09 मई, 2022

दो घड़ी के उस पार - -

उतरती दुपहरी में हुज़ूर, सुबह का अक्स
न तलाश करो, चल सको, तो चलो
कि दूर तक कोई मरुद्यान
नहीं, देह से लिपटे हैं
बेशुमार थूअर के
ज़ख़्म, इस
यात्रा में
कहीं
कोई अनुताप के लिए स्थान नहीं, जो -
मिल गया वही था, एक मुश्त
नियति का उपहार, जो खो
गया सो गया उसकी
वापसी का अब
न आस करो,
उतरती
दुपहरी में हुज़ूर, सुबह का अक्स न - -
तलाश करो। अजीब से हैं ये सभी
चाहतों के रिश्ते, इक छोर
से लपेटें, तो दूसरा
छोर ख़ुद ब
ख़ुद जाए 
खुल,
योग - वियोग करते रहे उम्र भर, अंतिम
प्रहर में शून्य के सिवा कुछ न मिला,
इक नशे से कुछ कम नहीं ये
ज़िन्दगी, काश आख़री
पहर से पहले ज़रा
सा जाएं संभल,
धूप - छांव
का ग्राफ
अपनी जगह होता है निरंकुश, जो पल -
हैं हासिल अभी वही हैं अनमोल
मोती, जो टूट के बिखर गए
सो बिखर गए उन्हें
सोच के ख़ुद को
न उदास
करो,
उतरती दुपहरी में हुज़ूर, सुबह का अक्स
न तलाश करो।
 * *
- - शांतनु सान्याल
 नागपुर

04 मई, 2022

मुहूर्तों के उस पार - -

ये काठ के खम्बे ही हैं जो थाम रखे हैं
पुल का अस्तित्व, दोनों पार की
दुनिया है सलामत इसी
एक विश्वास पर,
गुज़रना है
हमें
इसी जर्जरित राह से हो कर, नज़र है
टिकी हुई उस पार की ज़िन्दगी
पर, मुहूर्तों का अंक है एक
भूल भुलैया, उम्र नहीं
गुज़रती सपनों
के पूर्वाभास
पर, ये
काठ
के खम्बे ही हैं जो थाम रखे हैं पुल -
का अस्तित्व, दोनों पार की
दुनिया है सलामत इसी
एक विश्वास पर।
ख़ुशियों की
साझेदारी
में ही
है
छुपी हुई दिल की अदृश्य ख़ूबसूरती,
जबकि आजन्म हम भटकते रहे
इस घाट से उस घाट के
दरमियां, फिर भी
पाना नहीं
आसां,
दुःख
दर्द से मुक्ति, कुछ भी असर नहीं -
होता चाहतों के मोहपाश पर,
ये काठ के खम्बे ही हैं जो
थाम रखे हैं पुल का
अस्तित्व, दोनों
पार की
दुनिया
है सलामत इसी एक विश्वास पर। - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

30 अप्रैल, 2022

ख़ुद से साक्षात्कार - -

जन अरण्य में भी बहुधा जीवन होता है
निःसंग, कहने को झिलमिलाते हैं
हर तरफ आलोकमय माला,
निर्लिप्त सा रहता है
मन का आँगन,
और शून्य
होता
है
देह का प्याला, फिके फिके से लगते हैं
इंद्र धनुष के रंग, जन अरण्य में भी
बहुधा जीवन होता है निःसंग ।
इन विराग पलों से ही
निकलते हैं आत्म
परिचय के
ठिकाने,
वो
सभी चेहरे थे क्षणिक, उभरे और पलक
झपकते ही खो गए किधर, कौन
जाने ? शाब्दिक जाल हैं सभी
आत्मीयता के रास्ते,
कोई नहीं मरता
किसी के
वास्ते,
बस
मृग मरीचिका में ढूंढते हैं हम अविरत
अपना अंतरंग, जन अरण्य में
भी बहुधा जीवन होता है
निःसंग ।
* *
- - शांतनु सान्याल

29 अप्रैल, 2022

समानांतर यात्रा - -

अग्नि - पुष्प की तरह उभर आते हैं वो
सभी निखोज स्वप्न, जो दबे रहते
हैं राखरंगीं सुदूर प्रांतरों में,
अशेष हैं सभी रास्ते,
मृग जलों की
दुनिया के
उस
पार, अदृश्य रात्रि निवास की है अपनी
ही अलग ख़ूबसूरती, उम्मीद के
चिराग़ बुझते कभी नहीं
समय के मध्यान्तरों
में, उभर आते हैं
सभी विलुप्त
स्वप्न,
राखरंगीं सुदूर प्रांतरों में। समुद्र सैकत
पर खड़ा हूँ मैं, ले कर हिय में एक
अगाध तृषा, जबकि कुछ बूंद
ही प्रयाप्त हैं जीने के
लिए, टूटे हार की
तरह अक्सर
हम ढूंढते
है एक
रेशमी डोर, सांसों के मोती पिरोने के -
लिए, मध्यम मार्ग पर चल रहा
हूँ मैं, चल रहे हैं दोनों तरफ
धूप और छाया, प्रकृत
समानान्तरों में,
उभर आते
हैं सभी
विलुप्त स्वप्न, राखरंगीं सुदूर प्रांतरों
में।
* *
- - शांतनु सान्याल
   



28 अप्रैल, 2022

निःशब्द कथोपकथन - -

वो पल थे अविस्मरणीय, जो खुले आकाश
के नीचे बिखर गए, अवाक थे तुम
और मैं भी निःशब्द, सिर्फ़
चल रहे थे अंतरिक्ष
में सितारों के
जुलूस !
तुमने कुछ भी न कहा, लेकिन रूह तक जा
पहुंची तुम्हारी वो अनकही बातें, उन
पलों में हम ने जाना जीवन का
सौंदर्य, उन रहस्यमयी
क्षणों में हम भूल
गए दुनिया
की सभी
घातें,
सिर्फ़ कुछ याद रहा तो वो था परस्पर का
एक ख़ामोश, हमआहंगी वो ख़ुलूस,
अवाक थे तुम और मैं भी
निःशब्द, सिर्फ़ चल
रहे थे अंतरिक्ष में
सितारों के
जुलूस !
इक उम्र से कहीं ज़्यादा हम जी चुके हैं -
उन ख़ूबसूरत लम्हों के दरमियां,
क्या पाया हम ने और क्या
कुछ खो दिया उनका
हिसाब कौन करे,
चाहे बना लो
जितने भी
अमूल्य शीशमहल, पलक झपकते ही
हैं सभी ताश के आसमां, सिर्फ़
रहते हैं सदा रौशन दिलों
में मुहोब्बत के
फ़ानूस,
अवाक थे तुम और मैं भी निःशब्द, सिर्फ़
चल रहे थे अंतरिक्ष में
सितारों के
जुलूस !
* *
- - शांतनु सान्याल  

27 अप्रैल, 2022

शब्द रचना - -

वर्ग पहेली की तरह है ये रात, लफ़्ज़ों
के जाल हैं खुली निगाहों के ख़्वाब,
पलकों के चिलमन में हैं छुपे
हुए, अनबूझ सवालों के
जवाब, कोई ख़ुश्बू
है जो अंदर
तक छू
जाती है रूह की गहराई, इक अंतरंग
छुअन है कोई, या प्रणयी चंद्र -
सुधा, सुलगते पलों में है
ये किस की संदली
परछाई, कुछ
ही पलों
का
है ये खेल पुरअसरार, फिर वही थके
पांव उतरती है चांदनी, बिखरे
पड़े रहते हैं आख़री पहर
बेतरतीब से सभी
साहिल पर
सीप के
खोल,
कुछ शब्द अनमोल, शून्य संदूक में
खोजते हैं हम बेवजह ही गुमशुदा
असबाब, वर्ग पहेली की तरह
है ये रात, लफ़्ज़ों के
जाल हैं खुली
निगाहों के
ख़्वाब।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 

25 अप्रैल, 2022

मिलने की बेक़रारी - -

उतरती है चाँदनी धीरे - धीरे, मुंडेरों से
हो कर, झूलते अहातों तक, फिर भी
मिलती नहीं, रूह ए मकां  को
तस्कीं, इक रेशमी अंधेरा
सा घिरा रहता है दिल
की गहराइयों तक,
हम खोजते हैं
ख़ुद को
अपने ही बिम्ब के उस पार, जबकि ये
वजूद रहता है मौजूद, यहीं पे कहीं,
फिर भी मिलती नहीं, रूह ए
मकां को तस्कीं। हर सिम्त
हैं बिखरे हुए अनगिनत
चेहरे, उम्र गुज़र
जाती है बस
असल
चेहरे की तलाश में, इक लकीर की तरह
खींची हुई है नियति की डोर, दो
स्तंभों के बीच, गुज़रती है
जिस पर ये ज़िन्दगी
लिए सीने में
जीने की
आस,
हज़ार बार टूटे, हज़ार बार जुड़ के उभरे,
बिखरते नहीं फिर भी मुहोब्बत के
एहसास, हर सुबह हम तुमसे
मिलेंगे वहीं ,जहाँ मिलते
हैं रोज़ ये आसमान
और बेक़रार सी
ज़मीं, फिर
भी
मिलती नहीं, रूह ए मकां को तस्कीं । - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

22 अप्रैल, 2022

लापता सूत्र - -

दिन के उजाले में नहीं डूबते अंधेरों के
चिराग़, परछाइयों के हैं सब खेल
जो दिखता है खुली निगाह से
वो नहीं मुक्कमल जहां,
पृथ्वी के उस पार
भी है जीवन
का एक
भाग,
दिन के उजाले में नहीं डूबते अंधेरों के
चिराग़ । राज पथ के दोनों तरफ हैं
दो अलग दुनिया, जोड़ता है
जिन्हें अदृश्य मुहोब्बतों
का पुल, फिर भी
दूरियों को
पाटना
नहीं
आसां, ढूंढती हैं दूर तक किसे तेरी ये -
प्यासी निगाहें, जो खो गए धुंधले
क्षितिज के पार, नहीं मिलता
उम्र भर उनका निशां,
जो छुपा रहा मेरे
अंतरतम में
उस का
कोई न दे पाया सठिक सुराग़, दिन के
उजाले में नहीं डूबते अंधेरों
के चिराग़ ।
* *
- - शांतनु सान्याल

14 अप्रैल, 2022

यथावत हैं सभी रास्ते - -

सभी आवरण देता है उतार, निःशब्द ये
गाढ़ अंधकार, चंद्र विहीन आकाश
में है बदस्तूर सितारों का
उत्थान - पतन, शूल
सेज पर होता है
तब अक्सर
एकाकी
ये जीवन, झुरमुटों से झांकते हैं कुछ -
आत्मीय स्वजन, उजालों तक हैं
सभी सिमित ये अंतरंग
चेहरे, अंधेरे में किसी
को नहीं किसी
से कोई भी
सरोकार,
सभी आवरण देता है उतार, निःशब्द ये
गाढ़ अंधकार। मायाविनी इस रात
की गहराई में ढूंढता हूँ मैं अपनी
ही गुमशुदा छाया, अंतिम
प्रहर में मिलने की
प्रतिश्रुति थी
बहुत ही
झूठी,
क्षितिज पर ठहरा रहा देर तक, लेकिन
मुझसे मिलने वहां कोई नहीं आया,
वही दूर तक फैली हुई है धुंध
की चादर, वही रास्ते
पेंचदार, सभी
आवरण
देता है
उतार, निःशब्द ये गाढ़ अंधकार - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

 

09 अप्रैल, 2022

टूटे हुए मेहराब - -

दूर बहुत दूर तक फैले हुए हैं यादों के
खण्डहर, न जाने क्या चाहते हैं
मुझसे, वो टूटे हुए मेहराबों
से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे, प्राचीन
मठ का
कोई
एकाकी सन्यासी है गोधूलि आकाश,
चाहता है शायद तोड़ना धरती
से अपना मोहपाश, सूखे
पत्ते की है अपनी ही
अलग कहानी,
कोई किसी
के लिए
आख़िर क्यूँ कर ठहरे, वो टूटे हुए -
मेहराबों से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे। वो सभी चेहरों में
ढूंढता हूँ मैं, सुबह
की मुलायम
धूप, एक
अनुबंध
जो
कदाचित बंधा था उन्मुक्त ख़ुशी के
लिए, सुबह से पहले कोई द्वार
पर लगा गया शून्यता का
कुलूप, कहाँ जाएं, किस
से मिलें, दो बात
करें हिय की,
ये शहर
है बड़ा
मायावी, यूँ तो शोरगुल है हर तरफ -
लेकिन एहसास हैं सभी गूंगे
और बहरे, वो टूटे हुए
मेहराबों से झांकते,
अर्ध स्मित
चेहरे।
* *
- - शांतनु सान्याल

07 अप्रैल, 2022

ख़ुद से ख़ुद तक - -

दूसरी मंज़िल से उतर कर पार्क तक - -
सिमटती है ज़िन्दगी, यहाँ सूर्य
तपता है पूरी शिद्दत से,
पल्लव विहीन
मौलश्री के
नीचे
जा कहीं रुकता है कुछ पलों का पर्यटन,
थके हुए चेहरों में अपना अक्स
ढूंढता है ये जीवन । तुम्हारे
देश में शायद, बहती
हों सर्द हवाएं,
यहाँ फ़ुर्सत
ही नहीं
मिलती कि निकलें अग्नि वलय से - -
बाहर, थोड़ी दूर जा टहल आएं,
फिर भी नहीं थमता है
चाहतों का अंतहीन
भ्रमण, थके हुए
चेहरों में
अपना
अक्स ढूंढता है ये जीवन । मन ही मन
बहुत दूर जा कर लौट आया हूँ,
वही नदी के दो किनारे,
इस तट कोलाहल
और उस पार
है विस्तृत
ख़ामोशी,
सोचता हूँ जो कुछ है हासिल इस पल
वही सत्य है, बाक़ी अर्थहीन हैं
सभी दुःख और ख़ुशी,
अशेष रहता है
चिरकाल
स्व -
तर्पण, नियति के हाथ होते हैं हमेशा
ही महा कृपण, थके हुए चेहरों में
अपना अक्स ढूंढता है
ये जीवन ।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
  

06 अप्रैल, 2022

पूर्व लिखित तहरीर - -

बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना, जो हथेली पर रुका
कुछ पल के लिए वो एहसास
ए बूंद है मुहोब्बत, जो
छलक गया मेरी
पलकों से हो
कर, वो
था
सुबह का कोई नाज़ुक सा सपना, बेदाग़
यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना। दिगंत पर आ
कर मैं ढूंढता हूँ शब ए
गुज़िश्ता का निशां,
कौन, किस
सिम्त
जा
मुड़ा कहना है बहुत मुश्किल, सुबह है
वही ताज़गी भरी, वही उन्मुक्त
आसमां, दरअसल पूर्व -
लिखित होते हैं
मिलना
और
बिछुड़ना, बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म
ए अंदाज़ है अपना अपना।
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

01 अप्रैल, 2022

मोतियों का हार - -

न खींच कोई अदृश्य रेखा जीवन वृत्त
के आस पास, मुस्कुराने की कोई
समय - सीमा नहीं होती, कैसे
समझाएं तुम्हें कि ये
हासिल पल है
बेहद
क़ीमती हार, ज़रा सी ग़फ़लत में बिखर
जाएंगे, आईना रह जाएगा स्तब्ध,
निःशब्द होगी सिंगारदानी,
हम खोजते रह जाएंगे
गुमशुदा मोतियों
के ठिकाने,
किसे
मालूम इस धुंध की घाटी में हम सभी  -
किधर जाएंगे, ये हासिल पल है
बेहद क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत में
बिखर
जाएंगे। वर्षावन की ये जिजीविषा नहीं
थमती चाहे कितने ही ऊपर हो
एक बूंद सूर्य किरण, हर
हाल में ज़िन्दगी को
करनी है अंतहीन
यात्रा, पर्ण -
अंचल
की है अपनी अलग ही नियति, क्या -
फ़र्क़ पड़ता है मुझे मिला हो
केवल भीगा स्पर्श, और
तुम्हें असीम मात्रा,
तिलिस्म
छुअन
की
है अपनी अलग तासीर, देखना एक
दिन हम भी निखर जाएंगे,
ये हासिल पल है बेहद
क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत
में बिखर
जाएंगे।
* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 
 
  

28 मार्च, 2022

अनंत साध - -

ज़िन्दगी अक्सर देती है दस्तक
कुछ लम्हों की सौगात लिए,
दहलीज़ पर हो तुम, या
चल रहा हूँ मैं नींद
में इक ख़्वाब
की दुनिया
अपने
साथ लिए, उठ रही है सुदूर नील
पर्वतों से अरण्य पुष्पों की
महक, इक अदृश्य
सांसों का पुल,
प्रसारित
है मुझ
से हो कर तुम तक, ठहरे हुए हैं -
मेघ दल सीने में दबी हुई
बरसात लिए, ज़िन्दगी
अक्सर देती है
दस्तक
कुछ
लम्हों की सौगात लिए । सुबह है
इक बंद लिफ़ाफ़ा पुरअसरार
तहरीरों का, इस रात की
है अपनी अलग ही
कहानी, कोई
गुमशुदा
शहर हो जैसे उजड़े हुए मंदिरों का,
फिर भी ज़िन्दगी को है यक़ीं,
क्षितिज पार है इक नयी
आस की दुनिया कहीं
न कहीं, चल रहा
हूँ मैं अधबुझे
अंगारों
पर उसे पाने की अनंत साध लिए,
ज़िन्दगी अक्सर देती है दस्तक
कुछ लम्हों की सौगात
लिए ।
* *
- - शांतनु सान्याल
 


27 मार्च, 2022

छत विहीन प्रासाद - -

स्मृतियों से पलायन कहाँ आसान,
समय का तेज़ घूमता हिंडोला,
और कोई शून्य से बार
बार फेंके है सुरभित
रुमाल, छूने
की चाह
में अक्सर ख़ुद को न पाएं संभाल,
हथेलियों में बंद जुगनू की
तरह कोई लगे रूह
तक शामिल,
मुट्ठी के
खुलते ही लगे धूसर सा अंतहीन -
नीला आसमान, स्मृतियों
से पलायन कहाँ
आसान।
खिलने के साथ ही है तयशुदा फूल
का मुरझाना, स्वर्ण जड़ित
फ्रेम में चाहे क्यूँ न
हो बहुमूल्य
दर्पण,
नहीं रूकती है चेहरे पर सुबह की -
नरम धूप, उसे तो हर हाल
में है ढल जाना,  छत
विहीन स्तंभ रह
जाते हैं अपनी
जगह ओढ़े
हुए दूर
तक वीरानगी के चादर, धुंध में
खो जाते हैं सभी आनबान,
स्मृतियों से पलायन
कहाँ आसान।
* *
- - शांतनु सान्याल

25 मार्च, 2022

असलाह ज़रूरी है - -

अंतर पृष्ठ का रहस्योद्धार है बहोत
मुश्किल, जिल्द देख कर नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई,
हर कोई अपने
अंदर लिए
होता
है
मुख़्तलिफ़ शख़्सियत, मुखौटे ओढ़
कर आसान है देना तक़रीर ए
नसीयत, कहने को एक
सी होती हैं सभी
परछाई, जिल्द
देख कर
नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई। एक ही हैं  
सभी देह, एक ही सांचे में ढले
हुए, कुछ तपे हुए, कुछ
अध पके माटी के
रेत से मिले
हुए, कोई
नहीं
यहाँ शत प्रतिशत ख़ालिस, आज
नहीं तो कल हर एक को देनी
है भरपाई, जिल्द देख
कर नहीं होता
अंदाज़ ए
गहराई।
* *
- - शांतनु सान्याल

23 मार्च, 2022

कच्चे घड़े का पानी - -

सिमटती नदी के दोनों पार है अनंत
पलाश वन, रेत के आंचल पर
कोई उकेर गया जीवन -
दर्पण, ढूंढते हैं न
जाने किसे
अंतर
के मृग नयन, सिमटती नदी के दोनों
पार है अनंत पलाश वन। कहां
रुकता है कच्चे घड़े का
पानी, वही तुम हो
वही हम हैं
और
ज़िन्दगी है वही, इक बूंद की कहानी,
समेटता हूँ मैं, नाहक ही हथेलियों
पर, गिरते हुए उच्च जल प्रपात
का चंचल पानी, मोह
उतना ही है बेहतर
जिसे भूलने
में हो
ज़रा आसानी, कहां रुकता है कच्चे
घड़े का पानी।
* *
- - शांतनु सान्याल

28 फ़रवरी, 2022

अमन - ताबीज़ - -

जन अरण्य नहीं थमता, उत्सव, समारोह,
युद्ध - त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत, कोई नहीं
सुनता सीमान्त का मौन
क्रंदन, विशालकाय
मीन की तरह
निगल
जाते हैं महादेश, किनारे पर पड़े रहते हैं -
छिन्न भिन्न अर्ध जले हुए मानव
उपनिवेश, कुछ अस्थि पिंजर
कुछ धुंधले स्मृतियों के
अवशेष, बुझ जाते
हैं अपने आप
तथाकथित
मानव
सभ्यता के ज्योत, उत्सव, समारोह,युद्ध
- त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत। कलिंग
हो या सीरिया, ईराक से
ले कर यूक्रेन, वही
जल - साम्राज्य
का विधान,
सिर्फ़
मेरा ही हो हर तरफ वर्चस्व ज़मीं से ले
कर आसमान, हर युग में बदल
जाते हैं इंसानियत के
तजवीज़, कभी
देते हैं धर्म
की दुहाई
और
कभी बांध लेते हैं लोग अपनी बांहों में
नक़ली अमन ताबीज़, हालांकि
सीना रहता है भेदभाव से
ओतप्रोत, उत्सव,
समारोह, युद्ध
- त्रासदी
के मध्य हो कर, बहता जाता है जीवन
स्रोत।
* *
- - शांतनु सान्याल  

    

 

21 फ़रवरी, 2022

किनारे - किनारे - -

बहोत ख़ामोश थे सभी जाने पहचाने
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे, कभी
कहीं वो मिले तो पूछ
लेना ज़िन्दगी
का निचोड़
क्या
था, हर एक क़दम पर सुख दुःख के
नित नए समीकरण देखे, कभी
क्षितिज के ऊपर थे ख़्वाब,
और कभी शून्य में
थे डूबते हुए
सितारे,
बहोत ख़ामोश थे सभी जाने पहचाने
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे । कौन, किस
मोड़ पर मिला और
न जाने किस
अनजान
कूचे
पर खो गया, चाँदनी में थी निखरी -
हुई गुल मोहर की परछाइयां,
कोई किसी का हम सफ़र
नहीं होता फिर भी
दिल फ़रेब हैं
ज़िन्दगी
की
अथाह गहराइयां, कुछ अधूरी सी है
अपनी कहानी, कुछ असमाप्त
से हैं चाहत तुम्हारे, बहोत
ख़ामोश थे सभी जाने
पहचाने चेहरे, न
जाने कहाँ
गुम
हो गए रंगीन अक्स सारे, फिर भी
चल रहे हैं हम जीवन नदी के
किनारे - किनारे - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 








10 फ़रवरी, 2022

आरसी का नगर - -

वही लकीर के फ़क़ीर सभी, देह से पृथक है
छाया, साथ साथ गुज़रने का अर्थ नहीं
कि एक ही गंत्वय हो हमारा, सभी
अनुबंध टूट जाते हैं चाहे बांधे
जितना भी नेह डोर, कोई
नहीं किसी का हम -
साया, वही
लकीर
के फ़क़ीर सभी, देह से पृथक है छाया । कोई
नहीं होता ख़ुद के सिवा, जब रूबरू हो
आरसी का शहर, खोजते हैं हम
अपना ठिकाना, बंद हैं सभी
दरवाज़े, रात का है ये
अंतिम प्रहर, यूँ तो
निकले थे हम
कारवां के
संग,
मुड़ कर देखा कई बार, हमारे साथ कोई भी
न आया, वही लकीर के फ़क़ीर सभी,
देह से पृथक है छाया ।
* *
- - शांतनु सान्याल
 






 

05 फ़रवरी, 2022

मिलते जुलते चेहरे - -

पल्लव विहीन हैं पलाश वन फिर
भी, कुछ सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते, ऋतु चक्र की
है अपनी मजबूरी,
उड़ते हैं डायरी
के बेक़रार
पन्ने,
कुछ अंतरतम की गहराई में हैं -
छुपे हुए अनदेखे सपने, देह
का पलस्तर ढह जाए
तो क्या, अंदरूनी
रंग नहीं
झरते,
पल्लव विहीन हैं पलाश वन फिर
भी, कुछ सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते। कोई लैटिनो
ख़्वाब है ज़िन्दगी,
गुज़रती है जो
आधी -
रात
को अमेरिकी मरू सीमांत के - -
समानांतर, एक तरफ
है सघन अंधेरा दूसरी
ओर झिलमिलाता
सा कृत्रिम
सवेरा,
कुछ पल तुम्हारे हैं ज़्यादा, कुछ
क्षण हैं हमारे न के बराबर,
फिर भी किसी एक
बिंदु पर हर
चेहरे हैं
मिलते जुलते, पल्लव विहीन हैं
पलाश वन फिर भी, कुछ
सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

27 जनवरी, 2022

सुबह मुबारक - -

जन - अरण्य की थी अपनी अलग ख़ूबसूरती,
हज़ार बार ख़ुद को गुमशुदा पाया, हज़ार
बार ज़िन्दगी से मुलाक़ात हुई, कहाँ
मिलते हैं मनचाहे रास्ते, कहाँ
कोई खड़ा होता है मुंतज़िर
किसी के वास्ते, बड़े
विस्मय से वो
देखता रहा
मुझ को
एक टक, किसी अजनबी की तरह, यूँ तो हर
एक मोड़ पर रुक कर, बारहा उनसे बात
हुई, हज़ार बार ख़ुद को गुमशुदा
पाया, हज़ार बार ज़िन्दगी
से मुलाक़ात हुई। सभी
दर्प उतर जाते हैं
धीरे - धीरे,
दर्पण रह
जाता
है बिम्ब विहीन, दोनों पार्श्व हैं पारदर्शी, फिर
भी वजूद का ठिकाना कहीं नहीं, वो सभी
हैं कल्प - कहानियों में छुपे हुए चेहरे,
जो दिखाते हैं मिथ्या मरुद्यान,
हमारे पांव तले है केवल
पथरीली ज़मीन,
रात तो गुज़र
गई यूँ ही
बियाबां
के राह चलते, सुबह को हो मुबारक अंतिम -
पहर जो बरसात हुई, हज़ार बार ख़ुद को
गुमशुदा पाया, हज़ार बार ज़िन्दगी
से मुलाक़ात हुई - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

 

09 जनवरी, 2022

रतजगा - -

उगते सूरज का था सभी को इंतज़ार,
जो पीछे छूट गए, वो सभी कोहरे
में कहीं खो गए, उनका पता
शायद, दे पाए खोह के
अंधकार, कुछ मृत
स्मृतियों के
जीवाश्म
उभरे
पड़े
थे पिछले पहर, दूर तक जाती है इक
सुनसान सी सड़क, कोई नहीं
जानता, कहाँ, किस मोड़
पर जा कर रुकेगा ये
बोझिल सांसों का
सफ़र, उम्र
भर था
वो
परेशां, देख कर फ़िरौन का कारोबार,  
उगते सूरज का था सभी को
इंतज़ार। न जाने किस
दर पर उस ने दी
थी दुआओं
वाली
दस्तक, हर किसी ने कंपन महसूस
किया था ज़रूर, जिसने दरवाज़ा
खोल कर उसे इक नज़र
देखा, वो तर गया
ज़िन्दगी और
मौत के
दोनों
जहान से, न था वो कोई फ़रिश्ता न
ही देवता किसी उजड़े मंदिर का,
वो समदर्शी अक्स था मेरा
जो उतरा था, आईने
के आसमान से,
जो मध्य
रात
बुलाता रहा मुझे बारम्बार, उगते - -
सूरज का था सभी को
इंतज़ार।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

28 दिसंबर, 2021

मंज़िल दर मंज़िल - -

सर ज़मीं ए ख़्वाब दिखा कर,
लोग न जाने कहाँ गए,
मुसलसल बियाबां
के सिवा कुछ
न था हम
जहाँ  
गए, उनका अपना है जो
चश्म ए अंदाज़, कैसे
कोई बदले, संग
ए बुत हो,
या
ख़ुदा का घर, हम सिर्फ़
तनहा गए, कहते हैं
यहाँ कभी था
इक लहराता
हुआ झील
दूर तक,

दरख़्त, न कोई साया, न
जाने किधर वो कारवां
गए, आईना कहता
है मुझसे ऐनक
को ज़रा
बेहतर
पोंछ
लूँ,
कोहरा है घना, राह बता कर
जाने कहाँ वो रहनुमा
गए - -
* *
- - शांतनु सान्याल

  

20 दिसंबर, 2021

अंतहीन यात्रा - -

हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में, सूखे हुए तलछट
पर रह जाते हैं
निःशब्द से
कुछ
क़दमों के निशां, दौड़ते हुए से लगते
हैं पेड़ पौधे, खेत खलियान, नदी
पहाड़, फूलों से लदी वादियां,
कुहासे में डूबी हुई अंध
घाटियां, ज़िन्दगी
अपने अंदर
तब होती
है एक
वेगवान सी परिश्रांत नदी, वो रुकना
चाहती है किसी मोड़ पर एक रात
के लिए, लेकिन ज़रूरी नहीं
मिल जाए कोई सराय
सघन अरण्य
राहों में,
हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में। मध्य रात के थे वो
सभी मेघ दल, छू
कर गए हैं
शायद  
मेरी
ओंठों के सतह, एक नमी सी है दिल
की गहराइयों तक, फिर सुबह
की है तलाश सर्द चाँदनी
रात के बाद, कुछ
पल सुकून तो
मिले नर्म
धूप
के पनाहों में, हमेशा संधि - स्थल
नहीं होता अंतिम बिंदु, कुछ
दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न
दिशाओं
में।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

18 दिसंबर, 2021

क्षितिज पार के पथिक - -

बूंद बूंद ओस रुकी है कहीं, दिगंत के
नयन कोर, अंगुष्ठ और तर्जनी
के मध्य है कहीं मुहाने की
ज़मीं, देखती है जिसे
मेरी ज़िन्दगी
हो कर
आत्म विभोर, यहां अष्ट प्रहर चलता
रहता है क्रय विक्रय, कदाचित हो
निस्तब्धता तुम्हारी ओर, बूंद
बूंद ओस रुकी है कहीं,
दिगंत के नयन
कोर। सभी
स्रोत हैं
रुके रुके से तुम्हारी भव्यता के आगे,
सभी नदियों का अंत है निश्चित,
सांझ घिरते ही लौट आएंगे
सभी विहग वृन्द, अपने
अपने घर, तुम हो
वहीं अपनी
जगह
स्थिर, समय चक्र अपनी लय पर है
भागे, बिखरे पड़े हैं दूर दूर तक
अतीत के सभी छिन्न -
भिन्न पृष्ठ, क्लांत
रात्रि खड़ी है
अपने
दहलीज़ पर एकाकी, सुदूर धुंध में -
है कहीं कांपता हुआ निरीह
भोर, बूंद बूंद ओस
रुकी है कहीं,
दिगंत के
नयन
कोर।
* *
- - शांतनु सान्याल

15 दिसंबर, 2021

अशेष रात्रि - -

 

मन की अगम गहराई जाने न कोई,
सतह को छू कर बस मुस्कुरा
जाते हैं लोग, जल चक्र
में थे सभी अटके
हुए, मौसम
का यूँ
सहसा रुख़ बदलना पहचाने न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न
कोई। कौन डूबे कहां, किस
अंध घाटी के अंदर,
कहना नहीं
आसान,
इसी
पल में है समाहित सारा ब्रह्माण्ड - -
और पलक झपकते ही उस
पार बिखरा हुआ सारा
आसमान, सांस
के साथ ही
उठते
गिरते हैं चाहतों के रंगीन यवनिका,
नेपथ्य के हाथों में है अदृश्य
डोर, परम सत्य को
जान कर भी
उसे माने
न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न कोई।
कोहरे के सीढ़ियों से उतरता है
धीरे धीरे आख़री पहर का
चाँद, तुम हो दिल के
क़रीब या रस्म
अदायगी
है ये
ज़िन्दगी, उड़ते हुए मेघ कणों को है
छूने की आस या मरू थल के
सीने में है भटकती हुई
कोई सदियों की
प्यास, किसी
चकमक
पत्थर
से
अपने आप उठती हैं चिंगारियां या
कुछ सुख के पल आज भी हैं
मेरे आसपास, अजीब सी
है ये नज़दीकियां,
दिल के क़रीब
हो कर भी
सभी,
दरअसल अपना माने न कोई, मन
की अगम गहराई
 जाने न
कोई।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

08 दिसंबर, 2021

कुछ याद रहा कुछ भूल गए - -

कोई चिड़िया थी, या कोई बल
खाती हुई कटी पतंग, बहुत
दूर किसी टीले से उसने
 समंदर को देखा
होगा,  न
चाह
कर भी ज़िन्दगी यहां बहुत - -
कुछ करा जाती है, दिल
को कोई देखता
नहीं, डूबती
नज़र
को
देखा होगा, उनकी चाहतों
का दरिया मुहाने तक
पहुँचता ही नहीं,
किसी
अनजान पहाड़ी से शाम के
मंज़र को देखा होगा,
परछाइयों के
शहर में
तुम
ढूंढते हो गुमसुदा जिस्म को,
बियाबां रात के सीने पर,
ओस के असर को
देखा होगा,
साहिल
पर
हैं बिखरे हुए अनगिनत
सीपों की कहानियां,
गहरी नींद में
उसने
किसी ख़्वाब ए रहगुज़र को
देखा होगा।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

02 दिसंबर, 2021

टूटे हुआ तारों का पता - -

बहुत दीर्घ, नहीं होते जीवन के रास्ते, फिर भी
कोई नहीं करता प्रतीक्षा, बेवजह किसी
के वास्ते, सुदूर उस मोड़ से कहीं
मुड़ गए सभी यादों के साए,
मील का पत्थर रहा
अपनी जगह
यथावत,
उसे
क्या लेना देना, कोई आए या जाए, न जाने क्या
क्या न  लिखता रहा वो उम्र भर, फिर भी
अहसास की डायरी रही अधूरी, उस
एक धुंध भरे पड़ाव में आकर
उसने छोड़ दी आगे की
डगर, ख़त्म कहां
होती है मगर
अंतर्यात्रा,
जिधर
भी देखा घूमते प्रतिबिंबों की सिवा कुछ भी न - -
था, ताउम्र करता रहा अनगिनत हिसाब
किताब, अंत्यमिल में लेकिन प्रश्न
चिन्हों के सिवा कुछ भी न था,
मुश्किल था लौट के
आना हालांकि
अतीत की
आवाज़
आती
रही रुक रुक कर दूर तक, जब टूटा गुमनाम - -
कोई यायावर तारा, एक मौन अट्टहास
बिखरा हुआ था, अंतरिक्ष में दूर
दूर तक - -
* *
- - शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past