उतरती है चाँदनी धीरे - धीरे, मुंडेरों से
हो कर, झूलते अहातों तक, फिर भी
मिलती नहीं, रूह ए मकां को
तस्कीं, इक रेशमी अंधेरा
सा घिरा रहता है दिल
की गहराइयों तक,
हम खोजते हैं
ख़ुद को
अपने ही बिम्ब के उस पार, जबकि ये
वजूद रहता है मौजूद, यहीं पे कहीं,
फिर भी मिलती नहीं, रूह ए
मकां को तस्कीं। हर सिम्त
हैं बिखरे हुए अनगिनत
चेहरे, उम्र गुज़र
जाती है बस
असल
चेहरे की तलाश में, इक लकीर की तरह
खींची हुई है नियति की डोर, दो
स्तंभों के बीच, गुज़रती है
जिस पर ये ज़िन्दगी
लिए सीने में
जीने की
आस,
हज़ार बार टूटे, हज़ार बार जुड़ के उभरे,
बिखरते नहीं फिर भी मुहोब्बत के
एहसास, हर सुबह हम तुमसे
मिलेंगे वहीं ,जहाँ मिलते
हैं रोज़ ये आसमान
और बेक़रार सी
ज़मीं, फिर
भी
मिलती नहीं, रूह ए मकां को तस्कीं । - -
* *
- - शांतनु सान्याल
25 अप्रैल, 2022
22 अप्रैल, 2022
लापता सूत्र - -
दिन के उजाले में नहीं डूबते अंधेरों के
चिराग़, परछाइयों के हैं सब खेल
जो दिखता है खुली निगाह से
वो नहीं मुक्कमल जहां,
पृथ्वी के उस पार
भी है जीवन
का एक
भाग,
दिन के उजाले में नहीं डूबते अंधेरों के
चिराग़ । राज पथ के दोनों तरफ हैं
दो अलग दुनिया, जोड़ता है
जिन्हें अदृश्य मुहोब्बतों
का पुल, फिर भी
दूरियों को
पाटना
नहीं
आसां, ढूंढती हैं दूर तक किसे तेरी ये -
प्यासी निगाहें, जो खो गए धुंधले
क्षितिज के पार, नहीं मिलता
उम्र भर उनका निशां,
जो छुपा रहा मेरे
अंतरतम में
उस का
कोई न दे पाया सठिक सुराग़, दिन के
उजाले में नहीं डूबते अंधेरों
के चिराग़ ।
* *
- - शांतनु सान्याल
चिराग़, परछाइयों के हैं सब खेल
जो दिखता है खुली निगाह से
वो नहीं मुक्कमल जहां,
पृथ्वी के उस पार
भी है जीवन
का एक
भाग,
दिन के उजाले में नहीं डूबते अंधेरों के
चिराग़ । राज पथ के दोनों तरफ हैं
दो अलग दुनिया, जोड़ता है
जिन्हें अदृश्य मुहोब्बतों
का पुल, फिर भी
दूरियों को
पाटना
नहीं
आसां, ढूंढती हैं दूर तक किसे तेरी ये -
प्यासी निगाहें, जो खो गए धुंधले
क्षितिज के पार, नहीं मिलता
उम्र भर उनका निशां,
जो छुपा रहा मेरे
अंतरतम में
उस का
कोई न दे पाया सठिक सुराग़, दिन के
उजाले में नहीं डूबते अंधेरों
के चिराग़ ।
* *
- - शांतनु सान्याल
14 अप्रैल, 2022
यथावत हैं सभी रास्ते - -
सभी आवरण देता है उतार, निःशब्द ये
गाढ़ अंधकार, चंद्र विहीन आकाश
में है बदस्तूर सितारों का
उत्थान - पतन, शूल
सेज पर होता है
तब अक्सर
एकाकी
ये जीवन, झुरमुटों से झांकते हैं कुछ -
आत्मीय स्वजन, उजालों तक हैं
सभी सिमित ये अंतरंग
चेहरे, अंधेरे में किसी
को नहीं किसी
से कोई भी
सरोकार,
सभी आवरण देता है उतार, निःशब्द ये
गाढ़ अंधकार। मायाविनी इस रात
की गहराई में ढूंढता हूँ मैं अपनी
ही गुमशुदा छाया, अंतिम
प्रहर में मिलने की
प्रतिश्रुति थी
बहुत ही
झूठी,
क्षितिज पर ठहरा रहा देर तक, लेकिन
मुझसे मिलने वहां कोई नहीं आया,
वही दूर तक फैली हुई है धुंध
की चादर, वही रास्ते
पेंचदार, सभी
आवरण
देता है
उतार, निःशब्द ये गाढ़ अंधकार - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
गाढ़ अंधकार, चंद्र विहीन आकाश
में है बदस्तूर सितारों का
उत्थान - पतन, शूल
सेज पर होता है
तब अक्सर
एकाकी
ये जीवन, झुरमुटों से झांकते हैं कुछ -
आत्मीय स्वजन, उजालों तक हैं
सभी सिमित ये अंतरंग
चेहरे, अंधेरे में किसी
को नहीं किसी
से कोई भी
सरोकार,
सभी आवरण देता है उतार, निःशब्द ये
गाढ़ अंधकार। मायाविनी इस रात
की गहराई में ढूंढता हूँ मैं अपनी
ही गुमशुदा छाया, अंतिम
प्रहर में मिलने की
प्रतिश्रुति थी
बहुत ही
झूठी,
क्षितिज पर ठहरा रहा देर तक, लेकिन
मुझसे मिलने वहां कोई नहीं आया,
वही दूर तक फैली हुई है धुंध
की चादर, वही रास्ते
पेंचदार, सभी
आवरण
देता है
उतार, निःशब्द ये गाढ़ अंधकार - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
09 अप्रैल, 2022
टूटे हुए मेहराब - -
दूर बहुत दूर तक फैले हुए हैं यादों के
खण्डहर, न जाने क्या चाहते हैं
मुझसे, वो टूटे हुए मेहराबों
से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे, प्राचीन
मठ का
कोई
एकाकी सन्यासी है गोधूलि आकाश,
चाहता है शायद तोड़ना धरती
से अपना मोहपाश, सूखे
पत्ते की है अपनी ही
अलग कहानी,
कोई किसी
के लिए
आख़िर क्यूँ कर ठहरे, वो टूटे हुए -
मेहराबों से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे। वो सभी चेहरों में
ढूंढता हूँ मैं, सुबह
की मुलायम
धूप, एक
अनुबंध
जो
कदाचित बंधा था उन्मुक्त ख़ुशी के
लिए, सुबह से पहले कोई द्वार
पर लगा गया शून्यता का
कुलूप, कहाँ जाएं, किस
से मिलें, दो बात
करें हिय की,
ये शहर
है बड़ा
मायावी, यूँ तो शोरगुल है हर तरफ -
लेकिन एहसास हैं सभी गूंगे
और बहरे, वो टूटे हुए
मेहराबों से झांकते,
अर्ध स्मित
चेहरे।
* *
- - शांतनु सान्याल
खण्डहर, न जाने क्या चाहते हैं
मुझसे, वो टूटे हुए मेहराबों
से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे, प्राचीन
मठ का
कोई
एकाकी सन्यासी है गोधूलि आकाश,
चाहता है शायद तोड़ना धरती
से अपना मोहपाश, सूखे
पत्ते की है अपनी ही
अलग कहानी,
कोई किसी
के लिए
आख़िर क्यूँ कर ठहरे, वो टूटे हुए -
मेहराबों से झांकते, अर्ध स्मित
चेहरे। वो सभी चेहरों में
ढूंढता हूँ मैं, सुबह
की मुलायम
धूप, एक
अनुबंध
जो
कदाचित बंधा था उन्मुक्त ख़ुशी के
लिए, सुबह से पहले कोई द्वार
पर लगा गया शून्यता का
कुलूप, कहाँ जाएं, किस
से मिलें, दो बात
करें हिय की,
ये शहर
है बड़ा
मायावी, यूँ तो शोरगुल है हर तरफ -
लेकिन एहसास हैं सभी गूंगे
और बहरे, वो टूटे हुए
मेहराबों से झांकते,
अर्ध स्मित
चेहरे।
* *
- - शांतनु सान्याल
07 अप्रैल, 2022
ख़ुद से ख़ुद तक - -
दूसरी मंज़िल से उतर कर पार्क तक - -
सिमटती है ज़िन्दगी, यहाँ सूर्य
तपता है पूरी शिद्दत से,
पल्लव विहीन
मौलश्री के
नीचे
जा कहीं रुकता है कुछ पलों का पर्यटन,
थके हुए चेहरों में अपना अक्स
ढूंढता है ये जीवन । तुम्हारे
देश में शायद, बहती
हों सर्द हवाएं,
यहाँ फ़ुर्सत
ही नहीं
मिलती कि निकलें अग्नि वलय से - -
बाहर, थोड़ी दूर जा टहल आएं,
फिर भी नहीं थमता है
चाहतों का अंतहीन
भ्रमण, थके हुए
चेहरों में
अपना
अक्स ढूंढता है ये जीवन । मन ही मन
बहुत दूर जा कर लौट आया हूँ,
वही नदी के दो किनारे,
इस तट कोलाहल
और उस पार
है विस्तृत
ख़ामोशी,
सोचता हूँ जो कुछ है हासिल इस पल
वही सत्य है, बाक़ी अर्थहीन हैं
सभी दुःख और ख़ुशी,
अशेष रहता है
चिरकाल
स्व -
तर्पण, नियति के हाथ होते हैं हमेशा
ही महा कृपण, थके हुए चेहरों में
अपना अक्स ढूंढता है
ये जीवन ।
* *
- - शांतनु सान्याल
सिमटती है ज़िन्दगी, यहाँ सूर्य
तपता है पूरी शिद्दत से,
पल्लव विहीन
मौलश्री के
नीचे
जा कहीं रुकता है कुछ पलों का पर्यटन,
थके हुए चेहरों में अपना अक्स
ढूंढता है ये जीवन । तुम्हारे
देश में शायद, बहती
हों सर्द हवाएं,
यहाँ फ़ुर्सत
ही नहीं
मिलती कि निकलें अग्नि वलय से - -
बाहर, थोड़ी दूर जा टहल आएं,
फिर भी नहीं थमता है
चाहतों का अंतहीन
भ्रमण, थके हुए
चेहरों में
अपना
अक्स ढूंढता है ये जीवन । मन ही मन
बहुत दूर जा कर लौट आया हूँ,
वही नदी के दो किनारे,
इस तट कोलाहल
और उस पार
है विस्तृत
ख़ामोशी,
सोचता हूँ जो कुछ है हासिल इस पल
वही सत्य है, बाक़ी अर्थहीन हैं
सभी दुःख और ख़ुशी,
अशेष रहता है
चिरकाल
स्व -
तर्पण, नियति के हाथ होते हैं हमेशा
ही महा कृपण, थके हुए चेहरों में
अपना अक्स ढूंढता है
ये जीवन ।
* *
- - शांतनु सान्याल
06 अप्रैल, 2022
पूर्व लिखित तहरीर - -
बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना, जो हथेली पर रुका
कुछ पल के लिए वो एहसास
ए बूंद है मुहोब्बत, जो
छलक गया मेरी
पलकों से हो
कर, वो
था
सुबह का कोई नाज़ुक सा सपना, बेदाग़
यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना। दिगंत पर आ
कर मैं ढूंढता हूँ शब ए
गुज़िश्ता का निशां,
कौन, किस
सिम्त
जा
मुड़ा कहना है बहुत मुश्किल, सुबह है
वही ताज़गी भरी, वही उन्मुक्त
आसमां, दरअसल पूर्व -
लिखित होते हैं
मिलना
और
बिछुड़ना, बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म
ए अंदाज़ है अपना अपना।
* *
- - शांतनु सान्याल
अपना अपना, जो हथेली पर रुका
कुछ पल के लिए वो एहसास
ए बूंद है मुहोब्बत, जो
छलक गया मेरी
पलकों से हो
कर, वो
था
सुबह का कोई नाज़ुक सा सपना, बेदाग़
यहाँ कोई नहीं, चश्म ए अंदाज़ है
अपना अपना। दिगंत पर आ
कर मैं ढूंढता हूँ शब ए
गुज़िश्ता का निशां,
कौन, किस
सिम्त
जा
मुड़ा कहना है बहुत मुश्किल, सुबह है
वही ताज़गी भरी, वही उन्मुक्त
आसमां, दरअसल पूर्व -
लिखित होते हैं
मिलना
और
बिछुड़ना, बेदाग़ यहाँ कोई नहीं, चश्म
ए अंदाज़ है अपना अपना।
* *
- - शांतनु सान्याल
01 अप्रैल, 2022
मोतियों का हार - -
न खींच कोई अदृश्य रेखा जीवन वृत्त
के आस पास, मुस्कुराने की कोई
समय - सीमा नहीं होती, कैसे
समझाएं तुम्हें कि ये
हासिल पल है
बेहद
क़ीमती हार, ज़रा सी ग़फ़लत में बिखर
जाएंगे, आईना रह जाएगा स्तब्ध,
निःशब्द होगी सिंगारदानी,
हम खोजते रह जाएंगे
गुमशुदा मोतियों
के ठिकाने,
किसे
मालूम इस धुंध की घाटी में हम सभी -
किधर जाएंगे, ये हासिल पल है
बेहद क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत में
बिखर
जाएंगे। वर्षावन की ये जिजीविषा नहीं
थमती चाहे कितने ही ऊपर हो
एक बूंद सूर्य किरण, हर
हाल में ज़िन्दगी को
करनी है अंतहीन
यात्रा, पर्ण -
अंचल
की है अपनी अलग ही नियति, क्या -
फ़र्क़ पड़ता है मुझे मिला हो
केवल भीगा स्पर्श, और
तुम्हें असीम मात्रा,
तिलिस्म
छुअन
की
है अपनी अलग तासीर, देखना एक
दिन हम भी निखर जाएंगे,
ये हासिल पल है बेहद
क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत
में बिखर
जाएंगे।
* *
- - शांतनु सान्याल
के आस पास, मुस्कुराने की कोई
समय - सीमा नहीं होती, कैसे
समझाएं तुम्हें कि ये
हासिल पल है
बेहद
क़ीमती हार, ज़रा सी ग़फ़लत में बिखर
जाएंगे, आईना रह जाएगा स्तब्ध,
निःशब्द होगी सिंगारदानी,
हम खोजते रह जाएंगे
गुमशुदा मोतियों
के ठिकाने,
किसे
मालूम इस धुंध की घाटी में हम सभी -
किधर जाएंगे, ये हासिल पल है
बेहद क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत में
बिखर
जाएंगे। वर्षावन की ये जिजीविषा नहीं
थमती चाहे कितने ही ऊपर हो
एक बूंद सूर्य किरण, हर
हाल में ज़िन्दगी को
करनी है अंतहीन
यात्रा, पर्ण -
अंचल
की है अपनी अलग ही नियति, क्या -
फ़र्क़ पड़ता है मुझे मिला हो
केवल भीगा स्पर्श, और
तुम्हें असीम मात्रा,
तिलिस्म
छुअन
की
है अपनी अलग तासीर, देखना एक
दिन हम भी निखर जाएंगे,
ये हासिल पल है बेहद
क़ीमती हार, ज़रा
सी ग़फ़लत
में बिखर
जाएंगे।
* *
- - शांतनु सान्याल
30 मार्च, 2022
28 मार्च, 2022
अनंत साध - -
ज़िन्दगी अक्सर देती है दस्तक
कुछ लम्हों की सौगात लिए,
दहलीज़ पर हो तुम, या
चल रहा हूँ मैं नींद
में इक ख़्वाब
की दुनिया
अपने
साथ लिए, उठ रही है सुदूर नील
पर्वतों से अरण्य पुष्पों की
महक, इक अदृश्य
सांसों का पुल,
प्रसारित
है मुझ
से हो कर तुम तक, ठहरे हुए हैं -
मेघ दल सीने में दबी हुई
बरसात लिए, ज़िन्दगी
अक्सर देती है
दस्तक
कुछ
लम्हों की सौगात लिए । सुबह है
इक बंद लिफ़ाफ़ा पुरअसरार
तहरीरों का, इस रात की
है अपनी अलग ही
कहानी, कोई
गुमशुदा
शहर हो जैसे उजड़े हुए मंदिरों का,
फिर भी ज़िन्दगी को है यक़ीं,
क्षितिज पार है इक नयी
आस की दुनिया कहीं
न कहीं, चल रहा
हूँ मैं अधबुझे
अंगारों
पर उसे पाने की अनंत साध लिए,
ज़िन्दगी अक्सर देती है दस्तक
कुछ लम्हों की सौगात
लिए ।
* *
- - शांतनु सान्याल
कुछ लम्हों की सौगात लिए,
दहलीज़ पर हो तुम, या
चल रहा हूँ मैं नींद
में इक ख़्वाब
की दुनिया
अपने
साथ लिए, उठ रही है सुदूर नील
पर्वतों से अरण्य पुष्पों की
महक, इक अदृश्य
सांसों का पुल,
प्रसारित
है मुझ
से हो कर तुम तक, ठहरे हुए हैं -
मेघ दल सीने में दबी हुई
बरसात लिए, ज़िन्दगी
अक्सर देती है
दस्तक
कुछ
लम्हों की सौगात लिए । सुबह है
इक बंद लिफ़ाफ़ा पुरअसरार
तहरीरों का, इस रात की
है अपनी अलग ही
कहानी, कोई
गुमशुदा
शहर हो जैसे उजड़े हुए मंदिरों का,
फिर भी ज़िन्दगी को है यक़ीं,
क्षितिज पार है इक नयी
आस की दुनिया कहीं
न कहीं, चल रहा
हूँ मैं अधबुझे
अंगारों
पर उसे पाने की अनंत साध लिए,
ज़िन्दगी अक्सर देती है दस्तक
कुछ लम्हों की सौगात
लिए ।
* *
- - शांतनु सान्याल
27 मार्च, 2022
छत विहीन प्रासाद - -
स्मृतियों से पलायन कहाँ आसान,
समय का तेज़ घूमता हिंडोला,
और कोई शून्य से बार
बार फेंके है सुरभित
रुमाल, छूने
की चाह
में अक्सर ख़ुद को न पाएं संभाल,
हथेलियों में बंद जुगनू की
तरह कोई लगे रूह
तक शामिल,
मुट्ठी के
खुलते ही लगे धूसर सा अंतहीन -
नीला आसमान, स्मृतियों
से पलायन कहाँ
आसान।
खिलने के साथ ही है तयशुदा फूल
का मुरझाना, स्वर्ण जड़ित
फ्रेम में चाहे क्यूँ न
हो बहुमूल्य
दर्पण,
नहीं रूकती है चेहरे पर सुबह की -
नरम धूप, उसे तो हर हाल
में है ढल जाना, छत
विहीन स्तंभ रह
जाते हैं अपनी
जगह ओढ़े
हुए दूर
तक वीरानगी के चादर, धुंध में
खो जाते हैं सभी आनबान,
स्मृतियों से पलायन
कहाँ आसान।
* *
- - शांतनु सान्याल
समय का तेज़ घूमता हिंडोला,
और कोई शून्य से बार
बार फेंके है सुरभित
रुमाल, छूने
की चाह
में अक्सर ख़ुद को न पाएं संभाल,
हथेलियों में बंद जुगनू की
तरह कोई लगे रूह
तक शामिल,
मुट्ठी के
खुलते ही लगे धूसर सा अंतहीन -
नीला आसमान, स्मृतियों
से पलायन कहाँ
आसान।
खिलने के साथ ही है तयशुदा फूल
का मुरझाना, स्वर्ण जड़ित
फ्रेम में चाहे क्यूँ न
हो बहुमूल्य
दर्पण,
नहीं रूकती है चेहरे पर सुबह की -
नरम धूप, उसे तो हर हाल
में है ढल जाना, छत
विहीन स्तंभ रह
जाते हैं अपनी
जगह ओढ़े
हुए दूर
तक वीरानगी के चादर, धुंध में
खो जाते हैं सभी आनबान,
स्मृतियों से पलायन
कहाँ आसान।
* *
- - शांतनु सान्याल
25 मार्च, 2022
असलाह ज़रूरी है - -
अंतर पृष्ठ का रहस्योद्धार है बहोत
मुश्किल, जिल्द देख कर नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई,
हर कोई अपने
अंदर लिए
होता
है
मुख़्तलिफ़ शख़्सियत, मुखौटे ओढ़
कर आसान है देना तक़रीर ए
नसीयत, कहने को एक
सी होती हैं सभी
परछाई, जिल्द
देख कर
नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई। एक ही हैं
सभी देह, एक ही सांचे में ढले
हुए, कुछ तपे हुए, कुछ
अध पके माटी के
रेत से मिले
हुए, कोई
नहीं
यहाँ शत प्रतिशत ख़ालिस, आज
नहीं तो कल हर एक को देनी
है भरपाई, जिल्द देख
कर नहीं होता
अंदाज़ ए
गहराई।
* *
- - शांतनु सान्याल
मुश्किल, जिल्द देख कर नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई,
हर कोई अपने
अंदर लिए
होता
है
मुख़्तलिफ़ शख़्सियत, मुखौटे ओढ़
कर आसान है देना तक़रीर ए
नसीयत, कहने को एक
सी होती हैं सभी
परछाई, जिल्द
देख कर
नहीं
होता अंदाज़ ए गहराई। एक ही हैं
सभी देह, एक ही सांचे में ढले
हुए, कुछ तपे हुए, कुछ
अध पके माटी के
रेत से मिले
हुए, कोई
नहीं
यहाँ शत प्रतिशत ख़ालिस, आज
नहीं तो कल हर एक को देनी
है भरपाई, जिल्द देख
कर नहीं होता
अंदाज़ ए
गहराई।
* *
- - शांतनु सान्याल
23 मार्च, 2022
कच्चे घड़े का पानी - -
सिमटती नदी के दोनों पार है अनंत
पलाश वन, रेत के आंचल पर
कोई उकेर गया जीवन -
दर्पण, ढूंढते हैं न
जाने किसे
अंतर
के मृग नयन, सिमटती नदी के दोनों
पार है अनंत पलाश वन। कहां
रुकता है कच्चे घड़े का
पानी, वही तुम हो
वही हम हैं
और
ज़िन्दगी है वही, इक बूंद की कहानी,
समेटता हूँ मैं, नाहक ही हथेलियों
पर, गिरते हुए उच्च जल प्रपात
का चंचल पानी, मोह
उतना ही है बेहतर
जिसे भूलने
में हो
ज़रा आसानी, कहां रुकता है कच्चे
घड़े का पानी।
* *
- - शांतनु सान्याल
पलाश वन, रेत के आंचल पर
कोई उकेर गया जीवन -
दर्पण, ढूंढते हैं न
जाने किसे
अंतर
के मृग नयन, सिमटती नदी के दोनों
पार है अनंत पलाश वन। कहां
रुकता है कच्चे घड़े का
पानी, वही तुम हो
वही हम हैं
और
ज़िन्दगी है वही, इक बूंद की कहानी,
समेटता हूँ मैं, नाहक ही हथेलियों
पर, गिरते हुए उच्च जल प्रपात
का चंचल पानी, मोह
उतना ही है बेहतर
जिसे भूलने
में हो
ज़रा आसानी, कहां रुकता है कच्चे
घड़े का पानी।
* *
- - शांतनु सान्याल
28 फ़रवरी, 2022
अमन - ताबीज़ - -
जन अरण्य नहीं थमता, उत्सव, समारोह,
युद्ध - त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत, कोई नहीं
सुनता सीमान्त का मौन
क्रंदन, विशालकाय
मीन की तरह
निगल
जाते हैं महादेश, किनारे पर पड़े रहते हैं -
छिन्न भिन्न अर्ध जले हुए मानव
उपनिवेश, कुछ अस्थि पिंजर
कुछ धुंधले स्मृतियों के
अवशेष, बुझ जाते
हैं अपने आप
तथाकथित
मानव
सभ्यता के ज्योत, उत्सव, समारोह,युद्ध
- त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत। कलिंग
हो या सीरिया, ईराक से
ले कर यूक्रेन, वही
जल - साम्राज्य
का विधान,
सिर्फ़
मेरा ही हो हर तरफ वर्चस्व ज़मीं से ले
कर आसमान, हर युग में बदल
जाते हैं इंसानियत के
तजवीज़, कभी
देते हैं धर्म
की दुहाई
और
कभी बांध लेते हैं लोग अपनी बांहों में
नक़ली अमन ताबीज़, हालांकि
सीना रहता है भेदभाव से
ओतप्रोत, उत्सव,
समारोह, युद्ध
- त्रासदी
के मध्य हो कर, बहता जाता है जीवन
स्रोत।
* *
- - शांतनु सान्याल
युद्ध - त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत, कोई नहीं
सुनता सीमान्त का मौन
क्रंदन, विशालकाय
मीन की तरह
निगल
जाते हैं महादेश, किनारे पर पड़े रहते हैं -
छिन्न भिन्न अर्ध जले हुए मानव
उपनिवेश, कुछ अस्थि पिंजर
कुछ धुंधले स्मृतियों के
अवशेष, बुझ जाते
हैं अपने आप
तथाकथित
मानव
सभ्यता के ज्योत, उत्सव, समारोह,युद्ध
- त्रासदी के मध्य हो कर, बहता
जाता है जीवन स्रोत। कलिंग
हो या सीरिया, ईराक से
ले कर यूक्रेन, वही
जल - साम्राज्य
का विधान,
सिर्फ़
मेरा ही हो हर तरफ वर्चस्व ज़मीं से ले
कर आसमान, हर युग में बदल
जाते हैं इंसानियत के
तजवीज़, कभी
देते हैं धर्म
की दुहाई
और
कभी बांध लेते हैं लोग अपनी बांहों में
नक़ली अमन ताबीज़, हालांकि
सीना रहता है भेदभाव से
ओतप्रोत, उत्सव,
समारोह, युद्ध
- त्रासदी
के मध्य हो कर, बहता जाता है जीवन
स्रोत।
* *
- - शांतनु सान्याल
21 फ़रवरी, 2022
किनारे - किनारे - -
बहोत ख़ामोश थे सभी जाने पहचाने
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे, कभी
कहीं वो मिले तो पूछ
लेना ज़िन्दगी
का निचोड़
क्या
था, हर एक क़दम पर सुख दुःख के
नित नए समीकरण देखे, कभी
क्षितिज के ऊपर थे ख़्वाब,
और कभी शून्य में
थे डूबते हुए
सितारे,
बहोत ख़ामोश थे सभी जाने पहचाने
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे । कौन, किस
मोड़ पर मिला और
न जाने किस
अनजान
कूचे
पर खो गया, चाँदनी में थी निखरी -
हुई गुल मोहर की परछाइयां,
कोई किसी का हम सफ़र
नहीं होता फिर भी
दिल फ़रेब हैं
ज़िन्दगी
की
अथाह गहराइयां, कुछ अधूरी सी है
अपनी कहानी, कुछ असमाप्त
से हैं चाहत तुम्हारे, बहोत
ख़ामोश थे सभी जाने
पहचाने चेहरे, न
जाने कहाँ
गुम
हो गए रंगीन अक्स सारे, फिर भी
चल रहे हैं हम जीवन नदी के
किनारे - किनारे - -
* *
- - शांतनु सान्याल
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे, कभी
कहीं वो मिले तो पूछ
लेना ज़िन्दगी
का निचोड़
क्या
था, हर एक क़दम पर सुख दुःख के
नित नए समीकरण देखे, कभी
क्षितिज के ऊपर थे ख़्वाब,
और कभी शून्य में
थे डूबते हुए
सितारे,
बहोत ख़ामोश थे सभी जाने पहचाने
चेहरे, न जाने कहाँ गुम हो गए
रंगीन अक्स सारे । कौन, किस
मोड़ पर मिला और
न जाने किस
अनजान
कूचे
पर खो गया, चाँदनी में थी निखरी -
हुई गुल मोहर की परछाइयां,
कोई किसी का हम सफ़र
नहीं होता फिर भी
दिल फ़रेब हैं
ज़िन्दगी
की
अथाह गहराइयां, कुछ अधूरी सी है
अपनी कहानी, कुछ असमाप्त
से हैं चाहत तुम्हारे, बहोत
ख़ामोश थे सभी जाने
पहचाने चेहरे, न
जाने कहाँ
गुम
हो गए रंगीन अक्स सारे, फिर भी
चल रहे हैं हम जीवन नदी के
किनारे - किनारे - -
* *
- - शांतनु सान्याल
10 फ़रवरी, 2022
आरसी का नगर - -
वही लकीर के फ़क़ीर सभी, देह से पृथक है
छाया, साथ साथ गुज़रने का अर्थ नहीं
कि एक ही गंत्वय हो हमारा, सभी
अनुबंध टूट जाते हैं चाहे बांधे
जितना भी नेह डोर, कोई
नहीं किसी का हम -
साया, वही
लकीर
के फ़क़ीर सभी, देह से पृथक है छाया । कोई
नहीं होता ख़ुद के सिवा, जब रूबरू हो
आरसी का शहर, खोजते हैं हम
अपना ठिकाना, बंद हैं सभी
दरवाज़े, रात का है ये
अंतिम प्रहर, यूँ तो
निकले थे हम
कारवां के
संग,
मुड़ कर देखा कई बार, हमारे साथ कोई भी
न आया, वही लकीर के फ़क़ीर सभी,
देह से पृथक है छाया ।
* *
- - शांतनु सान्याल
छाया, साथ साथ गुज़रने का अर्थ नहीं
कि एक ही गंत्वय हो हमारा, सभी
अनुबंध टूट जाते हैं चाहे बांधे
जितना भी नेह डोर, कोई
नहीं किसी का हम -
साया, वही
लकीर
के फ़क़ीर सभी, देह से पृथक है छाया । कोई
नहीं होता ख़ुद के सिवा, जब रूबरू हो
आरसी का शहर, खोजते हैं हम
अपना ठिकाना, बंद हैं सभी
दरवाज़े, रात का है ये
अंतिम प्रहर, यूँ तो
निकले थे हम
कारवां के
संग,
मुड़ कर देखा कई बार, हमारे साथ कोई भी
न आया, वही लकीर के फ़क़ीर सभी,
देह से पृथक है छाया ।
* *
- - शांतनु सान्याल
05 फ़रवरी, 2022
मिलते जुलते चेहरे - -
पल्लव विहीन हैं पलाश वन फिर
भी, कुछ सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते, ऋतु चक्र की
है अपनी मजबूरी,
उड़ते हैं डायरी
के बेक़रार
पन्ने,
कुछ अंतरतम की गहराई में हैं -
छुपे हुए अनदेखे सपने, देह
का पलस्तर ढह जाए
तो क्या, अंदरूनी
रंग नहीं
झरते,
पल्लव विहीन हैं पलाश वन फिर
भी, कुछ सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते। कोई लैटिनो
ख़्वाब है ज़िन्दगी,
गुज़रती है जो
आधी -
रात
को अमेरिकी मरू सीमांत के - -
समानांतर, एक तरफ
है सघन अंधेरा दूसरी
ओर झिलमिलाता
सा कृत्रिम
सवेरा,
कुछ पल तुम्हारे हैं ज़्यादा, कुछ
क्षण हैं हमारे न के बराबर,
फिर भी किसी एक
बिंदु पर हर
चेहरे हैं
मिलते जुलते, पल्लव विहीन हैं
पलाश वन फिर भी, कुछ
सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते।
* *
- - शांतनु सान्याल
भी, कुछ सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते, ऋतु चक्र की
है अपनी मजबूरी,
उड़ते हैं डायरी
के बेक़रार
पन्ने,
कुछ अंतरतम की गहराई में हैं -
छुपे हुए अनदेखे सपने, देह
का पलस्तर ढह जाए
तो क्या, अंदरूनी
रंग नहीं
झरते,
पल्लव विहीन हैं पलाश वन फिर
भी, कुछ सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते। कोई लैटिनो
ख़्वाब है ज़िन्दगी,
गुज़रती है जो
आधी -
रात
को अमेरिकी मरू सीमांत के - -
समानांतर, एक तरफ
है सघन अंधेरा दूसरी
ओर झिलमिलाता
सा कृत्रिम
सवेरा,
कुछ पल तुम्हारे हैं ज़्यादा, कुछ
क्षण हैं हमारे न के बराबर,
फिर भी किसी एक
बिंदु पर हर
चेहरे हैं
मिलते जुलते, पल्लव विहीन हैं
पलाश वन फिर भी, कुछ
सिंदूरी स्वप्न कभी
नहीं मरते।
* *
- - शांतनु सान्याल
27 जनवरी, 2022
सुबह मुबारक - -
जन - अरण्य की थी अपनी अलग ख़ूबसूरती,
हज़ार बार ख़ुद को गुमशुदा पाया, हज़ार
बार ज़िन्दगी से मुलाक़ात हुई, कहाँ
मिलते हैं मनचाहे रास्ते, कहाँ
कोई खड़ा होता है मुंतज़िर
किसी के वास्ते, बड़े
विस्मय से वो
देखता रहा
मुझ को
एक टक, किसी अजनबी की तरह, यूँ तो हर
एक मोड़ पर रुक कर, बारहा उनसे बात
हुई, हज़ार बार ख़ुद को गुमशुदा
पाया, हज़ार बार ज़िन्दगी
से मुलाक़ात हुई। सभी
दर्प उतर जाते हैं
धीरे - धीरे,
दर्पण रह
जाता
है बिम्ब विहीन, दोनों पार्श्व हैं पारदर्शी, फिर
भी वजूद का ठिकाना कहीं नहीं, वो सभी
हैं कल्प - कहानियों में छुपे हुए चेहरे,
जो दिखाते हैं मिथ्या मरुद्यान,
हमारे पांव तले है केवल
पथरीली ज़मीन,
रात तो गुज़र
गई यूँ ही
बियाबां
के राह चलते, सुबह को हो मुबारक अंतिम -
पहर जो बरसात हुई, हज़ार बार ख़ुद को
गुमशुदा पाया, हज़ार बार ज़िन्दगी
से मुलाक़ात हुई - -
* *
- - शांतनु सान्याल
हज़ार बार ख़ुद को गुमशुदा पाया, हज़ार
बार ज़िन्दगी से मुलाक़ात हुई, कहाँ
मिलते हैं मनचाहे रास्ते, कहाँ
कोई खड़ा होता है मुंतज़िर
किसी के वास्ते, बड़े
विस्मय से वो
देखता रहा
मुझ को
एक टक, किसी अजनबी की तरह, यूँ तो हर
एक मोड़ पर रुक कर, बारहा उनसे बात
हुई, हज़ार बार ख़ुद को गुमशुदा
पाया, हज़ार बार ज़िन्दगी
से मुलाक़ात हुई। सभी
दर्प उतर जाते हैं
धीरे - धीरे,
दर्पण रह
जाता
है बिम्ब विहीन, दोनों पार्श्व हैं पारदर्शी, फिर
भी वजूद का ठिकाना कहीं नहीं, वो सभी
हैं कल्प - कहानियों में छुपे हुए चेहरे,
जो दिखाते हैं मिथ्या मरुद्यान,
हमारे पांव तले है केवल
पथरीली ज़मीन,
रात तो गुज़र
गई यूँ ही
बियाबां
के राह चलते, सुबह को हो मुबारक अंतिम -
पहर जो बरसात हुई, हज़ार बार ख़ुद को
गुमशुदा पाया, हज़ार बार ज़िन्दगी
से मुलाक़ात हुई - -
* *
- - शांतनु सान्याल
09 जनवरी, 2022
रतजगा - -
उगते सूरज का था सभी को इंतज़ार,
जो पीछे छूट गए, वो सभी कोहरे
में कहीं खो गए, उनका पता
शायद, दे पाए खोह के
अंधकार, कुछ मृत
स्मृतियों के
जीवाश्म
उभरे
पड़े
थे पिछले पहर, दूर तक जाती है इक
सुनसान सी सड़क, कोई नहीं
जानता, कहाँ, किस मोड़
पर जा कर रुकेगा ये
बोझिल सांसों का
सफ़र, उम्र
भर था
वो
परेशां, देख कर फ़िरौन का कारोबार,
उगते सूरज का था सभी को
इंतज़ार। न जाने किस
दर पर उस ने दी
थी दुआओं
वाली
दस्तक, हर किसी ने कंपन महसूस
किया था ज़रूर, जिसने दरवाज़ा
खोल कर उसे इक नज़र
देखा, वो तर गया
ज़िन्दगी और
मौत के
दोनों
जहान से, न था वो कोई फ़रिश्ता न
ही देवता किसी उजड़े मंदिर का,
वो समदर्शी अक्स था मेरा
जो उतरा था, आईने
के आसमान से,
जो मध्य
रात
बुलाता रहा मुझे बारम्बार, उगते - -
सूरज का था सभी को
इंतज़ार।
* *
- - शांतनु सान्याल
जो पीछे छूट गए, वो सभी कोहरे
में कहीं खो गए, उनका पता
शायद, दे पाए खोह के
अंधकार, कुछ मृत
स्मृतियों के
जीवाश्म
उभरे
पड़े
थे पिछले पहर, दूर तक जाती है इक
सुनसान सी सड़क, कोई नहीं
जानता, कहाँ, किस मोड़
पर जा कर रुकेगा ये
बोझिल सांसों का
सफ़र, उम्र
भर था
वो
परेशां, देख कर फ़िरौन का कारोबार,
उगते सूरज का था सभी को
इंतज़ार। न जाने किस
दर पर उस ने दी
थी दुआओं
वाली
दस्तक, हर किसी ने कंपन महसूस
किया था ज़रूर, जिसने दरवाज़ा
खोल कर उसे इक नज़र
देखा, वो तर गया
ज़िन्दगी और
मौत के
दोनों
जहान से, न था वो कोई फ़रिश्ता न
ही देवता किसी उजड़े मंदिर का,
वो समदर्शी अक्स था मेरा
जो उतरा था, आईने
के आसमान से,
जो मध्य
रात
बुलाता रहा मुझे बारम्बार, उगते - -
सूरज का था सभी को
इंतज़ार।
* *
- - शांतनु सान्याल
28 दिसंबर, 2021
मंज़िल दर मंज़िल - -
सर ज़मीं ए ख़्वाब दिखा कर,
लोग न जाने कहाँ गए,
मुसलसल बियाबां
के सिवा कुछ
न था हम
जहाँ
गए, उनका अपना है जो
चश्म ए अंदाज़, कैसे
कोई बदले, संग
ए बुत हो,
या
ख़ुदा का घर, हम सिर्फ़
तनहा गए, कहते हैं
यहाँ कभी था
इक लहराता
हुआ झील
दूर तक,
न
दरख़्त, न कोई साया, न
जाने किधर वो कारवां
गए, आईना कहता
है मुझसे ऐनक
को ज़रा
बेहतर
पोंछ
लूँ,
कोहरा है घना, राह बता कर
जाने कहाँ वो रहनुमा
गए - -
* *
- - शांतनु सान्याल
लोग न जाने कहाँ गए,
मुसलसल बियाबां
के सिवा कुछ
न था हम
जहाँ
गए, उनका अपना है जो
चश्म ए अंदाज़, कैसे
कोई बदले, संग
ए बुत हो,
या
ख़ुदा का घर, हम सिर्फ़
तनहा गए, कहते हैं
यहाँ कभी था
इक लहराता
हुआ झील
दूर तक,
न
दरख़्त, न कोई साया, न
जाने किधर वो कारवां
गए, आईना कहता
है मुझसे ऐनक
को ज़रा
बेहतर
पोंछ
लूँ,
कोहरा है घना, राह बता कर
जाने कहाँ वो रहनुमा
गए - -
* *
- - शांतनु सान्याल
20 दिसंबर, 2021
अंतहीन यात्रा - -
हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में, सूखे हुए तलछट
पर रह जाते हैं
निःशब्द से
कुछ
क़दमों के निशां, दौड़ते हुए से लगते
हैं पेड़ पौधे, खेत खलियान, नदी
पहाड़, फूलों से लदी वादियां,
कुहासे में डूबी हुई अंध
घाटियां, ज़िन्दगी
अपने अंदर
तब होती
है एक
वेगवान सी परिश्रांत नदी, वो रुकना
चाहती है किसी मोड़ पर एक रात
के लिए, लेकिन ज़रूरी नहीं
मिल जाए कोई सराय
सघन अरण्य
राहों में,
हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में। मध्य रात के थे वो
सभी मेघ दल, छू
कर गए हैं
शायद
मेरी
ओंठों के सतह, एक नमी सी है दिल
की गहराइयों तक, फिर सुबह
की है तलाश सर्द चाँदनी
रात के बाद, कुछ
पल सुकून तो
मिले नर्म
धूप
के पनाहों में, हमेशा संधि - स्थल
नहीं होता अंतिम बिंदु, कुछ
दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न
दिशाओं
में।
* *
- - शांतनु सान्याल
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में, सूखे हुए तलछट
पर रह जाते हैं
निःशब्द से
कुछ
क़दमों के निशां, दौड़ते हुए से लगते
हैं पेड़ पौधे, खेत खलियान, नदी
पहाड़, फूलों से लदी वादियां,
कुहासे में डूबी हुई अंध
घाटियां, ज़िन्दगी
अपने अंदर
तब होती
है एक
वेगवान सी परिश्रांत नदी, वो रुकना
चाहती है किसी मोड़ पर एक रात
के लिए, लेकिन ज़रूरी नहीं
मिल जाए कोई सराय
सघन अरण्य
राहों में,
हमेशा संधि - स्थल नहीं होता अंतिम
बिंदु, कुछ दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न दिशाओं
में। मध्य रात के थे वो
सभी मेघ दल, छू
कर गए हैं
शायद
मेरी
ओंठों के सतह, एक नमी सी है दिल
की गहराइयों तक, फिर सुबह
की है तलाश सर्द चाँदनी
रात के बाद, कुछ
पल सुकून तो
मिले नर्म
धूप
के पनाहों में, हमेशा संधि - स्थल
नहीं होता अंतिम बिंदु, कुछ
दूर साथ बह कर नदियां
मुड़ जाती हैं भिन्न
दिशाओं
में।
* *
- - शांतनु सान्याल
18 दिसंबर, 2021
क्षितिज पार के पथिक - -
बूंद बूंद ओस रुकी है कहीं, दिगंत के
नयन कोर, अंगुष्ठ और तर्जनी
के मध्य है कहीं मुहाने की
ज़मीं, देखती है जिसे
मेरी ज़िन्दगी
हो कर
आत्म विभोर, यहां अष्ट प्रहर चलता
रहता है क्रय विक्रय, कदाचित हो
निस्तब्धता तुम्हारी ओर, बूंद
बूंद ओस रुकी है कहीं,
दिगंत के नयन
कोर। सभी
स्रोत हैं
रुके रुके से तुम्हारी भव्यता के आगे,
सभी नदियों का अंत है निश्चित,
सांझ घिरते ही लौट आएंगे
सभी विहग वृन्द, अपने
अपने घर, तुम हो
वहीं अपनी
जगह
स्थिर, समय चक्र अपनी लय पर है
भागे, बिखरे पड़े हैं दूर दूर तक
अतीत के सभी छिन्न -
भिन्न पृष्ठ, क्लांत
रात्रि खड़ी है
अपने
दहलीज़ पर एकाकी, सुदूर धुंध में -
है कहीं कांपता हुआ निरीह
भोर, बूंद बूंद ओस
रुकी है कहीं,
दिगंत के
नयन
कोर।
* *
- - शांतनु सान्याल
नयन कोर, अंगुष्ठ और तर्जनी
के मध्य है कहीं मुहाने की
ज़मीं, देखती है जिसे
मेरी ज़िन्दगी
हो कर
आत्म विभोर, यहां अष्ट प्रहर चलता
रहता है क्रय विक्रय, कदाचित हो
निस्तब्धता तुम्हारी ओर, बूंद
बूंद ओस रुकी है कहीं,
दिगंत के नयन
कोर। सभी
स्रोत हैं
रुके रुके से तुम्हारी भव्यता के आगे,
सभी नदियों का अंत है निश्चित,
सांझ घिरते ही लौट आएंगे
सभी विहग वृन्द, अपने
अपने घर, तुम हो
वहीं अपनी
जगह
स्थिर, समय चक्र अपनी लय पर है
भागे, बिखरे पड़े हैं दूर दूर तक
अतीत के सभी छिन्न -
भिन्न पृष्ठ, क्लांत
रात्रि खड़ी है
अपने
दहलीज़ पर एकाकी, सुदूर धुंध में -
है कहीं कांपता हुआ निरीह
भोर, बूंद बूंद ओस
रुकी है कहीं,
दिगंत के
नयन
कोर।
* *
- - शांतनु सान्याल
15 दिसंबर, 2021
अशेष रात्रि - -
मन की अगम गहराई जाने न कोई,
सतह को छू कर बस मुस्कुरा
जाते हैं लोग, जल चक्र
में थे सभी अटके
हुए, मौसम
का यूँ
सहसा रुख़ बदलना पहचाने न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न
कोई। कौन डूबे कहां, किस
अंध घाटी के अंदर,
कहना नहीं
आसान,
इसी
पल में है समाहित सारा ब्रह्माण्ड - -
और पलक झपकते ही उस
पार बिखरा हुआ सारा
आसमान, सांस
के साथ ही
उठते
गिरते हैं चाहतों के रंगीन यवनिका,
नेपथ्य के हाथों में है अदृश्य
डोर, परम सत्य को
जान कर भी
उसे माने
न कोई,
मन की अगम गहराई जाने न कोई।
कोहरे के सीढ़ियों से उतरता है
धीरे धीरे आख़री पहर का
चाँद, तुम हो दिल के
क़रीब या रस्म
अदायगी
है ये
ज़िन्दगी, उड़ते हुए मेघ कणों को है
छूने की आस या मरू थल के
सीने में है भटकती हुई
कोई सदियों की
प्यास, किसी
चकमक
पत्थर
से
अपने आप उठती हैं चिंगारियां या
कुछ सुख के पल आज भी हैं
मेरे आसपास, अजीब सी
है ये नज़दीकियां,
दिल के क़रीब
हो कर भी
सभी,
दरअसल अपना माने न कोई, मन
की अगम गहराई
जाने न
कोई।
* *
- - शांतनु सान्याल
कोई।
* *
- - शांतनु सान्याल
08 दिसंबर, 2021
कुछ याद रहा कुछ भूल गए - -
कोई चिड़िया थी, या कोई बल
खाती हुई कटी पतंग, बहुत
दूर किसी टीले से उसने
समंदर को देखा
होगा, न
चाह
कर भी ज़िन्दगी यहां बहुत - -
कुछ करा जाती है, दिल
को कोई देखता
नहीं, डूबती
नज़र
को
देखा होगा, उनकी चाहतों
का दरिया मुहाने तक
पहुँचता ही नहीं,
किसी
अनजान पहाड़ी से शाम के
मंज़र को देखा होगा,
परछाइयों के
शहर में
तुम
ढूंढते हो गुमसुदा जिस्म को,
बियाबां रात के सीने पर,
ओस के असर को
देखा होगा,
साहिल
पर
हैं बिखरे हुए अनगिनत
सीपों की कहानियां,
गहरी नींद में
उसने
किसी ख़्वाब ए रहगुज़र को
देखा होगा।
* *
- - शांतनु सान्याल
खाती हुई कटी पतंग, बहुत
दूर किसी टीले से उसने
समंदर को देखा
होगा, न
चाह
कर भी ज़िन्दगी यहां बहुत - -
कुछ करा जाती है, दिल
को कोई देखता
नहीं, डूबती
नज़र
को
देखा होगा, उनकी चाहतों
का दरिया मुहाने तक
पहुँचता ही नहीं,
किसी
अनजान पहाड़ी से शाम के
मंज़र को देखा होगा,
परछाइयों के
शहर में
तुम
ढूंढते हो गुमसुदा जिस्म को,
बियाबां रात के सीने पर,
ओस के असर को
देखा होगा,
साहिल
पर
हैं बिखरे हुए अनगिनत
सीपों की कहानियां,
गहरी नींद में
उसने
किसी ख़्वाब ए रहगुज़र को
देखा होगा।
* *
- - शांतनु सान्याल
02 दिसंबर, 2021
टूटे हुआ तारों का पता - -
बहुत दीर्घ, नहीं होते जीवन के रास्ते, फिर भी
कोई नहीं करता प्रतीक्षा, बेवजह किसी
के वास्ते, सुदूर उस मोड़ से कहीं
मुड़ गए सभी यादों के साए,
मील का पत्थर रहा
अपनी जगह
यथावत,
उसे
क्या लेना देना, कोई आए या जाए, न जाने क्या
क्या न लिखता रहा वो उम्र भर, फिर भी
अहसास की डायरी रही अधूरी, उस
एक धुंध भरे पड़ाव में आकर
उसने छोड़ दी आगे की
डगर, ख़त्म कहां
होती है मगर
अंतर्यात्रा,
जिधर
भी देखा घूमते प्रतिबिंबों की सिवा कुछ भी न - -
था, ताउम्र करता रहा अनगिनत हिसाब
किताब, अंत्यमिल में लेकिन प्रश्न
चिन्हों के सिवा कुछ भी न था,
मुश्किल था लौट के
आना हालांकि
अतीत की
आवाज़
आती
रही रुक रुक कर दूर तक, जब टूटा गुमनाम - -
कोई यायावर तारा, एक मौन अट्टहास
बिखरा हुआ था, अंतरिक्ष में दूर
दूर तक - -
* *
- - शांतनु सान्याल
कोई नहीं करता प्रतीक्षा, बेवजह किसी
के वास्ते, सुदूर उस मोड़ से कहीं
मुड़ गए सभी यादों के साए,
मील का पत्थर रहा
अपनी जगह
यथावत,
उसे
क्या लेना देना, कोई आए या जाए, न जाने क्या
क्या न लिखता रहा वो उम्र भर, फिर भी
अहसास की डायरी रही अधूरी, उस
एक धुंध भरे पड़ाव में आकर
उसने छोड़ दी आगे की
डगर, ख़त्म कहां
होती है मगर
अंतर्यात्रा,
जिधर
भी देखा घूमते प्रतिबिंबों की सिवा कुछ भी न - -
था, ताउम्र करता रहा अनगिनत हिसाब
किताब, अंत्यमिल में लेकिन प्रश्न
चिन्हों के सिवा कुछ भी न था,
मुश्किल था लौट के
आना हालांकि
अतीत की
आवाज़
आती
रही रुक रुक कर दूर तक, जब टूटा गुमनाम - -
कोई यायावर तारा, एक मौन अट्टहास
बिखरा हुआ था, अंतरिक्ष में दूर
दूर तक - -
* *
- - शांतनु सान्याल
16 नवंबर, 2021
विकल्प की तलाश - -
न जाने कितने चेहरे, अपनी ही जगह रह
जाते हैं लौह स्तंभित, और वक़्त की
भीड़ भरी बस, गुज़र जाती है
पलक झपकते ही, हमारे
पास प्रतीक्षा के
अतिरिक्त
कोई
विकल्प नहीं होता, परछाइयां बढ़ कर हो
जाते हैं जब ऊँचे दरख़्त, तब जीवन
खोजता है तंग गलियों में अपने
होने का कोई ठोस सबूत,
उस अनुसंधान में
ज़रूरी नहीं
कि हम
हों
कामयाब, फिर भी खिल उठता है नाज़ुक
ह्रदय बच्चों की तरह, किसी कोने
में खोया हुआ ख़्वाब मिलते
ही, और वक़्त की भीड़
भरी बस, गुज़र
जाती है
पलक
झपकते ही। खोने और पाने का ग्राफ़ - -
अपनी जगह, चढ़ता उतरता रहता
है अनवरत, ज़िन्दगी कभी
थकती नहीं है, कभी
उच्च अक्षांश
पर रहते
हैं हम,
और कभी शून्य रेखा के किनारे रचते हैं
एक महादेश ! कहने को दूर दूर तक
है पसरा हुआ एक अशेष धूसर
मरुभूमि, जब तक सांस
है बाक़ी, वक्षस्थल
की गहराइयों
में ख़त्म
कहां
होती है उम्मीद की नमी, कुछ देर ही
रहता है कुहासे का साम्राज्य,
उजली धूप, हर हाल में
निकल आती है
धुंध के मेघ
छंटते ही,
और
वक़्त की भीड़ भरी बस, गुज़र जाती है
पलक झपकते ही - -
* *
- - शांतनु सान्याल
15 नवंबर, 2021
इत्मीनान - -
कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही
कनखियों से देखने की अदा, वही
इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने
की गर्मियां, बस दिलों में
वो मिठास न रही,
बिछुड़ कर
दोबारा
मिलने की आस न रही, खिड़कियों के -
उस पार, बहुत दूर हैं नील पर्वतों के
कगार, वादियों में फिर एक
शाम, हमेशा की तरह
सूरज डूबा है
अभी -
अभी, ढूंढता हूँ मैं अक्सर ज़िन्दगी के
अलबम में, अपना खोया हुआ
अस्तित्व, किंतु अफ़सोस
वो आतशी कांच अब
मेरे पास न रही,
वही इशारों
की ज़बां,
हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो
मिठास न रही। इक चाहत है या कोई
तह टूटे बिना लिबास, संदूक के
सिवा कोई नहीं दूसरा
विकल्प उसके
पास, एक
गंध था
या
कोई अनोखा सा अहसास, वक़्त के सभी
नेफ्थलीन, हो चुके विलीन, वो आज
भी है, रूह से गुथा हुआ मेरी
सांसों के आसपास,
इक बूंद क्या
मिली
उस
निगाह ए करम की, ज़िन्दगी में अब कोई
भी प्यास न रही।
* *
- - शांतनु सान्याल
कनखियों से देखने की अदा, वही
इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने
की गर्मियां, बस दिलों में
वो मिठास न रही,
बिछुड़ कर
दोबारा
मिलने की आस न रही, खिड़कियों के -
उस पार, बहुत दूर हैं नील पर्वतों के
कगार, वादियों में फिर एक
शाम, हमेशा की तरह
सूरज डूबा है
अभी -
अभी, ढूंढता हूँ मैं अक्सर ज़िन्दगी के
अलबम में, अपना खोया हुआ
अस्तित्व, किंतु अफ़सोस
वो आतशी कांच अब
मेरे पास न रही,
वही इशारों
की ज़बां,
हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो
मिठास न रही। इक चाहत है या कोई
तह टूटे बिना लिबास, संदूक के
सिवा कोई नहीं दूसरा
विकल्प उसके
पास, एक
गंध था
या
कोई अनोखा सा अहसास, वक़्त के सभी
नेफ्थलीन, हो चुके विलीन, वो आज
भी है, रूह से गुथा हुआ मेरी
सांसों के आसपास,
इक बूंद क्या
मिली
उस
निगाह ए करम की, ज़िन्दगी में अब कोई
भी प्यास न रही।
* *
- - शांतनु सान्याल
13 नवंबर, 2021
अहाते का सूखा दरख़्त - -
अब लौटना नहीं आसान, चाहे कोई
कितना भी दे आवाज़, जिस
व्यासार्ध से निकलते
थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु
पर
थम चुकी है ज़िन्दगी, अब वो दौर
भी नहीं कि बंद दरवाज़ों पर
दे कोई दस्तक, हर कोई
अपने ही दायरे में
है सिमटा
हुआ,
एक सरसरी नज़र की तरह हैं सभी
वाबस्तगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी। हर एक चेहरे में होता है
अप्रकाशित कोई न कोई एक
इश्तेहार, बेवजह कोई
नहीं मिलता है
यहां, क्या
अपने
और क्या पराए, वही लेन देन की -
प्राचीन परम्परा, वही जोड़ -
तोड़ का आदिम बाज़ार,
चाहतों के हैं बहुत
लम्बे से फ़र्द,
कुछ देर
की
है ये दस्त ए गर्मीबाज़ी, फिर हर
एक रिश्ता है बर्फ़ की तरह
पथरीला और सर्द, तब
जलाऊ दरख़्त से
कुछ कम नहीं
होती
अपनी मौजूदगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी।
* *
- - शांतनु सान्याल
कितना भी दे आवाज़, जिस
व्यासार्ध से निकलते
थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु
पर
थम चुकी है ज़िन्दगी, अब वो दौर
भी नहीं कि बंद दरवाज़ों पर
दे कोई दस्तक, हर कोई
अपने ही दायरे में
है सिमटा
हुआ,
एक सरसरी नज़र की तरह हैं सभी
वाबस्तगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी। हर एक चेहरे में होता है
अप्रकाशित कोई न कोई एक
इश्तेहार, बेवजह कोई
नहीं मिलता है
यहां, क्या
अपने
और क्या पराए, वही लेन देन की -
प्राचीन परम्परा, वही जोड़ -
तोड़ का आदिम बाज़ार,
चाहतों के हैं बहुत
लम्बे से फ़र्द,
कुछ देर
की
है ये दस्त ए गर्मीबाज़ी, फिर हर
एक रिश्ता है बर्फ़ की तरह
पथरीला और सर्द, तब
जलाऊ दरख़्त से
कुछ कम नहीं
होती
अपनी मौजूदगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी।
* *
- - शांतनु सान्याल
12 नवंबर, 2021
हमसाया की तरह - -
ज़िन्दगी के अहाते में आज भी उभरती
हैं किसी के मौन शब्दों की छाया,
अप्रेषित पत्रों के तहों में
कहीं आज भी है
मौजूद इक
पुरातन
सी
गंध, कितने बार खिले गुलमोहर और
कितनी बार ही बिखरीं मुरझाई
हुई पंखुड़ियां, जुगनू की
तरह आज भी हैं
बेकल कुछ
जज़्बात
मेरी
हथेलियों में बंद, जितना भी खोलूं वो
उलझी हुईं रेशमी एहसास, उतना
ही दिल ने मुझे हर पल है
भरमाया, ज़िन्दगी
के अहाते में
आज भी
उभरती
हैं
किसी के मौन शब्दों की छाया। वक़्त
के साथ टूट जाते हैं सभी बंध, एक
निःशब्द दूरत्व बढ़ा जाती है
नदी की गहराई, तट
भी बदल जाते हैं
रुख़ अपना,
अतीत
का
स्लेट रह जाता है अपनी जगह ले कर
सीने पर धुंधले हर्फ़, यादें भी हो
जाती हैं एक दिन ढलते
दिन की क्षणिक
पलों की दीर्घ
परछाई,
फिर
भी
न जाने क्यों साथ कोई चलता है दूर
तक, जैसे ख़ामोश अदृश्य कोई
हमसाया, ज़िन्दगी के
अहाते में आज
भी उभरती
हैं किसी
के
मौन शब्दों की छाया - -
* *
- - शांतनु सान्याल
हैं किसी के मौन शब्दों की छाया,
अप्रेषित पत्रों के तहों में
कहीं आज भी है
मौजूद इक
पुरातन
सी
गंध, कितने बार खिले गुलमोहर और
कितनी बार ही बिखरीं मुरझाई
हुई पंखुड़ियां, जुगनू की
तरह आज भी हैं
बेकल कुछ
जज़्बात
मेरी
हथेलियों में बंद, जितना भी खोलूं वो
उलझी हुईं रेशमी एहसास, उतना
ही दिल ने मुझे हर पल है
भरमाया, ज़िन्दगी
के अहाते में
आज भी
उभरती
हैं
किसी के मौन शब्दों की छाया। वक़्त
के साथ टूट जाते हैं सभी बंध, एक
निःशब्द दूरत्व बढ़ा जाती है
नदी की गहराई, तट
भी बदल जाते हैं
रुख़ अपना,
अतीत
का
स्लेट रह जाता है अपनी जगह ले कर
सीने पर धुंधले हर्फ़, यादें भी हो
जाती हैं एक दिन ढलते
दिन की क्षणिक
पलों की दीर्घ
परछाई,
फिर
भी
न जाने क्यों साथ कोई चलता है दूर
तक, जैसे ख़ामोश अदृश्य कोई
हमसाया, ज़िन्दगी के
अहाते में आज
भी उभरती
हैं किसी
के
मौन शब्दों की छाया - -
* *
- - शांतनु सान्याल
06 नवंबर, 2021
वाष्पित बिम्ब - -
ओस में धुली हुई है निगार ए सहर,
रात के सीने में हैं दफ़्न, कितने
ही अनकहे अफ़साने, कोई
याद नहीं रखता गुज़रे
हुए अंधेरे के गुम
नाम ठिकाने,
ज़रा सा
सांस
ले लूँ फिर ज़िन्दगी करे आगाज़ ए
सफ़र, ओस में धुली हुई है
निगार ए सहर। नेपथ्य
में कहीं छोड़ आया
हूँ मैं अपना
असली
चेहरा,
जो लोग देखना चाहें वो दरअसल है
मायावी बिम्ब मेरा, यूँ भी इस
चकाचौंध की दुनिया में,
झूठ और सच के
तराज़ू पर
पड़ता
नहीं
कोई असर, ओस में धुली हुई है - -
निगार ए सहर।
* *
- - शांतनु सान्याल
रात के सीने में हैं दफ़्न, कितने
ही अनकहे अफ़साने, कोई
याद नहीं रखता गुज़रे
हुए अंधेरे के गुम
नाम ठिकाने,
ज़रा सा
सांस
ले लूँ फिर ज़िन्दगी करे आगाज़ ए
सफ़र, ओस में धुली हुई है
निगार ए सहर। नेपथ्य
में कहीं छोड़ आया
हूँ मैं अपना
असली
चेहरा,
जो लोग देखना चाहें वो दरअसल है
मायावी बिम्ब मेरा, यूँ भी इस
चकाचौंध की दुनिया में,
झूठ और सच के
तराज़ू पर
पड़ता
नहीं
कोई असर, ओस में धुली हुई है - -
निगार ए सहर।
* *
- - शांतनु सान्याल
04 नवंबर, 2021
दीपावली मंगलमय हो - -
फिर हों बुझे चिराग़ रौशन, ज़िन्दगी
फिर बने दिवाली की रात, कुछ
खो दिया है अंधेरे में कहीं,
बहुत कुछ पा भी लिया
है उजाले के साथ,
दुआओं के लौ
जलते रहें अंतरतम की गहराइयों में अनवरत,
आँधियों का क्या है आते जाते
रहेंगे हमेशा की तरह, बस
इल्तिज़ा है इतनी कि
अपनों का कभी
न छूटे हाथ,
बहुत
कुछ पा भी लिया है उजाले के साथ।
- - शांतनु सान्याल
फिर बने दिवाली की रात, कुछ
खो दिया है अंधेरे में कहीं,
बहुत कुछ पा भी लिया
है उजाले के साथ,
दुआओं के लौ
जलते रहें अंतरतम की गहराइयों में अनवरत,
आँधियों का क्या है आते जाते
रहेंगे हमेशा की तरह, बस
इल्तिज़ा है इतनी कि
अपनों का कभी
न छूटे हाथ,
बहुत
कुछ पा भी लिया है उजाले के साथ।
- - शांतनु सान्याल
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