28 जुलाई, 2020

जब उठी रात की महफ़िल - -

सभी लोग थे मौजूद, ख़ामोश
तमाशबीन की तरह, कोई
चेहरा छुपाए हुए, कोई
निगाह झुकाए हुए,
हक़ ए वजूद
की सिर्फ़
बात
थी, हंगामा यूँ उठा किसी जुर्म
ए संगीन की तरह । किसे
दिखाएं ढलती उम्र की
दलील अपनी, जब
हों रूबरू सलीब
ओ कील
अपनी,
ख़ुद को आख़िर पेश किया
 किसी पंख विहीन की
तरह । देवव्रत और
अंध कूप के
दरमियाँ
थी बस एक पल की दूरी,
वक़्त की चाक रुकती
नहीं चाहे जितनी
क्यूं न हो
अपनी
मजबूरी, प्रतिबिम्ब
भी इक दिन
हो जाता
है बेरंग किसी पुराने रेशमी - -
 कालीन की तरह ।
- - शांतनु सान्याल







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