22 अगस्त, 2020

वापसी एक अग्रदूत की - -


अंतिम छोर तक पहुँचते पहुँचते
तथाकथित अग्रदूत ने दिखाए
अपने ख़ाली हाथ, इसमें
नया कुछ भी न था,
हम कल भी
अकेले
थे और आज भी नहीं कोई हमारे
साथ। उसने न जाने क्या
सोच कर दी थी हमें
दिल जीतने की
की किताब,
उम्र भर
हम उसे पढ़ते रहे लेकिन हो न
सके कभी कामयाब। उनका
हुनर तो देखिए लफ़्ज़ों
में ही ज़माने को
जीत लिया,
हमने
सिर्फ़ कुछ एक हर्फ़ों में दिखाया
था उन्हें आईना, देखते ही,
वो हम पर, शक्त पंजों
को अपना भींच
लिया,
बहोत मुश्किल है प्रतिकूल स्रोत
में बहना, लिहाज़ा दुनिया के
साथ हमने भी आसान
राहों से गुज़रना
सीख लिया।
लेकिन
हम चाह कर भी अपने ज़मीर -
को दफ़ना न सके, वो लाख
कोशिशों के बाद भी हमें
अपने मातहत ला 
न सके, शायद
यही वजह
थी कि
वो अंतिम छोर तक आ न सके।

* *
- शांतनु सान्याल

21 अगस्त, 2020

मरहम का भरम - -

हर दौर में मरता है आम आदमी,
मीर ए कारवाँ चल देते हैं
बहारों के हमराह, पत्तों
की तरह बेमौसम
झरता है आम
आदमी ।
क़र्ज़
लेकर वो तो विदेशों में जा बसे
जो तरक़्क़ी का दम भरते थे,
ताउम्र भरपाई करता है
आम आदमी । मुझे
मालूम है तुम्हारे
अंदर का
चेहरा,
मरहम के भरम में सीने के ज़ख्म
भरता है आम आदमी, नई
सुबह की आस में हर
एक पल कड़ुए घूँट
निगलता है आम
आदमी ।
* *
- - शांतनु सान्याल




गुमशुदा दस्तावेज़ - -

आज़ादी के मानी ग़र तुम्हें
मिल जाए तो हमें भी
बताना, जो लोग
अपनी ज़मीं
से हैं बेघर,
अपने वतन में किसने
बनाया उन्हें प्रवासी,
ग़र उनका पता
मिल जाए
तो हमें
भी दिखाना, आज़ादी की -
कहानी हमें भी सुनाना।
तुमने बाँट दी हर
एक सांस को
दाएँ बाएँ,
लेकिन
उदर की आग ले कर लोग
जाएं तो कहां जाएं,
जो दिला सके
एक मुश्त
उम्मीद की किरण, उस
सुबह से हमें भी
मिलवाना,
फिर
आज़ादी के मानी हमें
 समझाना । तुम्हारे
सिवा कोई और
नहीं जां
निसार ये ग़लत फ़हमी
न ले डूबे तुम्हें एक
दिन, हमारी
नफ़स में
अभी तक है ज़िंदा बुज़ुर्गो
का दिया सुषुप्त
आतिशफिशां,
ज़रूरत
सिर्फ़ है उसे नींद से
जगाना, तुम्हारा नाम
ग़र है आज़ादी के
शहीदों में तो
वो
ऐतिहासिक दस्तावेज़ हमें
भी दिखाना, फिर घंटों
 बैठ कर आज़ादी
के मानी हमें
समझाना, जीने का हक़ - -
कम से कम हमें भी
दिलवाना ।
* *
- - शांतनु सान्याल

20 अगस्त, 2020

डूब के उभरना - -

धूसर नदी, एकाकी नील कंठ,
और झूलती बरगद की
जटाएं, लौह सेतु
और दूरगामी
रेल, एक
मौन थरथराहट, दूर तक है एक
अजीब सा सन्नाटा, जाना भी
चाहें तो आख़िर कहाँ जाएं ।
नदी अपने सीने में न
जाने कितने राज़
लिए बहती है,
जीवन -
मरण की इतिवृत्त
वो निःशब्द
हमसे कहती है । नील कंठ
को है डूब कर फिर सतह
पे उभरना, आसानी से
कुछ भी नहीं यहां
हासिल, जीने
के लिए
ज़रूरी है अक्सर मौत के कुएं
में उतरना ।
**
- - शांतनु सान्याल

पहचान की तलाश - -

तुमने जैसे चाहा वैसे ही लोगों ने पर्दे
पर दिखाया, तुमने जैसे चाहा वैसा
ही ताज़ा ख़बर आँखों के सामने
आया। ये और बात है कि
फाइलों में अब मैं -
ज़िंदा नहीं,
लोग
मुझे देख कर हैरां ज़रूर हैं, मैं आज
भी लिए फिरता हूँ अपनी
मौजूदगी का दलील,
वो आज भी मुझे
देख कर
परेशां
ज़रूर हैं। उनकी वादों का सितम तो
देखिये कि आईना भी पहचान ने
से कतराता है, इंतज़ार का
ये आलम है कि हम
ख़ुद से बेख़बर
हो चले,
इस शहर में अब हर गली, हर मोड़
पे ज़िन्दगी हमें मुंह चिढ़ाता है।
तुमने कहा था ब्रह्माण्ड
से आगे भी है एक
उज्जवल
संसार,
लाख चाहा लेकिन अंधेरों से हम -
निकल ही न पाए, अब तो
साँस लेना भी है यहाँ
दुश्वार। फिर भी
उम्मीद का
नशा
वजूद से उतरता है कहाँ, ये पोशीदा
ग़ुबार है ज़ख़्मी दिलों का साहब,
देखिए आख़िर ये पहुँचता
है कहाँ।

* *
- शांतनु सान्याल

19 अगस्त, 2020

विश्वास का दंश - -

तारीख़ बदलती है अपनी जगह, कैलेण्डर
के पृष्ठ चाहे तुम भूल जाओ बदलना,
शाहराहों से ले कर घुटन भरी
नुक्कड़ तक, ज़िन्दगी
को है यूँ ही नंगे
पाँव चलना।
अभी
तुम्हारे माथे में हैं जीत का मुकुट, ताज
ए अहंकार, नील नद के फैरोगण
से लेकर सिकंदर तक, सभी
खण्डहरों में जा मिले,
कोई नहीं यहाँ
अमरत्व
का
हक़दार। कौन है वो पुरोहित या त्रिकाल
दर्शी, जो उजड़े वेदिका पे चिराग़ ए
शाम जला गया, अभी तक हैं
ज़िंदा, गुमशुदा रूह की
सिसकियाँ, कौन
अभिशप्त
सांसों
को फिर से जिलाने का इश्तेहार दिखा
गया, हमारे हाथोँ, हमारी ही क़त्ल
का क़ुबूलनामा लिखा गया।

* *
- शांतनु सान्याल
 

 

18 अगस्त, 2020

थमी हुई बरसात - -

उस गुलमोहरी मोड़ पे कहीं तुमने बदला
था अपना रास्ता, सुदूर देवदारु के
अरण्य से तुम्हें शायद मिला
था मधुमास का निमंत्रण,
हम जहाँ थे वहीँ रह
गए, हमें था
सिर्फ़
बबूल वन का वास्ता। हमारे पास ऊसर -
ज़मीं के सिवाय, कुछ भी न था फिर
भी, हमने न मानी अपनी हार,
झोंक दिया सर्वस्व अपना
महराब ए ज़िन्दगी
के लिए, अपनी
अपनी
क़िस्मत है,कोई डूबे लब ए दरिया और
कोई, हर हाल में पहुंचे उस पार।
निर्मेघ आसमान में फिर
सजी है रौशनी की
महफ़िल,
फिर
आख़री पहर में झरेंगे पारिजात, फिर
आहत यामिनी होगी अनकही
बातों से बोझिल, फिर
निःशब्द, उनींदी,
आँखों के
तीर होगी एक मुद्दत से थमी हुई - -
बरसात।

* *
- शांतनु सान्याल   

  

अनंत अभिलाष - -

जाने  कहाँ से, उतरा है एक अजीब सा
अंधकार, पृथ्वी और आकाश के
मध्य है ख़ामोश संवाद,
परछाइयां यूँ तो
चल रही हैं
साथ साथ, फिर भी उसे नहीं जिस्म से
कोई सरोकार। नदी, पहाड़ और
विस्तीर्ण समुद्र का किनारा,
हर चीज़ है यथावत,
शब्दों के हरित
प्रदेश अब
सूख चले हैं, कुछ है बाक़ी तो वो है चिर
मौन हमारा। हर चेहरे में है जैसे
छुपा कौतुहल का फ़रेब,
हर कोई चाहता
है बनाना
केवल
ख़ुदग़र्ज़ सोपान, अगला दरवाज़ा हो या
दोस्त क़रीबी, वक़्त के आईने में
सभी अक्स हैं अभिन्न, एक
समान, हर कोई ठेल
कर छूना चाहे
अपने
हिस्से का आलोकित आसमान - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल



17 अगस्त, 2020

पड़ाव बिंदु - -

यूँ ही कुछ देर और, मेरी साँसों के साथ
चलते रहो, मोम की तरह मेरे सीने
में पिघलते रहो, न जाने
कितनी दुआओं के
बाद तुम्हें
पाया है
रूह ए शमा की तरह दिल की गहराइयों
में जलते रहो। किसे मालूम है
हवाओं का रुख़, सुबह से
पहले ख़्वाबों के
उनवान, न
बदल
जाएं, अभी तो हो तुम, मेरी जिस्म ओ -
जां के मुख़ातिब, देख कर नई
रौशनी, फिर कहीं तुम्हारे
दिल के अरमान, न
बदल जाएं।
ये सच
है कि मेरे हिस्से की धूप अक्सर आती
है क़िश्तों में, फिर भी खिलने की
ख़्वाहिश किसे नहीं होती,
ये और बात है कि
अब वो मिठास
ही न रही
रिश्तों
में। निशि पुष्पों की तरह बिखर जाते -
हैं सभी पल अनुरागी, इक भीगा
सा एहसास ख़ुश्बुओं में
डूबा हुआ, रूह के
हमराह बस
चलता
रहता है, जैसे चलता जाए कोई तनहा
वैरागी। तुम्हारी आँखों में कहीं
बसता है प्रवासी सपनों का
गाँव, मेरी झुलसी हुई
ज़िन्दगी को
अक्सर
जहाँ मिलता है इक पुरसुकून मरहमी
छाँव।

* *
- - शांतनु सान्याल

दहलीज़ पार तो आओ - -

अनकही बातों के बेल मुंढेर तक
चढ़ न पाए, कहाँ खिलने से
लेकर ख़ुश्बुओं की बात
थी, दहलीज़ से
आगे उनके
पाँव, दो
क़दम भी बढ़ न पाए। ज़िन्दगी
का सलीब जितना भी भारी
क्यूँ न हो, हर हाल में
उसे उठाना होगा,
उनकी
मसीहाई का तिलिस्म दो वक़्त
की रोटी नहीं देगा, शापित
जिस्म को बारम्बार
जिलाना होगा।
कुछ तो
क़ुदरत का कहर, कुछ अपनों की
मेहरबानी, सीने में है इक
आतिशफिशां और
आँखों में मंज़िल
अनजानी।

* *
- शांतनु सान्याल




16 अगस्त, 2020

अंतिम बिंदु के उस पार - -

दरअसल, हर अंतिम बिंदु के बाद ही
होती है इक नयी शुरुआत, फूलों
को हर हाल में है खिलना
उम्र से लम्बी नहीं
ये काली रात।
सांप और
सीढ़ियों का खेल छुपा है माथे की - -
इन लकीरों में, कल तक था
जो सरबराह - क़ायदा,
आज वही है
जकड़ा
हुआ बेरहम वक़्त की ज़ंजीरों में। न
कुछ है मेरे वश में, न तू ही है कोई
आख़री इन्साफ़ का प्राधिकार,
माना कि आज मेरी गर्दन
है तेरे आगे झुकी
हुई, लेकिन
ये भी
सच है कि तेरे सर पे लटक रही, इक
अदृश्य तलवार।

* *
- शांतनु सान्याल

15 अगस्त, 2020

लौटतीं मूक प्रतिध्वनियां - -

दरख़्वास्त, आख़िर हम करते भी
किन से, जिन्होंने लगाई थी
आग हमारी छतों पे
वही निगह्बां -
क़ानून
थे, वही रईस ए शहर भी, हमारी -
बस्ती का उजड़ना शायद तै
था, कौन करे यक़ीं सुबह
की ख़ुशगवारी का,
उनके हाथों
में क्या
नहीं, चाहें तो अमृत, चाहे तो ज़हर
भी। अँधेरे और उजाले में फ़र्क़
हमारे लिए बेमानी है, जो
हर लम्हा बदलते हों
खुद का ज़मीर,
कपड़ों की
तरह,
शायद उन्हें आईने से भी परेशानी
है। तमाम प्रतिध्वनियां यूँ
ही लौटती रहीं वादियों
से टकरा कर, हमने
चाहा था, उनके
भीतर तक
पहुंचना,
उनकी रूह को जगाना, ग़लत तो
न था आवाज़ देना ख़ुद को
बिसरा कर, तमाम
प्रतिध्वनियां यूँ
ही लौटती
रहीं
वादियों से टकरा कर, निरुत्तर -
और निःशब्द, कोहरे में
गुम - -

* *
- शांतनु सान्याल 

शत शत नमन माँ भारती - -

तुम्हारी धरती, तुम्हारा है आसमान,
बनाओ इस तरह से आग्नेय -
सीमान्त कि हमलावर
का हो उदय से
पूर्व, पूर्ण
अवसान। तुम्हारी नदियां, तुम्हारे ये
मंदिर - घाट, तुम्ही हो विश्व
पुरोधा, तुम्हारे हाथों में
है उभरता हुआ
दिगंत,
तुम्ही हो कल के अजेय सम्राट। इस
मातृ धरा में जिसने जन्म लिया
उसे नहीं चाहिए कोई और
आलोकित वास स्थान,
तुम्ही हो अर्जुन
तुम्ही में
समाया त्रिलोक का मुक्ति - स्नान। -
केसर के बागों से लेकर नील -
पर्वतों तक, हिमगिरि से
उठकर सोमनाथ के
शीर्ष तक. सिर्फ
तुम्हारी हो
वंदना,
माँ भारती ! केवल तुम्हारा हो अखंड
यशोगान, तुम्हारे चरणों में ही हो
पुनर्जन्म, तुम्हारे लिए ही
निकले देह से मेरे
प्राण।

* *
- शांतनु सान्याल 
चित्रांकन - - अबनीन्द्र नाथ ठाकुर (निर्माण १९०५ )

14 अगस्त, 2020

हमें भी ज़रा याद रखना - -

सभी नाव लौट आए उजान स्रोत से
अपने अपने लंगर ज़मीं की ओर,
अंधकार बुलाता है हर शै को
हर हाल में अपनी ओर।
तुम्हारी चाँद रात
की बातें,
अक्सर मुझे ले जाती हैं दुनिया से
बहोत दूर, मैं इन स्वप्नमय
बातों से बहोत घबराता
हूँ, दरअसल
सीलन
भरे कमरों में ही उम्र गुज़र गई अब
हर एक ज़ख्म लगे है मुझे दिल
के क़रीब, बहोत मधुर।
किसे आवाज़ दें
यहाँ, हर
शख़्स है गोया स्वयं तक सिमटा हुआ,
लिहाज़ा चुप रहना ही लाज़िम
है, न कोई सम्बोधन, न
चेहरे में उसके उभरे
कोई हाव भाव,
बहोत
नज़दीक से वो आज गुज़रा कहने को
यूँ तो बरसों का मरासिम है।
ये शहर, ये घुमावदार
उड़ान पुल के
रास्ते,
सब थक हार के सो गए, सुबह ग़र - -
मुलाक़ात हो तो पिछले सलाम
का जवाब देना, सीढ़ियाँ
सिर्फ़ चढ़ने के लिए
नहीं बनती,
कभी
उतरते वक़्त हमें भी ज़रा याद रखना।

* *
- शांतनु सान्याल



13 अगस्त, 2020

आग्नेय परिधि से बाहर - -

इसी घाट पर मैंने उतार फेंकी है सभी
दांभिक आवरण, इन्हीं सीढ़ियों
से उतर कर मैंने देखा है
जल दर्पण, इसी
अश्वत्थ के
निचे
तुमने सर्वस्व किया था मुझे अर्पण ।
उन पलों में मैंने क्या पाया और
क्या कुछ खोया, अब कुछ
भी याद न रहा, निवृत
हैं तमाम चाहतें,
तुम्हें पा कर
जीवन
में अब कोई अवसाद न रहा। - - -
मुहाने की भूमि और समुद्र
का किनारा, लहरों के
मध्य कदाचित
झूलता रहा
मौन,
धुंधमय, अवर्णित प्रणय हमारा।
धुआं सा उठता रहा दोनों
किनारे, और मझधार
में रहे देह हमारे,
डूबते -
उभरते उन्हीं क्षणों में, अधिक - -
मुखर हुए नेह हमारे। इन्हीं
सीढ़ियों से चढ़ कर
सजल शरीर,
हमने
छुए देवालय के बंद कपाट, अब
पाप - पुण्य से मुक्त हैं सभी
मन की ग्रंथियाँ, दूर तक
रास्ता अब लगे
सीधा और
सपाट।

* *
- शांतनु सान्याल





  

12 अगस्त, 2020

नेह का समीकरण - -

मायावी कौन नहीं इस जहाँ में,
रेशमी कोशों में छुपे हों
कोई या बेझिझक
चल रहे हों
तेरे -
मेरे साथ अविरल कारवां में, -
गंध विहीन फूलों की
तरह थे सभी
छायामय,
फिर
भी जीते रहे हम उम्र के बियाबां
में, मैं और मेरा इतिहास
कुछ भी नहीं, कभी
फ़ुर्सत मिले
तो
पढ़ लेना अदृश्य लिपि नियति
के आसमां में, ये रास्ता
जाता है आदि और
अंत के उस
पार,
न मैं कोई परिपूर्ण पुरुष न ही
तुम्हारी है कोई गणना,
किसी निःस्वार्थ
मेहरबां में,
सब
कुछ है पारदर्शी क्या तमस -
और क्या रुपहली चाहत, इस
परिपूरक समीकरण से
कोई नहीं मुक्त
इस क्षणिक
जहाँ में।

* *
- शांतनु सान्याल





11 अगस्त, 2020

कुछ और वक़्त चाहिए - -


रात को गुज़रना है हर हाल में, चाहे दूर तक 
हों कोहरे के साए, कोई  नहीं सुनेगा 
तुम्हारी मेरी ख़ामोशियों की 
बातें, किसे फ़र्क़ पड़ता 
है यहाँ, ये तो पता 
विहीन शहर 
है, कोई 
आये या कोई अजनबी की तरह चुपचाप - -
निकल जाए। हमारे अस्तित्व का 
बना रहना भी अपने आप 
में किसी युद्ध से कम  
नहीं, किसे 
दिखाएं 
टूटे ख़्वाब के महीन टुकड़े, इन्हें फिर जोड़ने 
का अब कोई भरम नहीं। सांवली रात के  
आंचल से सितारों के गोट झर 
चले, बहोत मुश्किल है 
उम्र भर का साथ 
निभाना, 
लिहाज़ा सुबह से पहले दुआओं से अपनी सूनी 
गोद भर चले। कौन बैठा है यूँ एकाकी, 
निस्तब्ध, उम्र दराज़ पीपल के 
निचे, न जाने कितने 
लहर उभर कर 
डूब गए, 
उन निगाह ए झील के निचे। न करो फिर कोई 
नया वादा, कि वक़्त चाहिए कुछ और 
उभरने के लिए, अभी अभी तो 
लूटा है शहर को किसी ने,
न जाने कितनी 
सदी, और 
चाहिए, गली कूचों को दोबारा संवरने के लिए। 

* * 
- शांतनु सान्याल  

04 अगस्त, 2020

ठहराव के बाद - -

बूंदों के मोती चिर चंचल, पत्तों के
वक्ष सदा ख़ाली, नेह - तृषा
न बुझे, सजल ऑंखें
अनंत सवाली।
जीवन -
पथ अशेष, उम्र का सफ़र फिर भी
अधूरा, बेशुमार वादे और
असंख्य इंतज़ार,
हथेलियों
में आए सिर्फ़ बादलों का चूरा। ये
कौन है जो आख़री पहर देता
है दस्तक, न ज़मीं, न
कोई आसमां मेरा,
फिर भी वो
हर हाल
में पहुँचता है मुझ तक। ये कैसी
तड़प है मेरे दिल की, दौड़ता
है बेतहाशा दिगंत की
ओर, दीवानगी
हो गोया
उसे इक नयी मंज़िल की। तुम हो
सामने या मेरा अक्स है
रूबरू, ये कैसा है
तिलिस्म
तेरी
आँखों का, इक ठहराव जो न हो
ख़त्म और न ही शुरू।

* *
- शांतनु सान्याल

28 जुलाई, 2020

जब उठी रात की महफ़िल - -

सभी लोग थे मौजूद, ख़ामोश
तमाशबीन की तरह, कोई
चेहरा छुपाए हुए, कोई
निगाह झुकाए हुए,
हक़ ए वजूद
की सिर्फ़
बात
थी, हंगामा यूँ उठा किसी जुर्म
ए संगीन की तरह । किसे
दिखाएं ढलती उम्र की
दलील अपनी, जब
हों रूबरू सलीब
ओ कील
अपनी,
ख़ुद को आख़िर पेश किया
 किसी पंख विहीन की
तरह । देवव्रत और
अंध कूप के
दरमियाँ
थी बस एक पल की दूरी,
वक़्त की चाक रुकती
नहीं चाहे जितनी
क्यूं न हो
अपनी
मजबूरी, प्रतिबिम्ब
भी इक दिन
हो जाता
है बेरंग किसी पुराने रेशमी - -
 कालीन की तरह ।
- - शांतनु सान्याल







17 जुलाई, 2020

भूमिका - -

भीगने की ख़्वाहिश होती है
अंतहीन, हथेलियों से
लेकिन फिसल ही
जाते हैं लम्हे
बेहतरीन ।
गहन
आंखों में दूर दूर तक होती है
मरुधरा, दिखाएं तुम्हें भी
भूगर्भीय स्रोत, ग़र
पलकों में कुछ
देर ठहरो
ज़रा।
मुखौटों के शहर में आईना था
बहोत अकेला, भीड़ में
भटकता रहा वो
रात भर,
सुबह देखा तो न था कोई तम्बू
न ही घूमता ख़्वाबों का
 कोई हिंडोला ।
मेरी सांसों
से उठती
हैं चंदन की महक ये तुम्हारा
 बयान है, शायद सच हो,
जिस्म जल चुका तब
कहीं आकाश
मेहरबान
है ।
इस शहर में कभी हम भी थे
बहोत मशहूर, वक़्त का
तक़ाज़ा है, कि अब
लोग न पहचानने
पर हैं
मजबूर, ये दुनिया की है अपनी
ही रीत, हर कोई निभाता
है यहां अपनी अपनी
भूमिका ज़रूर ।
- - शांतनु सान्याल










06 जुलाई, 2020

बिना दस्तक - -

कुछ ख़्वाहिशों की ज़मीं होती
हैं वृष्टि छाया की तरह बंजर,
उम्र ढल जाती है सिर्फ़
बादलों को निहार
कर । कुछ
चिठियाँ
बूढ़ा
जाती हैं संदूकों में बंद रह कर,
कुछ अनुरागी पल पहुँच
जाते हैं मंज़िल तक,
यूँ ही पत्तों की
तरह बह
कर ।
दरअसल ख़ुद से हम बाहर
कभी निकल पाते ही नहीं,
सिर्फ़ संवरने की चाह
में आईने से कभी
बाहर आते
नहीं ।
दहलीज़ पे मेरे ये कौन सुबह
सवेरे अतीत का अख़बार
रख गया, मेरी आँखों
में अभी तक हैं
हसीं ख़्वाबों
के साए,
न जाने कौन मेरी पलकों पे फिर
से बूंदों का अम्बार रख गया ।
जिसे मैं भूल आया था
इक ज़माना हुआ,
किसी दिलकश
मोड़ पे, न
जाने
कौन फिर मेरे दरवाज़े दोबारा
मिलने का ऐतबार रख
गया ।
- - शांतनु सान्याल

30 जून, 2020

असमाप्त - -

शब्द पहेलियों की तरह थे
उसके चेहरे के उतार
चढ़ाव, मुझसे
मिलने के
बाद
वो शख़्स सो न पाया तमाम
रात, हिसाब किताब की
फेहरिस्त शायद थी
बहोत ही लम्बी,
होंठ हिले,
आंखों
में उभरे कुछ अतीत के साए, - -
फिर भी वो खुल के रख
न पाया अपनी बात ।
दरअसल बहुत
कुछ ज़िन्दगी
में यूँ ही
रहती
हैं बेज़ुबान, ज़ख्म भर जाते हैं
वक़्त गुज़रते, छोड़ जाते हैं
तहे दिल खुरदरे निशान,
मिटते नहीं लेकिन
घात प्रतिघात ।
कुछ लम्हों
की उम्र
कभी
ख़त्म होती नहीं, ये दौड़ती हैं
उम्र भर सांसों के हमराह,
पल भर भी ये सोती
नहीं, चाहे दिन
हो या रात ।
- - शांतनु सान्याल





16 जून, 2020

पिघलते लम्हात -

उन वाष्पित पलों में कहीं तुमने
उकेरा था मेरा नाम बड़ी
गर्मजोशी से, वही हैं
खिड़कियां, वही
शीशों वाला
दरवाज़ा,
वादियों में अक्सर उभरते हैं - -
बादल, लेकिन बरसते नहीं,
तकता हूँ मैं सुनसान
राहों को बड़ी
ख़ामोशी
से । गुलमोहर झर चले हैं, और
अमलतास बेरंग, फिर भी
ज़िन्दगी नहीं रुकती
किसी के लिए,
नाज़ुक हैं
बहोत ये पल नजदीकियों के,
न तोड़ इन्हें यूँ मायूसी से।
कुछ बूंद मेरी आँखों
के तेरी हथेली पे
पनाह चाहें,
पत्थर
हूँ या कोई गौहर नादिर, बिखरे
जज़्बात मेरे पारखी निगाह
चाहें ।
- - शांतनु सान्याल








08 जून, 2020

आवाज़ जो लौट आए - -

ये सही है कि निगाहों से दूरी
रिश्तों को कमज़ोर कर
जाए, लेकिन ये भी
भी ग़लत नहीं
कि कोई
और
ज़ख्म मेरा भर जाए । किताबों
से निकल कर, कभी तू आ
इन बंजर ज़मीं के रास्ते,
मुमकिन है गहरी
नींद से ज़रा
उबर
जाए । अभी तो है हर तरफ़
नदी का भरपूर किनारा,
कुछ देर रहो दिल के
क़रीब अदृश्य
उफान की
तरह, किसे ख़बर कि कब ये
दिल से उतर जाए । सभी
को है कुछ न कुछ
शिकायत यूं
तो इस
ज़िन्दगी से, रास्तों की कमी
नहीं है लेकिन ज़रूरी
नहीं वो हमदर्द
सिर्फ़ मेरे
घर आए । तन्हा आवाज़ की
प्रतिध्वनि असरदार नहीं
होती, आओ मिल के
सभी दें आवाज़,
कि बेदर्द
ज़माना
हर हाल में वहीं ठहर जाए - -
* *
- - शांतनु सान्याल









27 मई, 2020

नेपथ्य में कहीं -

ये धूप - छांव का अनुबंध है
बहोत नाज़ुक, कब बदल
जाए रंगीन परदों का
जादू कोई जाने
ना, कल
और
आज के दरमियां बहुत कुछ
बदल गया, कल मेरा
वजूद किसी राजा
से कम न था,
आज हूँ
भीड़
में भी अकेला, जाहिर है अब
मुझे कोई पहचाने ना। इस
रंगमंच में सभी को है
निभाना अपना
अपना
किरदार, कभी भरपूर सभागृह,
इत्र में डूबी हुई सांसे करे
इंतज़ार, और कभी
ज़िन्दगी एक
शब्द भी
जाने
ना। ख़त ओ किताबत मेरी कुछ
कम न थी, लेकिन जवाब थे
कि गुम हो गए लौटते
हुए, किसे दोष दें,
जब बहुत
अपना
कोई, हमें अपना ही माने ना।
- - शांतनु सान्याल


16 मई, 2020

अब कोई दुआ न देना - -


अब लम्बी उम्र की दुआ न देना
के अब बहलने की उमर नहीं 
हमारी, इक मीठा सा है
ख़ुमार रूह की
गहराइयों
तक,
वो नशा जो चेहरे तक आ
के सिमट जाए, वो
चाहत अपने
आप उतर
गई
सारी । चाँदनी का लिबास
ओढ़े कब तक इंतज़ार
करे कोई, झरते
फूलों के
साथ
आख़िर, ये रात भी यूँ ही सो
गई बेचारी, तर्जुमा है
बहोत मुश्किल,
रहने दे गुम,
तहे -
निगाह भूली हुई दास्ताँ हमारी।
- - शांतनु सान्याल


10 मई, 2020

बहाने तलाश करें - -


हर सांस हैं बोझिल, हर एक
नज़र में सूनापन, फिर भी
ज़िन्दगी मुस्कुराने के
बहाने तलाश
करे, वो
कोई
आशना चेहरा है या ख़्वाब
पिछले पहर का, दूर
जितना जाना
चाहूँ, वो
क़रीब
आने के बहाने तलाश करे।
मेरा पता है कहीं क्षितिज
की नाज़ुक लकीरों में
छुपा हुआ, वो अपने
सीने में अक्सर
मुझे छुपाने
के बहाने,
तलाश
करे। मैं चाह कर भी यूँ
निजात पा न सकूँ,
वो शख़्स मुझे,
हर लमहा
अपने
में समाने के बहाने, तलाश
करे। न उसके इख़्तियार
में है कुछ, न मेरे वश
में ज़रा भी, फिर
भी न जाने क्यूँ
वो मुझे से
लौट के न जाने के बहाने
तलाश करे।
- - शांतनु सान्याल




07 मई, 2020

निरुपाय हर एक चेहरा - -

कुछ भी नहीं वश में अपने,
चाहे हो दो गज़ ज़मीं या
मुट्ठीभर आसमान,
तुम भी हो
परदेशी
मुसाफ़िर, मेरा भी नहीं यहां
कोई चिरकालिक स्थान ।
परिभाषाओं का क्या,
धुंध की तरह
अक्सर
बदलते हैं वादियों का रुख,
कभी बिखरे नदिया
कगार, कभी
पहाड़ों सी
ऊंची
उड़ान । विलिनता ही है - -
इस जीवन का एकमेव
शाश्वत - सत्य, फिर
क्यूँ हो हम इतना
आंतकित,
ख़ुद के सिवा कोई नहीं - -
दे हमें यहां अभयदान ।
उदय के साथ
अदृश्य
चले हमेशा सूरज का चिर
अवसान ।
- - शांतनु सान्याल






05 मई, 2020

मरहमी स्पर्श - -


न जाने कौन सी जगह है
उस पार, जो लुभाती है
मुझे जुगनुओं के
द्वीप की तरह
हर बार,
मेरा जिस्म होना चाहे कोई
विस्मृत, पुरातन मंदिर,
तुम विशालकाय
बरगद बन
पाओ
अगर इक बार, मुझे तुम्हारे
आवर्त में है जीना मरना,
नहीं चाहिए छद्मवेशी
ये संसार, ये सही
है कि हर एक
के भाग्य
में नहीं
मोंगरे की तरह खुल के - -
महकना, हर्ज़ क्या है
आख़िर माटी गंध
हो जाना कभी
कभार,
देह मेरा है ढहता कोई प्राचीर,
ढहने दो इसे यूँ ही वक़्त के
साथ, हो सके तो ढक लो
मुझे अपने मरहमी -
शैवाल से
आरपार ।
- शांतनु सान्याल








03 मई, 2020

नदी और किनारे के दरमियान


नदी और किनारे के
दरमियाँ
रहता है एक ख़ामोश सा
रिश्ता, डूबने का सुख
वही जाने जो
टूटने को
हो
तैयार । उठ गई रात ढले आसमां
की महफ़िल, फिर दिल में है
जागी सुबह की उम्मीद,
फिर कलियां हैं
खिलने को
बेक़रार ।
कहने को दूर दूर तक है एक न
ख़त्म होने वाली वीरानगी,
किसे ख़बर कितनी
दूर तक ले चले
ऐ बहती
हुई
दिल की आवारगी, न जाने इसे
है किससे यूँ मुक्कमल
मिलने का अशेष
इंतज़ार ।
- शांतनु सान्याल

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