित वर्षा वन । नील पर्वतों से
अब भी उठ रहा है धुआं अनवरत,
कहने को तमाम रात बरसे
हैं बादल, कदाचित
अरण्य गर्भ में
बिखरे पड़े
हैं कुछ
स्वप्न क्षत - विक्षत, फिर भी हर हाल
में, नदी के संग उतरता है तलहटी
की ओर, संघर्षरत ये जीवन,
अंतहीन होते हैं
अभिलाषित
वर्षा वन।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

08 जुलाई, 2022

आज़ादी ए फ़रेब - -

न कहना किसी से किस्सा ए दग़ाबाज़ी,
कहीं लोग दोस्ती करना न छोड़ दें,
वो महज तस्सवुर है या हक़ीक़ी,
मेरा ख़ुदा या तेरा ईश्वर, न
खोल राज़ ए अक़ीदत,
कि राहे यक़ीं पे
लोग चलना
न छोड़
दें,
कहीं लोग दोस्ती करना न छोड़ दें । वो
सभी क़ाबिल ए फ़ख़्र, महल ओ
क़िले ढह गए, ख़ामोश आह
के आगे, कोई दिव्य
किताब की मर्ज़ी
नहीं चलती,
सैलाब

वक़्त के साथ न जाने कितने शहंशाह
बह गए, न बना कांच के सराय
धुंध भरी वादियों में, कि
तेरे अपने भी तेरे
साथ ठहरना
न छोड़
दें,
कहीं लोग दोस्ती करना न छोड़ दें - -
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

03 जुलाई, 2022

हासिल कुछ भी नहीं - -

न जाने कहाँ गुम हैं सभी वो इंसानी क़ैफ़ियत,
हर एक चेहरे के पीछे छुपा सा है कोई न
कोई वहशी सूरत, किस पर करे
यक़ीं, किस से गले मिलें,
न जाने कैसी आग
सीने में लिए
फिरते
हैं
लोग, ख़ून के रंग में कोई फ़र्क़ नहीं फिर भी
न जाने क्यूँ भूल जाते हैं, बार - बार
उसकी असलियत, न जाने
कहाँ गुम हैं सभी वो
इंसानी क़ैफ़ियत ।
सभी पोथी -
पुराण
के
पृष्ठों पर हैं, बिखरे हुए लहू के दाग़, कौन
रोप गया, उर्वर भूमि के नीचे ज़हर के
बीज, धुआं धुआं  सा उठ रहा है हर
तरफ, कुम्हलाए दरख्तों में
झूलते से हैं नफ़रत के
झाग, ये कैसा
जूनून सा
छाया
है
हर सिम्त, जिधर देखो सिर्फ़ है बर्बरियत
और बर्बरियत, सर झुकाए रो रही है
इंसानियत - -
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

14 मई, 2022

निःशर्त हो सब कुछ - -

आंचल की अपनी अलग है मजबूरी
ज़रूरत से ज़ियादा समेटा न
कीजिए, बिखरने दें ख़ुश्बू
की मुग्धता अपनी
ही शर्तों पर,
ब'ज़ोर
हवाओं का रूख़ अपनी तरफ मोड़ा न
कीजिए, दिल की गहराइयों से जो
उठती हैं मौज ए इबादत, वो
आसमां को झुका जाए,
हर एक मोड़ पर
मसीहा नहीं
मिलते,
हर एक शख़्स के सामने अपने हाथ
यूँ ही जोड़ा न कीजिए, न कोई
सरसराहट, न कोई आहट,
मुद्दत हुए गुलशन से
बहारों का कूच
होना, यूँ ही
अचानक
से मेरी
ज़िन्दगी में आप आया न कीजिए, न
जाने क्यूँ वो फेंकते हैं रह रह कर 
इक तिलस्मी छल्ला, अब कोई
ख़्वाब नहीं उभरते मेरी
आँखों में, बेवजह
यूँ ही आधी
रात,गहरी
नींद
को भरमाया न कीजिए, आंचल की
अपनी अलग है मजबूरी
ज़रूरत से ज़ियादा
समेटा न
कीजिए।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
    
 

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