दैहिक लावण्य कुछ भी नहीं किसी
अंध कूप में उभरता हुआ पल
भर का आकाश अनाविल,
रूह की गहराइयों में
कहीं बसता है
जुगनुओं
का
शहर,नीलाभ रौशनी में नहाया हुआ
चाँदनी का समन्दर, कदाचित
सुदूर दिगंत रेखा में कहीं
है मेरी मंज़िल, दैहिक
लावण्य कुछ भी
नहीं किसी
अंध
कूप में उभरता हुआ पल भर का आकाश अनाविल । उस अनंत
पथ का यात्री नहीं रुकता
मोह के अनुबंधों से,
वो महत विरागी
मुक्त होता है
दुःख -
सुख के सभी अंतरद्वंद्वों से, रहता
है सदा मृत्युंजयी असत्य के
मुक़ाबिल, दैहिक लावण्य
कुछ भी नहीं किसी
अंध कूप में
उभरता
हुआ
पल भर का आकाश अनाविल ।
- - शांतनु सान्याल

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