03 मई, 2020

नदी और किनारे के दरमियान


नदी और किनारे के
दरमियाँ
रहता है एक ख़ामोश सा
रिश्ता, डूबने का सुख
वही जाने जो
टूटने को
हो
तैयार । उठ गई रात ढले आसमां
की महफ़िल, फिर दिल में है
जागी सुबह की उम्मीद,
फिर कलियां हैं
खिलने को
बेक़रार ।
कहने को दूर दूर तक है एक न
ख़त्म होने वाली वीरानगी,
किसे ख़बर कितनी
दूर तक ले चले
ऐ बहती
हुई
दिल की आवारगी, न जाने इसे
है किससे यूँ मुक्कमल
मिलने का अशेष
इंतज़ार ।
- शांतनु सान्याल

12 टिप्‍पणियां:

  1. गजब की रुमानियत है आपकी इस रचना में । बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीय ।

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05 -5 -2020 ) को "कर दिया क्या आपने" (चर्चा अंक 3692) पर भी होगी, आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  3. वाह !लाजवाब अभिव्यक्ति आदरणीय सर.
    सादर

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  4. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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