15 नवंबर, 2020

उन्वान से ऊपर - -

गुमसुम सा है दीपक स्तम्भ, न जाने
कितने क़ुर्बान हुए, कल रात, इक
बूंद उजाले के लिए, यूँ तो
हर दर था चिराग़ों से
रौशन, फिर भी
वो मिलना
चाहता
था
सिर्फ़ मुझ से, दाग़े दिल दिखाने के  
लिए, वो सारी रात सुनसान
राहों में भटकता रहा
तनहा, मिट्टी
के  दीयों
की,
उम्र थी मुख़्तसर, वो ज़िंदा थे सिर्फ़
रौशनी लुटाने के लिए, बिखरे
पड़े हैं, राज पथ के दोनों
किनारे अनगिनत
ख़्वाबों के
पंख,
कोई नहीं मौजूद दूर तक उनकी - -
अंतिम इच्छा बताने के लिए,
आतिशबाजी की शोर में
कहीं गुम हो गए वो
सभी हासिए
के लोग,
तुम
हमेशा की तरह रहे विशाल शीर्षक
में काबिज़, कोई तो हो तुम्हें  
असलियत दिखाने के
लिए - -

* *
- - शांतनु सान्याल

14 नवंबर, 2020

अंतिम पहर के चिराग़ - -

मीन, शंख, सीप, बहते हुए प्रदीप, सभी
लौट गए अपनों के समीप, किनारा
अकेला ही रहा अंतिम पहर में,
तुम थे तो सब कुछ था
नाम, फलक, पता -
ठिकाना, लोगों
का आना -
जाना,
तुम जब नहीं तो कुछ भी नहीं ज़िन्दगी
के लहर में, रौशनी की दुनिया है
आबाद, हमेशा की तरह,
उसी साहिल के
आँचल में,
फिर भी
न
जाने क्यों, अक्स नहीं उभरे समंदर में,
शायद तुम्हारे वजूद से था, रूह का
संयोजन, जन्म जन्मांतर का
मेल बंधन, वरना शून्य
के सिवा, कुछ भी
न था काग़ज़
के घर में,
इस
रात के सीने में हैं लापता, कितने ही -
साँझ बाती, मैं लौट तो जाऊं, बस
शर्त है इतना, तुम दिल का
चिराग़ जलाए रखना,
उसी उजड़े हुए
रहगुज़र -
में,
किनारा अकेला ही रहा अंतिम पहर -
में।

* *
- - शांतनु सान्याल
 



दुआओं वाली रात - -

उसूलों की दुहाई में, न जाने कितने
फ़रेब देखे, बदलती रही क़दमों
की थिरकन, समझौते
इतने कि उम्र भी
अपनी याद
नहीं,
हमने ज़ंजीरों में छुपे कितने ही - -
पाज़ेब देखे। है दुआओं वाली
रात, उतरे हैं आसमां
से अनगिनत
चिराग़,
कुछ
धुंधलाए चेहरों में ज़िन्दगी की लौ
बेहिसाब देखे, जब बुझ गए
सारे दीये, सुनसान राहों
में, न जाने कितने
ही अपाहिज
ख़्वाब
देखे।
तुम्हारे आँगन में शायद उतरे हों - -
उपहार वाले फ़रिश्ते, सुबह
दहलीज़ पे हमने, दग्ध
पांवों के निशान
देखे, कौन
आया
था
कल रात कहना है बहोत मुश्किल, -
ज़मीं थी रौशन सहस्त्र दीयों
के लौ से, लेकिन न जाने
क्यों रात को बहोत
परेशान देखे।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

13 नवंबर, 2020

अतीत के पृष्ठ - -

जब आईना देखने की उम्र थी, तब  
हम ख़ुद को सजा ही न सके,
वही मध्यमवर्गीय दृष्टि -
कोण, लोग क्या कहेंगे,
छुप के यूँ ही देखते
रहे वसंत को
पतझर में
ढल
जाते हुए, बहुत कुछ था हमारे दिल
में, खुल के तुम्हें कभी बता ही
न सके, ख़ुद को जी भर के
सजा ही न सके, वो
ख़ामोशी, जो
लिखता
रहा
अंतर्मन की पृष्ठों में, अप्रकाशित -
अनुभूति, सीने में कहीं जमती
रहीं बूंद बूंद किसी अदृश्य
दिव्यता की स्तुति,
उस अलौकिक
रोमांच की
छवि
हम चाह कर भी तुम्हें दिखा न सके,
बहुत कुछ था हमारे दिल में,
खुल के तुम्हें कभी बता
ही न सके, मुड़ के
देखा है, तुम्हें
कई बार
दूर
तक, बहते हुए से लगे सभी शब्दों -
के भीड़, भीगते रहे सभी अप्रेषित
पत्र, अतीत के सीढ़ियों में,
भीगता रहा पलकों
का गाँव, फिर
भी देह और
प्राण सूखे
रहे,
हमने चाहा कि मुस्कुराएं दिल की -
गहराइयों से, लेकिन चाह कर
भी हम उन्मुक्त मुस्कुरा
न सके, सब कुछ
भुला कर
बहुत
कुछ भुला ही न सके, हम ख़ुद को
जी भर के कभी सजा -
ही न सके  - -

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

12 नवंबर, 2020

उम्मीद के पंख - -

बिखरे हुए हैं, कुछ नीलकंठ के पंख,
शुष्क नदी के किनारे, खोजती
है ज़िन्दगी, पदचिन्हों के
नीचे, जल स्रोत के
लुप्त ठिकाने,
समय भर
न सका,
सीने
के सभी कोटर हमारे, फिर भी चल -
रहे हैं, हम न जाने किस उम्मीद
के सहारे। सुदूर कहीं से आ
रही है भीगी हवा, माटी
का गंध समेटे, मैं
फिर लौट के
आऊंगा
इसी
नदी तट पर, पुनर्जन्म से लड़ कर, -
सारे जिस्म में जल प्रपात को
लपेटे। तुम मेरा इंतज़ार
करना, इन्हीं शैल -
चित्रों के नीचे,
मैं तुम्हें
मुक्त
करूँगा एक दिन इस मरू धरातल
से, मुझे मालूम है, दुनिया के - -
आबोहवा का विज्ञान,
लेकिन तुम न
करना यक़ीं
इन
नक़ली भविष्यवाणियों पर, एक -
दिन शदीद बारिश, ज़रूर
निजात देगी, सभी
दुःख - दर्द के
हलाहल
से।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 

 

प्रतिदान - -

श्रृंखल विहीन पलों में, उत्ताल नदी
ग्रास कर जाती है सब कुछ, घर -
द्वार, बरामदा से ठाकुर -
दालान, आँगन का
बागान, नदी,
सह -
अस्तित्व में रह कर भी बहुत कुछ  
चाहती है ख़ुद के लिए एक
स्वाधीन आसमान।
नदी अपने गर्भ
में रखना भी
जानती
है
बहुत कुछ और अगर कोई उसे करे
अपमानित, तो उगल जाती है
तलछट की तमाम काई -
भरी रेत, विनिमय
से बंधी है ये
सृष्टि,
नदी हो या स्त्री, हर एक को चाहिए -
प्रतिदान, अगर वो देना जानती
है तो उसे छीन लेना भी
आता है, चाहे हो
अन्तस्थ की
निर्मलता
या
खोया हुआ आत्म सम्मान, नदी युगों
से रखती है अपने सीने में नव -
युग का आह्वान, हर एक
को चाहिए, कुछ न
कुछ प्रतिदान।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

11 नवंबर, 2020

जल समाधि - -

ज़र्द पत्तों की तरह एक दिन टूट
जाएंगे सभी ख़्वाब, टहनियों
के सिवा कुछ न होगा
ज़िन्दगी के पास,
कुछ ज़ख्म
के निशां,
कुछ
पुराने चादर के देह गंध, दुआओं
के कुछ पैबंद, दहलीज़ में
खड़ी रात मांगती है
मुझ से उधार
का हिसाब।
हर शै
को
लौटाना नहीं आसान, तुम छू - -
कर देखो मेरा सीना, ठीक
जिसके नीचे है ह्रदय -
पिंड, और गहन
में उतरो,
और
नीचे, कुछ और गहराई में, शायद
पा जाओ सितारों से भरा उल्टा
आसमान। बुझा दें चलो
सभी कृत्रिम उजाले,
प्रस्तर युग में
लौट जाएं,
खोह
में
बसाएं स्पर्श का आदिम नगर, न
कोई भाषा, न ही कोई निराशा,
न इस पार की दुनिया, न
उस पार का सफ़र। मुझे
महसूस करो अपने
अंदर, कुछ
और
भीतर, रक्त कोशिकाओं से हो -
कर, सुक्ष्म प्राण बिंदुओं
तक, अंतरतम की
गहराइयों का
अहसास
करो,
कदाचित पा जाओ आलोकित
रूह का शहर।

* *
- - शांतनु सान्याल

चिराग़ों का मध्यांतर - -

कूच कर गए हैं, तारे न जाने किस
दिगंत की ओर, ठहरे हुए से हैं
शून्य में ख़्वाबों के झूले,
सिर्फ़ ओस की कुछ
बूंदें हैं, बिखरे
हुए ज़मीं
पर
बेतरतीब, इक अहसास कि जी रहे
हैं, न कोई दूर है, न ही बहोत
क़रीब। वो अंजुमन ही न
रहा जहाँ से निकलते
रहे, कहकशां के
रास्ते, अब
चार
दीवारों में बंद है दिवाली, कोई अब
इंतज़ार नहीं करता, किसी
और के वास्ते। किसी
के पास है धमाका -
ख़ेज़ ख़ुशियाँ,
और कोई  
करता
है
राख में तलाश, चाँदनी रात की, न
जाने कितने घरों में अभी तक
है मुसलसल अमावस,
कोई नहीं रखता
ख़बर इस
बात
की, राख में करते हैं तलाश चाँदनी
रात की।

* *
- - शांतनु सान्याल


विपरीत यात्रा से पहले - -

 मायामृग की तरह तुम देख रही हो -
बाहर का जनसमुद्र, अनजाना
कोई चेहरा या छाऊ नृत्य
के विविध मुखौटे !
रंगीन रौशनी
के नेपथ्य
में है
मेरा अस्त्तिव एक निस्तेज़ सा कोई
आकाशदीप, तुम गुम हो किसी
और दुनिया में, बेख़बर सी
हो मेरी मौजूदगी से,
जबकि हम बैठे
हुए हैं एक
दूजे
के सामने, इस परिचित रेस्तरां में !
चेहरा घुमा कर न जाने क्या
तुम ढूंढती हो, अपने दीर्घ
निःश्वास में, काश
तुम खुल के
कहतीं
उस
हांफ जाने का रहस्य, सुदूर नील -
पर्वतों के पार सूर्य डूब चुका
है, इन निःस्तब्ध क्षणों
को दे गया है कुछ
प्रश्न चिन्हों
के जलते
बुझते
अग्नि कण, या थक चले करुण सुर
में गाते हुए मोमबत्ती ! तुम खो
चली हो किसी अज्ञात महा -
शून्य में, मुस्कुराहटों
में तुम्हारे उल्का
पात स्पष्ट
दिखता
है,
तुम्हारी मध्यमा उंगली में कहीं - -
फंस चुका है हीरक वलय,
मद्धम रौशनी में, मैंने
छुआ है तुम्हारा
नाज़ुक हाथ,
शायद
तुम
उसे महसूस ही न कर पाए, होता है,
जब उँगलियों के अग्र बिंदुओं में
झिलमिलाते हों बहुकोणीय
भौतिक सुख, मैं सिर्फ़
देखता रहा तुम्हारा
ये नया रूप,
इस
मौन जड़ता का संकेत मुझे मालूम
है, मैं निःशब्द हो कर मेज से
उठा लेता हूँ मेरा ही लाया
हुआ अवहेलित सुर्ख़  
गुलाब - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 


10 नवंबर, 2020

परछाइयों का जिस्म - -

सभी एक ही पथ के हैं यात्री, कौन
कब और कहाँ हो जाए गुम  
कुहासे के देश में कहना
है बहुत कठिन,
बहुत कुछ
पाने की
चाह
में बहुत कुछ छूट जाता है, फिर -
भी अभिलाष की तालिका
रहती है अंतहीन,
यदि किसी
दिन
विस्मृत मरूद्वीप के तट, मुलाक़ात
हो अकस्मात, तो सुनाऊँगा  
मैं तुम्हें मरीचिका की
नीरव कहानी,
बहुत कुछ
जीवन
में
रह जाते हैं अनुच्चारित, वक्षस्थल
की गहराइयों में चिरस्थायी
विलीन, किन्तु रूकती
नहीं कभी अदृश्य
पवन चक्की,
कोई
किसी के लिए नहीं रुकता, आकाश
का मंच कभी ख़ाली नहीं रहता,
यथारीति लगते रहते हैं
चाँद सितारों के
सम्मलेन,
पृथ्वी
के
सीने में रतजगा करते हैं सहस्त्र -
युगों के दबे हुए, अनगिनत
सुप्त दहन, घात और
प्रतिघात के मध्य,
शांति जल !
सिर्फ़
एक बूंद तलाश करता है परिश्रांत
ये जीवन, शून्य दिगंत में
उभरते हैं टूटे फूटे
अस्तगामी
चाँद के
बहु -
प्रतिफलन, एकटक देखते हैं नभ
की और अरण्य कुसुम,
अंतरतम का
इतिवृत्त,
ख़ुद
के
सिवा कोई नहीं जानता, पुनः वही
परिचित गंतव्य के टुकड़े, संकरी
गली, सुरंग, सीढ़ियों की
ज्यामिति, मेट्रो ट्रेन,
जन अरण्य के
मध्य ख़ुद
की
खोज, मैं या तुम कुछ भी नहीं -
सभी हैं सहयात्री, कितने
दूर संग चलेंगे बस
यही समझना
है मुश्किल,
समय
सिर्फ़
भागे जा रहा है, हम और तुम हैं
बैठे हुए, निःशब्द, एक दूजे
के सामने, खिड़की के
उस पार, उड़ रहे
हैं बादल
और
दौड़े जा रहे हैं दरख़्तों के असंख्य
क़तार, परछाइयों के जिस्म
पर चाँदनी लिख रही
है अनकही प्रेम
की कहानियां,
या तुम छू
रहे हो
मेरी
रूह के नाज़ुक परतों को बार बार।

* *
- - शांतनु सान्याल    

 

जीर्णोद्धार - -

इस विशाल राज पथ का कोई अंत
नहीं, ये मिलता है सभी से,
शहरों के गली कूचों
से, बहते हुए
आवर्जना
से,
गाँव गंज के कीचड़ सने रास्तों से,
कोहरे से ढके घाटियों से, उस -
का कुर्ता हमेशा रहता है
चमकदार, मुट्ठियों
में रखता है
वो
अदृश्य कटार, और ओंठों पर - -
फ़रेबों का बाज़ार, जब भी
वो गुज़रता है मर्क़ज़ ए
शहर से, लोग
देखते हैं
उसे
बड़ी हसरत भरी नज़र से, कौन
समझाए इन पथराई आँखों
को, ये वो मसीहा नहीं
है, जिसे समझते
हैं लोग यूँ
ही
अपना परवरदिगार, ये वो रास्ता
है जो निगलता है सभी छोटे
बड़े रास्तों को, इसे
रोकना नहीं
आसान,
ये
हर एक पांच साल में कर जाता -
हमारे जंग लगे दिमाग़ों का
मुफ़्त में जीर्णोद्धार, फिर
हम लग जाते हैं उसी  
पंक्ति में ख़ुद को
निगलवाने
के लिए,
वो
राज पथ से सीधा निकल जाता है
राजधानी, हम हाथ पाँव यूँ
ही पटकते रह जाते
हैं बीच मझधार।

* *
- - शांतनु सान्याल   

09 नवंबर, 2020

अनवरत दौड़ - -

अपूर्णता ही कल तक ले जाती है
कुछ नया पाने के लिए, प्रातः
से अपरान्ह, साँझ से
निशीथ, सब एक
ही तार में हैं
पिरोए
से,
रंग बिरंगे, उजालों के बिंदू दौड़ -
रहे हैं, रिक्त स्थान पाने के
लिए, जीवन का दीप -
पर्व नहीं रुकता
किसी एक
चिराग़
के
बुझ जाने से, जन्म से तारुण्य -
प्रौढ़ता से वार्धक्य तक, एक
अदृश्य रिले दौड़ सी है
ज़िन्दगी, कुछ
अधिक पल
जीत
जाने के लिए, कुछ नया पाने के
लिए, इक अजीब सी अनबुझ
प्यास रहती है, हर एक
मक़ाम पर, कभी
पांव रहते हैं
प्रारंभ -
रेखा पर, और कभी नियति होती
है लकीर ए अंजाम पर, वक़्त
के हाथों में रहती है
हमेशा अदृष्ट
सीटी, हमें
सहसा
चौंकाने के लिए, जय पराजय - -
कौन ढूंढे हाथ की रेखाओं
में, लेकिन दौड़ना
ज़रूरी है,
रिक्त
स्थान पाने
के लिए।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

शब ए दिवाली की रहगुज़र - -

मुझ से आंसू देखे नहीं जाते, आँखों
को बंद कर लो, सीने के किसी
कोने में अश्रु कण जमा
रहने दो, जिसने
तुम्हें दर्द
दिया
है
तुम उसे ही मजबूर करो रोने के - -
लिए, मेरा यक़ीं रखो तुम्हें
किसी और की बैसाखी
की ज़रूरत न होगी,
एक बार पुनः
खड़े होने
की
ख़ुद से कोशिश तो करो, दरअसल
दुःख वही पाते हैं जिनका दिल
शीशे की तरह साफ़ होता
है, और ये इंसानी
फ़ितरत है कि
वो अपना
असली
अक्स
नहीं
देखना चाहता, नतीजतन जल - -
दर्पण में पत्थर फेंकता है,
उसे अस्थिर करना
उसका मक़सद
बन जाता
है ये
कमतरी का अहसास ही उसे आख़िर
में सज़ा देता है, तुम पोंछ लो
अपनी पलकें, जो गुज़र
गया वो अतीत था,
कोई दुःस्वप्न
था फिर
एक
बार बसाओ रौशनी का शहर, नयी -
उमंगों के संग नया ज़िन्दगी का
सफ़र, फिर उतर आए हैं
आसमां से ज़मीं पे,
शब ए दिवाली
के रहगुज़र।

* *
- - शांतनु सान्याल

शून्य राखदानी - -

पुस्तकें अब कोई नहीं पढता, उंगली  के
अग्रभाग में हैं, अब अनुसंधान के
ठिकाने, वृहदाकार बरगद को
अब कोई नहीं देखता,
बोन्साई के हैं
सभी
दीवाने, समय के कांटे थमे से हैं अपनी
जगह, जेब के अंदर है उसका नया
आशियाना, परिवर्तनशील है
हर पल यहाँ, तुम आईने
के सामने खड़े रहो
ये तुम्हारी है
समस्या,
बज़्म
बर्ख़ास्त हुई कब की, बासी अक्स से -
न पूछो, रौशनी का गुज़रा हुआ
ज़माना, कोई नहीं जानता
कल हम कहाँ थे सिर्फ़
अंदाज़ लगाते हैं
लोग, धुंआ
सा है हर
तरफ
शहर की सड़कों पर, शून्य है रात की
राखदानी, बिन पंख ही परवाज़
लगाते हैं लोग - -

* *
- - शांतनु सान्याल

08 नवंबर, 2020

स्थगित देशांतरण - -

पिंजरे का द्वार खुला है फिर भी
मैं उड़ नहीं सकता, घेरते
हैं मुझे मोह के परकोटे,
चौखट तक जा
लौट आता
है हर
बार,
मेरे भीतर का अहंकार, हर एक -
चार दिवार के अन्तः छत -
में होते हैं विरोधाभास,
"जोगी मत जा - - "
कोई नहीं
कहता,
जब
सीने का प्रपात झर कर ख़ाली हो
जाए, उत्तरोत्तर शयन कक्ष
के ऊपर, पुनः हम बुनते
हैं नीला आकाश,
कुछ देर के
लिए
ही
सही मानचित्र अपनी जगह रुक
जाते हैं अनिश्चित काल के
लिए, पासपोर्ट में कहीं
लग जाती पुनः -
प्रवेश की
मुहर,
सुनहरी धूप पर्दों में आ कर कुछ
ठिठक सी जाती है, रिश्तों को
चाहिए कुछ और वक़्त,
परस्पर देखभाल
के लिए,
शीत -
युद्ध के बाद समय लगता हर शै
को, यथापूर्व बहाल के लिए।

* *
- - शांतनु सान्याल     

विलुप्त मानव - -

न जाने कितने चेहरे कुम्हला गए,
न जाने कितने लोग उजाड़
दिए गए, कहीं कोई
उनके अस्तित्व
का उल्लेख
नहीं,
तुमने वहीँ आज बनाया है तफ़रीह
गाह, हर तरफ हैं सिर्फ़ तुम्हारे
चर्चे, एक से बढ़ कर एक
हैं भाटों के जय गान,
कितने गाँव
डूबे,
कितने ही स्वप्न बहे उन पर कहीं
कोई शिलालेख नहीं, कहीं
कोई उनके अस्तित्व
का उल्लेख नहीं,
समाधिस्थ
हैं, न
जाने
कितने विप्लव असमय ही काल
के सीने में, सिंहासन के उस
वीभत्स खेल में किसे
फ़र्क़ पड़ता है
किसी के
जीने
या
मरने में, हम वो विरल प्राणी हैं
जो सांस तो लेते हैं, लेकिन
जीवाश्म से अधिक कुछ
भी नहीं, अस्तित्व
भी रखते हैं कहीं
इसका भी
कोई
प्रमाणित आलेख नहीं, कहीं कोई
हमारी मौजूदगी का उल्लेख
नहीं - -

* *
- - शांतनु सान्याल

मीनार की सीढ़ियां - -

तुम कवि हो इसलिए दुःखी हो,
तुम कुछ ज़्यादा ही सोचते
हो, तुम्हारे सभी दोस्त
हैं सिर्फ़ काल्पनिक
चरित्र, रात -
दिन
तुम उन्हीं से खेलते हो, तुम -
कुछ ज़्यादा ही सोचते
हो, तुम अदृश्य
मीनार तक
पहुँचने
का
सिर्फ़ एक जरिया हो, ओस
में भीगे हुए एक हरित
पायदान हो जिससे
लोग पाँव पोंछ
कर चढ़
जाते
हैं
अदृश्य बुर्ज पर, तुम धूप का
इंतज़ार करते हो, तुम
कुछ ज़्यादा ही
सोचते
हो,
तुम्हारे पास हैं असंख्य शब्दों
की मिल्कियत, भावनाओं
का गुप्त कुबेर धन
फिर भी प्रेयसी
का दिल
नहीं
जीत पाते हो, जीवन की शब्द
पहेली रहती है अधूरी, तुम
हर बार प्यादा की
तरह शहीद
हो जाते
हो,
तुम कुछ ज़्यादा ही सोचते हो।

* *
- - शांतनु सान्याल

07 नवंबर, 2020

भस्मीभूत शहर तक - -

कोई वादा नहीं निभाता, निभाना इतना
आसान भी नहीं, ये सभी जानते हैं
फिर भी शिष्टाचार के तहत
वादा किए जाते हैं,
कुछ फूल के
गुच्छे,
कुछ
मौसमी फलों की टोकरी, चेहरे में एक
अजीब सी आकृति, सुख - दुःख
के बाद का एक रहस्यमय
चरित्र, जो कांधे पर
हाथ रख कर,
अस्पष्ट
लहज़े
में
कुछ कहता है, जिसे उसके सिवा कोई
नहीं जानता, खिड़की के उस पार
वसंत नहीं रुकता, सड़क के
किनारे कोई देर तक
इंतज़ार नहीं
करता,
देह
की परछाई बढ़ते जाती है, लेकिन - -
भीतर का स्रोत सिमटता चला
जाता है, अंतोगत्वा सभी
जाने पहचाने दरख़्त
बेलिबास होते
जाते हैं
क्यूँ
न हों. मौसम के साथ बदलना भी तो
ज़रूरी है, कोई अपना वादा नहीं
निभाएगा, दुःख करने से
कुछ न होगा, रात के
आवाज़ में एक
कड़ुवाहट
है वो
साफ़ लफ़्ज़ों में कहती है,कि तुम्हारा
प्रवास ख़त्म हुआ, आग्नेय पथ
से तुम्हें आगे बढ़ते जाना
है भस्मीभूत शहर तक,
कोई वादा नहीं
निभाएगा,
तुम्हें
तनहा पूरा करना है ये सफ़र, तुम्हारे
साथ कोई भी न आएगा - -

* *
- - शांतनु सान्याल


पहला सफ़र - -

ज़िन्दगी का सिक्का उछलता रहा
नियति के हाथ, कभी हम
खड़े थे, वृद्ध शिरीष के
नीचे एक साथ,
और कभी
थे हम
बंदी, छद्मवेशी समय के हाथ, अभी
तक सूख रहे हैं कुछ जलरंग
छवि, स्मृति के छतों में,
जिन्हें हम छोड़ गए
उनके भाग्य के
साथ, अभी
तक
हैं झूलते हुए कुछ पतंग के ढांचे - -
आसां नहीं पिछला पहर भूल
जाना, न जाने कितनी
ख़ूबसूरत वादियों से
मिले, कितने ही
विशालकाय  
नदियों
के
मुहानों से बात की, सागर तट से
उठाए सीपों के आलोकित
रूह, बहुत कोशिशें की
लेकिन मुश्किल
था पहला
सफ़र
भूल
जाना, आसां नहीं पुराना घर भूल
जाना।

* *
- - शांतनु सान्याल
 
 


06 नवंबर, 2020

मोह का चुम्बक - -

चाँदनी रात को ढूंढते हैं दरख़्तों के
साए, आख़री पहर से पहले
कोई उम्र मेरी बढ़ा जाए,
अहसास की परतों
पर गिरते हैं
बूंद बूंद
तेरे  
ओंठों के उजाले, ज़िन्दगी ने फिर
छुआ है कोई मोह का चुम्बक,
प्यास कुछ और बढ़ा गए
अंधेरों के प्याले, न
कोई इसे बांधें,
तिलिस्म
के
धागे, ये मुहाजिर परिंदा है किसे
ख़बर, कल अपना वतन
चला जाए, आख़री
पहर से पहले
कोई उम्र
मेरी
बढ़ा जाए, ये ख़्वाबों का है मीना -
बाज़ार, कहकशां के दोनों
तरफ़ हैं ख़रीदार, जो
चाहे ख़रीद लो
इसके पहले
कि ये
रौशनी का शहर सुबह से पहले यूँ
ही न मिटा दिया जाए, आख़री
पहर से पहले कोई उम्र
मेरी बढ़ा
जाए।

* *
- - शांतनु सान्याल

किनाराकशी - -

अनगिनत बार टहनियों से टूटे पत्ते,
न जाने कितने बार लौट गया
मधुमास, कुछ स्तम्भित
सा देखता रहा उसे,
नए आईने में
पुरातन
कोई
अज्ञातवास। आँखों में थी दूर तक -  
बियाबां की अंतहीन ख़ामोशी,
सीने में बिखरे हुए ईंट -
पत्थर, जाहिर था
मेरे सामने
उसका
राजमहल से सड़क तक का सफ़र।
अकस्मात इस मुलाक़ात में थे
न जाने कितने काग़ज़ी -
नाव के प्रश्नचिन्ह,
जो उभरते ही
डूब गए,
न
ओंठ ही हिले, न ही दिल के द्वार
खुले, दरअसल वक़्त हर चीज़
में जंग लगा जाता है, सभी
निशान उसके नीचे
रह जाते हैं गुम
हो कर,
चाहे
वो अधर के हों या भीगे लम्हों के
युगल पदचिन्ह। किनारों की
तरफ हसरत भरी निगाह
से सिर्फ़ देखता रहता
है टूटा हुआ पुल,
अपने अपने
हिस्से
की
टूट - फूट ले कर जीना ही है - -
ज़िन्दगी, हिसाब किताब
इसी में है कुल, हसरत
भरी निगाह से
सिर्फ़ देखता
रहता
है
टूटा हुआ पुल - -

* *
- - शांतनु सान्याल

05 नवंबर, 2020

९०° से कम नहीं - -

सब कुछ एक जैसा लगता है चाहे दिल्ली
हो या सुदूर मालाबार का किनारा,
सभी घाघ चरित्र हैं सक्रीय,
अपने अपने केंचुली के
अंदर, मंच भी वही
घिसा पिटा,
दर्शक
भी
महा ज्ञानी, कोई एक हँसा तो बिना कुछ
समझे सभी हँस देंगे, यूँ तो सभी हैं
हरफ़नमौला के जात भाई,
खीसे में लिए फिरते हैं
गांधीजी के तीन
बन्दर, सभी
घाघ
चरित्र हैं सक्रीय, अपने अपने केंचुली के
अंदर। फ़र्क़, देखा जाए तो कुछ भी
नहीं, सभी एक जैसे लगते हैं,
चेहरे मोहरे में उन्नीस -
बीस हो सकता है,
कुल मिला
कर
हमारे बीच लिंग भेद के सिवा कुछ भी
नहीं, अंतर है कहीं, तो वो है, ९० °
पर रीढ़ का टिका रहना,
वरना चाबुकवाले हाथ
उठते रहेंगे बार -
बार, और
हम
झुक कर चलते रहेंगे पूर्वजों की तरह,
बेबस और लाचार, इस से बेहतर
है हक़ के लिए मरना हज़ार
बार।

* *
- - शांतनु सान्याल


 

अमरत्व के उस पार - -

समय अपना वादा नहीं निभाता,
सूर्य हौले से, धूप की चादर
डूबने से पहले खींच
लेता है, शायद
उसे ओढ़ाना
हो किसी
और
को गर्माहट देने के लिए, ऋतुचक्र
की सुई देर नहीं करती, हरे
पत्तों को सूखाने में,
मैंने चाहा है कई
बार तुम्हारे
सपनों
को
क़रीब से छूना, लेकिन पलकें है कि
अक्सर खुल जाती हैं, तुम रख
जाते हो उष्ण छुअन मेरे
सिरहाने में, तुम
छोड़ जाते
हो कुछ
धूप
के टुकड़े भग्नस्तूप के ऊपर यूँ ही -
अनजाने में, ज़िन्दगी फिर
चाहती है सहेजना उम्र
की बिखरी हुई
पटभूमि
को,
अभी तक हैं मौजूद गहराइयों में -
स्मृति स्तम्भ, छत ढह गए
तो क्या हुआ, समय
सेंध न कर सका
मेरे दिल के
ख़जाने
में,
तुम आज भी हो मौजूद जिस्म के
बहुत अंदर, तुम कल भी रहोगे
ज़िंदा, मेरी मुहोब्बत के
उजड़े फ़साने में।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 



04 नवंबर, 2020

अज्ञात यात्रा - -

उम्मीद से अधिक मिल जाए तो
जीने का मज़ा नहीं रहता,
अधूरापन ही ज़िन्दगी
को ले जाता है नए
आयामों की
ओर,
उजालों को रहने दो दिगंत के उस
पार, सिर्फ़ स्पर्श से करें बातें,
अंधेरे में अथाह गहराई
का पता नहीं रहता,
इन सांद्र पलों
में कहीं
है वो
गन्धकोष की परिधि, मधु रात
के सीने में हैं अनगिनत
रहस्य ग्रंथि, परतों
के ऊपर ख़ुश्बू
का गंतव्य
लिखा
नहीं
रहता, यूँ तो तुम्हारी रूह को - -
छूने के लिए इक उम्र काफ़ी
नहीं, फिर भी ये पल
कई शताब्दियों
से कम नहीं,
समेट लो
अपने
दामन में कुछ शबनमी अहसास
की बूंदे, ये मोती हर एक रात
में यूँ ही बिखरा नहीं रहता,
उम्मीद से अधिक मिल
जाए तो जीने का
मज़ा नहीं
रहता।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

आत्मीयता की छाँव - -

काठ का पुल था कदाचित कोई, अदृश्य
घातों ने ढहा दिया, समय की नदी
कहाँ रूकती है, उस पार के
गगनचुंबी पहाड़ियों
में रहते हो कहीं
तुम, हमारा
माटी से
बंधे
रहने के सिवा कोई उपाय नहीं, नियॉन -
से हैं रौशन तुम्हारे ख़्वाबों के बरामदे,
लेकिन मिट्टी के दीयों में रखते हैं
हम ख़ुशियों की लौ सभी के
लिए, कभी उतरो ऊँची
उड़ानों से नीचे,
बहुत नेक
दिल है
ये ज़मीं, मुस्कानों से खुलते हैं अक्सर
यहाँ फूलों के दरीचे, धुंधली आँखों
मैं तैरते हैं उजानमुखी नाव,
बरगद, घाट, मंदिर -
शीर्ष, गोधूलि में
नदी गुलाल,
आँगन
के मध्य तुलसी वृन्दावन, साँझ ढले - -
बढ़ती जाए आत्मीयता की छाँव।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

 

 
   


 

03 नवंबर, 2020

आँखों की नीरवता - -

वो पुंसत्व था, या कायरता कहना नहीं
आसान, यशोधरा के शून्य करवटों
में था, असमय अपरिग्रह का
अभिमान, हर युग में
बनते हैं न जाने
कितने बुद्ध,
नेपथ्य
में
रहती हैं मौन मुखरता, एकाकी हाथों
में लिए हुए नव युग का वरदान,
सहज है याचक बन कर वन
प्रांतर में घूमना, बहुत
कठिन है मोह के
धागों में बंध
कर, सभी
चाहों
का
करना अवसान, अंतहीन जिजीविषा
थी उसके आँखों के नीरवता में,
उस अजेय अस्तित्व ने ही
बनाया था, एक आम
आदमी को पूज्य
भगवान,
किंतु
आड़ की भूमि हमेशा रहती है जन -
शून्य, यवनिका के पार होती
है आलोक वृष्टि, नेपथ्य
के अंधेरे में रहता है
चिर सुनसान,   
यशोधरा के
शून्य
करवटों में था, असमय अपरिग्रह
का अभिमान - -

* *
- - शांतनु सान्याल


अंदर का तमस - -

बाह्य जगत है आलोकमय, अंतरिक्ष
से उतर आए हैं असंख्य नक्षत्र,
लेकिन अंदर का सुरंग है
यथावत आलोक -
विहीन, सब
दौड़
चले हैं स्वर्ण मृग के पीछे, मायावी - -
रात उनके पीछे, दूर तक नहीं
कोई लक्ष्मण रेखा, सघन
अरण्य, अभिलाषित
तृषा है अंतहीन,
अविराम
आखेट,
न
जाने किस क्षितिज पर है जागरण,
मुझे मालूम है तुम भी हो इस
रात के एकाकी यात्री,
तलाश है तुम्हें
भी निरापद
सराय
की,
यहाँ हर कोई चाहता है उपहार की
वापसी, कोई नहीं रखता याद
जन्म दिन की तारीख़,  
किसी असहाय
की, चौसर
बिछी
हुई
है हर दिशा में, खोखले हैं समस्त
प्रतिश्रुति, कुछ है तो मुग्ध
करता चाँद सितारों
का बूटेदार
आवरण,
 न
जाने किस क्षितिज पर है जागरण।

* *
- - शांतनु सान्याल


 
 
 

 
    




02 नवंबर, 2020

अनंत प्रतीक्षा - -

ठहरा हुआ हूँ मैं किसी अज्ञात अंतरीप
की तरह, न कोई बंदरगाह, न
कोई लंगर बिंदु, न दूर तक
कोई जलपोत, फिर भी
प्रतीक्षारत हैं मेरी
आंखें किसी
विस्फारित सीप की तरह,वो मुक्ता है
या कोई रंगीन पत्थर,आस्था में
लेकिन फ़र्क़ नहीं पड़ता रत्ती
भर, वो जलता है उर्ध्व -
मुखी किसी विस्मृत
मंदिर के सांध्य
प्रदीप की
तरह,
तुम्हारी निष्ठा मुझे रखती है जीवित
तुषार परतों के गहन में, तुम्हारे
उन्मुक्त हाथ उभार लाते
हैं मुझे आग्नेयगिरि
के दहन से, वो
अनंत प्रेम
है या
कोई दिव्य अनुभूति, जो करता है - -
मुझे आत्मविभोर किसी
आकाशगंगा की
द्वीप की
तरह,
ठहरा हुआ हूँ मैं कब से किसी अज्ञात
अंतरीप की तरह - -

* *
- - शांतनु सान्याल

शिनाख़्त ज़रूरी है - -

कुआं अपनी जगह लिए रहता है
रहस्य की दुनिया, ये अंधत्व
है तुम्हारा, जो बिन सोचे
समझे विष बेल
को अपने
देह
में लपेटते हो, वो कोई प्रेम न था
बल्कि धर्मांध आवेश,जो तुम्हें
दे गया उम्र भर तड़पने
का आदेश, वो
शख़्स नहीं
था
जो उसने ख़ुद को बताया, अब
तुम बिखरा हुआ अस्तित्व
समेटते हो, बिन सोचे
समझे विष बेल
को अपने
देह
में लपेटते हो। तुम्हारे संस्कार
में थे जन्मजात दया धर्म
के बीज, उसने शैशव
से देखा था केवल
घातकता,
उसके
नज़र में एक हैं निरीह पशु और
भिन्न धर्मीय लोग, उसका
उन्माद तुम्हारे जीवन
का है सर्वनाश,
शांति का
मुखौटा
ओढ़
कर ये लोग सिर्फ़ चाहते अपने
पंथ की लामबंदी, फेंकते है
झूठे नाम का चारा,
ज़हर बुझे
तीरों
से
करते हैं शिकार अपने आसपास,
उसका उन्माद तुम्हारे जीवन
का है सर्वनाश - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 



01 नवंबर, 2020

मुहाने की ख़ामोशी - -

साँझ के गहराते ही मुखरित हो
उठते हैं, सभी ज़िन्दगी के
कैनवास, सजल पलों
को समेटता हूँ
मैं अपने
देह
के आसपास, डूबता है सूरज या
उभारता है किसी और रात
का फीकापन, अंधकार
के उसपार एक नए
सुबह का रहता
है साम्राज्य,
पाप -
पुण्य के कांटेदार सीमारेखा रोक
नहीं पाते प्रकृत अपनापन,
नदी खोना चाहती है
अपना सब कुछ
सागर के
हाथ,
प्रकाश स्तम्भ के खिड़कियों में
परिंदे करते हैं रात्रि निवास,
निहारिकाओं के देश में
उस पल हम होते
हैं एक साथ,
मुहाने के
निर्जन
तट
में आख़री पहर होती है, सहस्त्र
उजालों की बरसात,  उन
मन्त्रमुग्ध लम्हों का
हिसाब रखता है,
आदिम -
शैल
चित्रकार, न कोई लिपि न कोई
भाषा, निःशब्द विनिमय का
है वो संसार, अंग प्रत्यंग
से उभरते है अंतरंग
उद्गार - -

* *
- - शांतनु सान्याल
   






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