अपना अपना है सुख, कुछ जागते
रहे सारी रात, बिखरे सिक्कों
को चुनते हुए, कुछ मेरी
तरह जीते रहे
लापरवाह,
सुदूर
आकाश पार, बंद आँखों से, यूँ ही
बेतरतीब से, तारों को गिनते
हुए। हर तरफ़ हैं न जाने
कितने ही तरह के
हाट - बाज़ार,
फिर भी
लोग
थकते नहीं, उम्र भर किये जाते
हैं, मोल - भाव का व्यापार,
चाहे आप, हमें जो जी
में आए, नाम दे
दें, हमने
तो कई
रातें गुज़ारी हैं, उनकी पलकों से
टपकते, ओस कणों को
सहेजते हुए, यूँ ही,
बेतरतीब से,
तारों को
गिनते
हुए। धन और ऋण का खेल, - -
अंततः बराबर शून्य ही
निकला, कितने
ही सितारों
को देखा
है -
हमने मुख पृष्ठ से, सीधे तृतीय
पृष्ठ पर उतरते हुए, हमारा
ठिकाना यूँ तो कहीं भी
नहीं, उड़ा ले जाए
हवा, जहाँ जी
चाहे, यूँ
तो
कई बार हमने देखा है दरख्तों को
पोशाक बदलते हुए, मौसम
को अपने वादे से सरे -
आम मुकरते
हुए, कुछ
जागते
रहे सारी रात, बिखरे सिक्कों को
चुनते हुए।
* *
- - शांतनु सान्याल

वाह, बहुत सुन्दर।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१९-१२-२०२०) को 'कुछ रूठ गए कुछ छूट गए ' (चर्चा अंक- ३९२०) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंवाह बेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंपतझड़ के बाद जो बहार आती हैं उसे देखने के लिए सब्र कहाँ इंसानों में
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी प्रस्तुति
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंऐसी लापरवाही से जीना ... बेहद खूबसूरत ।
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति,सादर नमन सर
जवाब देंहटाएंतहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंहर तरफ़ हैं न जाने
जवाब देंहटाएंकितने ही तरह के
हाट - बाज़ार,
फिर भी
लोग
थकते नहीं, उम्र भर किये जाते
हैं, मोल - भाव का व्यापार,
सुन्दर...
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत गहन अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंमुख पृष्ठ से तृतीय पृष्ठ ग़ज़ब दृष्टि।
अप्रतिम सृजन।
तहे दिल से शुक्रिया - - नमन सह।
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