गुरुवार, 15 सितंबर 2022

त्रिकोण के मध्य - -

 

कुछ नदियां अपने गर्भ में रखती

हैं अंतहीन गहराइयां, देह की

असंख्य शिराओं से हो 

कर बहते हैं अणु

जल स्रोत, वो

बहा ले जाते

हैं अपने

संग

सड़े गले फूल, शव वस्त्र, भीगे

हुए मोह डोर, स्वप्निल नेहों

की जालीदार  छाइयाँ ।

कई रातों की कोई

सुबह नहीं 

होतीं

फिर भी उन्हें चलना होता है

दिगंत पार तक, जीवन के

वक्ष स्थल में जलता

रहता है एक 

अमरदीप,

बस हम

देख

नहीं पाते इस पार से उस पार

तक, सुबह घास के ऊपर

बूंद बूंद बिखरी होती

हैं अनगिनत 

कहानियां ।

हर एक

प्रातः

मैं चाहता हूं एक नई शुरुआत,

कुछ वृक्ष आकाश कभी

नहीं छूते लेकिन

उनके अदृश्य

मूल वसुधा

के सीने

में 

आंक जाते हैं नए पौधों के देश

विराट, कभी नहीं मरती

 नारी, नदी और वृक्ष 

की परछाइयां,

इन्हीं तीनों

के मध्य

मैं

खोजता हूँ अपने अस्तित्व की

अशेष गहराइयां ।

**

- - शांतनु सान्याल 



4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-09-2022) को  "भंग हो गये सारे मानक"   (चर्चा अंक 4554)  पर भी होगी।
    --
    कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-09-2022) को  "भंग हो गये सारे मानक"   (चर्चा अंक 4554)  पर भी होगी।
    --
    कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  3. वाह! सराहनीय सृजन हमेशा की तरह।

    कुछ नदियां अपने गर्भ में रखती
    हैं अंतहीन गहराइयां... गज़ब 👌

    जवाब देंहटाएं
  4. भाई शान्तनु जीकवित्व से परिपूर्ण आपकी कविताएँ सदैव ही एक अद्भुत अहसास छोड़ जाती हैं।

    कई रातों की कोई

    सुबह नहीं

    होतीं

    फिर भी उन्हें चलना होता है

    दिगंत पार तक' - बहुत ही सुन्दर कह गए हैं आप!

    जवाब देंहटाएं

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