04 सितंबर, 2020

दूरत्व - -

जन अरण्य में न जाने कितने
हिंस्र पशु घूम रहे लगाए
घात, दबंगों के हाथ
में है हर घर की
चाबी, और
आप 
करते हैं राम राज्य की बात ।
शंख, थाली, या हो दीप -
झुनझुना, सब वृथा 
न रोक पाए 
नियति 
के 
मार को, वो है या नहीं, बस
सोचने की बात है, कठिन
है बहुत अनसुना करना
लेकिन किवाड़ के 
प्रहार को ।
मोम -
बत्ती वाले भी अपने और पराए
में अंधकार तलाश करते हैं,
हासिए से उभर कर 
शीर्षक की आस
करते हैं ।
वो संस्कृति, सभ्यता में एक ही
ख़ास रंग चाहें, लहू का रंग
तो लेकिन एक ही है कौन
उन्हें  समझाए, मेरे घर
से दूर नहीं उनका
घर, इतना
दूरत्व
ठीक नहीं कि मिल के भी मिल
न पाएँ । 
* *
- - शांतनु सान्याल



03 सितंबर, 2020

प्रतीक्षारत बिहान - -

रात कभी थकती नहीं, चलती जाती
है अकेली ही, सुदूर ऊंघती हुई
पहाड़ियों के उस पार,
पगडण्डी के दोनों
तरफ पड़े
रहते
हैं कुछ सिक्त चाँदनी के अवशेष,
कुछ देह में घुले हुए क्लांत
गंध, कुछ ख़्वाबों के
नुकीले ज़ख्म,
कुछ थमे
हुए
क्षितिज के धुंधले बादल, लेकिन
वो रूकती नहीं उसे हर हाल
में छूना है सुबह की
नाज़ुक धूप, वही
एक मरहम,
वही तो है
जीवन
के
लिए वरदान का अनन्य रूप, रात
चलती जाती है, धीरे - धीरे यूँ
ही गिरते संभलते हुए,
पहाड़ियों के उस
पार, वृष्टि -
छाया
का
है बंजर प्रदेश, फिर भी उसे जाना
है वहीँ, जहाँ है उसका उत्स
एवं गंतव्य शेष, दोनों
तरफ पथ के बिखरे
पड़े है नीहार -
बिंदु,
क्षितिज पे फिर खड़ा हूँ मैं रिक्त
हाथ,लेकिन एक नया बिहान
है मेरे साथ - -

* *
- - शांतनु सान्याल



 

 

दूरबीन वाले - -

जो प्रतिबिम्बों को दिखाए नग्न आँखों -
के पार ऐसा कोई अख़बार नहीं,
हर कोई अपने वजूद को
भुनाना चाहे, मोहक
जिल्द को दिखा
कर स्वार्थ
की
किताब बिकवाना चाहे, मैं वाक़िफ़ हूँ - -
तेरी नेकनीयती से ऐ दोस्त, बज़्म
में यूँ तो दिखाने के लिए बुलाता
है मुझ को, दिल ही दिल
में, शमा जलने से
पहले, तौहीन
कर के
निकलवाना चाहे, हर कोई अपने वजूद
को भुनाना चाहे। राहत कोष वाले
आए, सादे काग़ज़ पे अंगूठे का
निशान ले गए, मुद्दत हुए
सैलाब को उतरे, हम
आज भी बैठे हैं
अपने छत -
विहीन
घर के नीचे, कभी देखते हैं टूटे छत
की ओर और कभी अंगूठे को,
शायद जाते जाते वो
हमारे हिस्से का
एक मुट्ठी
आसमान ले गए, सादे काग़ज़ पे - -
अंगूठे का निशान ले गए।
 
* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 
 

 

02 सितंबर, 2020

शून्य लिफ़ाफ़े - -

कुछ बूंद ही काफ़ी हैं कोपलों के
लिए न बांधो इस तरह की
दरख़्त ठूंठ बन कर
रह जाए, उनकी
वाबस्तगी
मुझसे
इतनी न बढ़े कि दूर जाने से -
ज़िन्दगी ही इक हसीं
झूठ बन कर
रह जाए।
चाहे
जितना क्यूँ न हम टूटें अपने
अंदर, लेकिन बाहर से
जुड़ना ज़रूरी है,
कोई भी
मुड़
के नहीं देखता छूटे हुए राही -
को, अपने दर्द से ख़ुद ब -
ख़ुद उभरना ज़रूरी है।
गुलमोहर के
खिलते
ही
पतझर का आना अप्रत्याशित
नहीं, कभी अचानक उड़
जाते हैं शब्द, पत्तों
की तरह धूसर
पहाड़ के
पृष्ठों
में,
और कभी रह जाते हैं रिक्त -
रंगीन लिफ़ाफ़े हमारे
हाथों में, और
कभी कोई
ख़ुश्बू,
अनाम फूलों की तरह महकती
है, ख़ाली पड़े बेतरतीब सी,
ज़िन्दगी के बही खातों
में, कभी रहते हैं
शून्य, रंगीन
लिफ़ाफ़े
हमारे
कांपते हाथों में - -

* *
- - शांतनु सान्याल

 



   

ऊपर वाले की ज़िम्मेदारी - -

इतने ख़ेमों में बँटे हुए हैं हम
कि समझ में ही नहीं
आता कौन है
दाहिना
और
कौन है वाम, जिनके हाथों में
हो लाठियां उसी को रहता
है हाँकने का हक़,
और वही
ले
जाता है वधस्थल सरे आम।
अदालतों की अब गोया
ज़रूरत ही नहीं
सुबह शाम
चैनलों
में
बैठे होते हैं तथाकथित लोग
बन के इंसाफ़ के पुजारी,
टी आर पी के लिए है
सिर्फ़ मारामारी,
आम जनता
करे भी
क्या,
जो दिखाते हैं आप वही प्रजा
देखती है बेचारी, असल
में ये सभी हैं छुपे
हुए अफीम के
व्यापारी,
बस
एक घूँट विकास ब्रांड का - -
काढ़ा और भूल जाएं
चिंताएं सारी,
तुम मरो
या
जिओ बला से हमारी, ख़ाली
पेट योग करो और ऊपर
वाले पे छोड़ दो पूरी
ज़िम्मेदारी।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

01 सितंबर, 2020

अनजान द्वीप में कहीं - - -

इक लम्बी सी स्याह सुरंग है
हमारे दरमियां, कभी
निर्वाक देखता
हूँ मैं तुम्हें
और
कभी झाँकते हैं तुम्हारे दिल
की गहराइयों से, कुछ
शबनमी उजाले,
उन नाज़ुक
क्षणों के
सुख
बांधते हैं जीवन के जीर्ण तट -
बंध, उत्तरोत्तर खुल
जाते हैं धीरे धीरे
निःशब्दता
के सभी
गुलूबंद, फिर उसी सुरंग से -
गुज़र कर सुबह हम
उठाते हैं अपना
वही बिखरा
हुआ
शामियाना, पुनः एक अदृश्य
सेतु होती है हमारे दरमियां,
फिर जीवन नदी के
सीने में बहती
हैं स्वप्निल
पालों
की सहस्त्र कश्तियां, कदाचित
आज भी है उजान स्रोत
में कहीं जुगनुओं
की झिलमिल
बस्तियां।

* *
- - शांतनु सान्याल



  

कोई नहीं है दूर तक - -

नेपथ्य में कहीं खो गए सभी
उन्मुक्त कंठ, अब तो
क़दमबोसी का
ज़माना है,
कौन
सुनेगा तेरी मेरी फ़रियाद - -
मंचस्थ है द्रौपदी, हाथ
जोड़े हुए, कौन
उठेगा
लिए सिंह गर्जना, यहाँ तो -
ख़ामोशी का ज़माना
है। गुरु द्रोण ने
की है पुनः
घोषणा,
न
जाने किस ओर जाएंगे ये
नौनिहाल, अभी तो
स्कूल छोड़ बेच
रहे हैं वो
सब्ज़ियाँ, दो वक़्त की मिल
जाएँ कम से कम रोटियां,
न कोई स्मार्ट फोन,
न कोई
नेटवर्क, कभी आओ घुटने -
तक पतलून उठाए,
तो आप जान
जाएंगे
कितना अच्छा है विकास जी
का हाल, फिर भी वही जी
हुज़ूरी, डी एन ए में
शामिल है हमारे
मेरुदंड का
झुकना,
लिहाज़ा नहीं बदलेगी हमारी
चाल ढाल,  कितना अच्छा
है विकास जी
का हाल !

* *
- - शांतनु सान्याल     कोई नहीं है दूर तक - - video form




 
 


31 अगस्त, 2020

ज़िद्दी पल - -

मिलने को तेरे यूँ तो जां तड़पता है,
वही आँगन, वही नदी - पहाड़
का खेल, अब भी तुझे
छूने को जी मेरा
मचलता है,
वो
बारिश की बूंदे वक़्त के खपरैलों से
उतर कर, न जाने कब मेरी
उंगलियों के कोरों से
निकल कर ज़मीं
पे बिखर
गए,
सुदूर पहाड़ियों के वो साँझ बाती न
जाने किधर गए, कोलाहल में
भी रही, निरंतर एक
निभृत शून्यता,
हम जहाँ
गए
जिधर गए। स्मृतिओं का आखेट -
और प्रतिबिम्बों से लुकछुप,
जीवन भर चलता है,
कुछ पल होते
है बहुत
ही
ज़िद्दी, अनवरत रहते हैं साथ, फिर
न जाने क्यों, इन्हें खोने का
सदैव डर रहता है, खोने
पाने का सिलसिला
ताउम्र चलता
है।

* *
- - शांतनु सान्याल

राज -पथ से आधारशिला तक - -

उस हाईवे के किसी एक कच्चे मोड़
से बिछुड़ जाती है ज़िन्दगी,
कीचड़ भरे रास्तों से
हो कर हम वहां
तक पहुँचे
भी
अगर, रोक लेती है बिन पुलिया की
नदी। फाइलों में कहीं गुम है
इस गाँव का नाम यूँ
कह लीजिये
उसका
कोई
अस्तित्व ही नहीं, कालापानी की
सज़ा है यहाँ ज़िन्दगी, वैसे
तो यहाँ लोग आते हैं
कभी कभार,
लेकिन
हर
पांच साल में यहाँ लगता है मेला
अपार, टोपी पहनाने वाले
होते हैं बेशुमार, वही
घिसा पिटा
रिकार्ड,
आश्वासन के आकाशमुखी झूले -
कुछ रजिस्ट्रेड मदारी कुछ
स्थानीय जमूरे, और
तालियों के
बीच
गले में रस्सी बांध जाते हैं लोग,
राज - पथ और आधारशिला
के मध्य उम्र भर के लिए
अपना स्वार्थ साध
जाते है लोग,
गले में
रस्सी बांध जाते हैं लोग - - सिर्फ़
नाचते रहो उनकी डमरू की
आवाज़ पर - -

* *
- - शांतनु सान्याल
 

30 अगस्त, 2020

समान्तराल के पथिक - -

सभी अभिशप्त पल जी उठे सहसा
जब हमने अंतर्मन से ख़ुद को
ऊपर उठाया, न कोई
फ़लसफ़ा न कोई
पुराण पोथी,
सिर्फ
स्नेह विग्रह को हमने मन मंदिर में
बिठाया। हर एक की थी अपनी
ही वरीयता सूची, ग़र वो
भूल जाएँ हमें तो
कोई बात
नहीं,
बेकार है इस पार, उस पार फिरना,
इस भटकाव से कभी निजात
नहीं, जो बुझा पाए चाहतों
के अंतहीन दावानल,
ऐसी कोई भी
बरसात
नहीं। न कोई सराय, न कोई पांथ -
शाला, उन्मुक्त आकाश और
नक्षत्रों की आलोक माला,
समान्तराल में सभी
प्रवाहित, क्या
राज मुकुट
और
क्या तुलसी की माला - - - - - - -

* *
- - शांतनु सान्याल

ज़िंदा रूह - -

हर एक मोड़ के फ़सील पे बैठे हुए
हैं लोग, लिए हाथ में अदृश्य
फंदा, गुज़रें भी तो किस
गली से हर तरफ
हैं छुपे हुए
फ़रेब
के ख़ूबसूरत जाल, अभी अभी उस
आश्रम का फीता काट गए हैं
विधायक जी, लिहाज़ा
चुप रहना ही है
बेहतर
बहरहाल। सुना है, गहराते रात में
आती हैं रुक रुक कर उस
आलिशान बंगले से
दर्द भरी चीखें,
शायद
कोई
ज़िंदा रूह भटकती है, हम ने भी -
पड़ोसी की तरह बंद कर ली हैं
खिड़कियां और किवाड़ें,
रूह हो या कोई
ज़िंदा इंसान,
अच्छा
नहीं कि किसी और के घर हम
झाँखें।

* *
- - शांतनु सान्याल

29 अगस्त, 2020

सुबह का नज़ारा - -

उस जुलूस में हम भी थे कभी
विजय ध्वज लिए हुए, ये
और बात है कि वक़्त
बदलते ही उसने
हमें प्रवासी
बना
दिया, न छत अपनी, न कोई
पता ठिकाना, यूँ तो कहने
को सारा देश है अपना,
अपने ही घर में
हमें अवैध
निवासी
बना दिया। न जाने कौन है
वो शख़्स, टी व्ही में कहीं
देखा है, न जाने क्या
कहता है, हमें तो
कुछ भी
नहीं
समझता है, कभी ज़मीं तो -
कभी अंतरिक्ष की बातें
करता है। हमें इस
पल की चिंता
से फ़ुरसत
नहीं
मिलती, वो दूरबीन से हमें -
ख़्वाबों के ताबीर दिखाना
चाहता है, कल तक
हम ज़िंदा रहें
या न रहें,
शायद,
इसलिए वो अपनी अपरिमेय
जागीर दिखाना चाहता
है।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

सब कुछ ठीक ही है - -

यूँ तो सब कुछ ठीक ही है फिर
भी उनकी आँखों में कहीं,
इक ख़ौफ़ सा है खो
जाने का, मैं
चाहता
हूँ
उन्हें छूना, रूह से महसूस - -
करना, शायद उन्हें डर
है मेरा हो जाने का।
यूँ तो सब कुछ
ठीक ही है
फिर
भी न जाने क्यूँ अंतरंग दोस्त
तकते हैं बड़ी पुरअसरार से,
असल में हर शख़्स है
यहाँ, शहद का
तलबगार,
लेकिन
चाहते हैं बचना मधुकोष के - -
शिकार से। यूँ तो सब कुछ
ठीक है लेकिन एक
मुद्दत से बैठा
हुआ हूँ
मैं,
परछती के नाज़ुक किनारे, वो
निःशब्द हटा ले गए सभी
निसेनी नज़र बचा के,
कह गए ऊपर ही
रहो ख़ुदा के
सहारे।
यूँ तो सब कुछ ठीक है फिर भी
टेलीविज़न बन चला है ख़ुद
मुख़्तार, न कोई चश्मदीद,
न ही कोई ज़िरह की
उम्मीद, सबूत
ही नहीं
फिर
भी ज़माने के नज़र में आप हैं
गुनाहगार, फिर भी यहाँ
सब कुछ ठीक है।

* *
- - शांतनु सान्याल
 

28 अगस्त, 2020

असमाप्त यात्रा - -

उन निस्तब्ध क्षणों में जब मध्यरात्रि हो
मुखरित, निशिगंधा खोलें संवृत गंध
चक्र, और ईशान कोणीय मेघ
बरसे बूंद बूंद, उष्ण श्वास
के मरू प्रांतर तब हो
जाएँ अपने आप
सुरभित।
उन
अकृत्रिम क्षणों में जीवन चाहे शाश्वत - -
अनुबंधन, न नारी, न पुरुष, न
जन्म नहीं मृत्यु, न प्रेम न
कोई घृणा, न लौकिक
नहीं अलौकिक,
केवल
आलोक स्रोत में सुदूर द्वीपान्तर, - - -
परस्पर देह प्राण का सम्पूर्ण
विलयन, उन अकृत्रिम
क्षणों में जीवन
चाहे शाश्वत -
अनुबंधन।

* *
- - शांतनु सान्याल 
 

प्रभावहीन स्पर्श - -

पूर्णता जीवन को नष्ट कर जाता
है, यही वजह थी शायद सब
कुछ आधे अधूरे ही रहे,
तुम्हारे स्पर्श में
था कहीं
मालिन्य, या मेरी देह थी कोई
विस्मृत जीवाश्म, न तुम
बने पारस - मणि, न
मुझे ही मिला
कायांतरण,
सब कुछ था निरुद्देश्य चाहतों
का आरोहण। अरगनी की
तरह है मेरा वजूद,
रख दें जो भी
चाहें, मैंने
मूँद
लिए हैं अपनी आँखें, हाँ आईने
का ज़ामिन है बहुत मुश्किल,
वो आप जाने या आप
का ख़ुदा
जाने - -

* *
- - शांतनु सान्याल

रंग मशाल की तलाश -

शब्दों की अबूझ पहेलियों में अक्सर
मैं तुम्हें ढूंढता हूँ गुमशुदा कड़ी
पाने के लिए, इक मुद्दत
से है दिलों में तमस
घना, भटकता
हूँ रंग -
मशाल की लड़ी पाने के लिए। उस -
पार, कोहरे की वादियों में है
कहीं सुबह की प्रथम
रौशनी, उड़ान
पुल के
नीचे ढूंढता हूँ मैं अधखिली, निरीह
सी ज़िन्दगी, गुज़रते हैं मेट्रो
ट्रेन, विलासपूर्ण महंगी
कारें, सुरभित स्त्री -
पुरुष, मेरी
आँखों
में तो राख रंग के सिवा कुछ भी नहीं,
उम्र के उतरन में फिर वही हैं
धूसर ख़्वाब के पैबंद,
अनंत क्षुधित दिनों
के टांके, और
अशेष
जीने की अनबुझ तिश्नगी, पथराई
आँखों में धुंध की तरह तैरती
है ये ज़िन्दगी।

* *
- - शांतनु सान्याल

27 अगस्त, 2020

किनारों के उस पार - -

घनीभूत हैं कुछ बूंद अभिमानी,
कुछ टूटे हुए रंगीन पेन्सिल,
कुछ अनकही बातों के
छायापथ, सर्पिल
आवेग के
मध्य
अहर्निश, वही प्रस्तर युगीन - -
एक ही कहानी। सभी
के लिए है केवल
वही एक
विस्तीर्ण नीलाभ छत, फिर - -
इतने स्तम्भ और दीवारें
किस लिए, जन्म -
मरण के
लेखाचित्र वही चिरंतन, एक - -
ही नदी के फिर इतने
सारे किनारे किस
लिए।

* *
- - शांतनु सान्याल


 

ताज़ा उच्छ्वास - -

छिन्न ह्रदय ले के यथापूर्व रात ढल -
गई, बहुत कुछ कहना था उसे,
ज्योत्स्ना के स्रोत में  यूँ
ही अविरल बहना
था उसे, शेष
प्रहर में
फिर मेघ गहराए, फिर एक मुलाक़ात
विफल गई, यथापूर्व रात ढल गई।
बिखरे हैं वीथि के गोद में कुछ
अनाम फूल, अनंत मेघदल
थमे से हैं नयन के कूल,
सुरभित वो सभी
प्रतिश्रुतियाँ
हैं अब
दीर्घ निःश्वास, अविरत शून्यता हैं -
आसपास, फिर भी है जीवन
अग्रसर अनायास, पुनः
समय का हिंडोला
घूमता हुआ,
फिर
फेंको कोई रेशमी रुमाल कहीं से, उठा
ले ये जीवन फिर एक ताज़ा
उच्छ्वास, अविरत
शून्यता में भी
रहो तुम
मेरे
पास, जीवन यूँ ही अग्रसर रहे - - - - -
अनायास।

* *
- - शांतनु सान्याल 

26 अगस्त, 2020

लौटना है असमंभव - -

उस गहन निशीथ से अब लौटना है
असमंभव, छूट गए न जाने
कितने सांध्य प्रदीप,
बिखरे हैं सागर
तट कुछ
पद -
चिन्ह हमारे और कुछ निष्प्राण सीप,
अब जहाँ हैं, वहां दूर तक है घना
छायावृत, शब्दहीन, लापता
हैं दुनिया के कलरव।
यहाँ से लौटना है
असमंभव।
निःशर्त
कुछ
भी नहीं होता हमें न समझाओ नई
परिभाषा, वही चिर विनिमय,
वही मौन अभिनय, वही
सुप्त अभिलाषा, न
जिलाओ हमें
दे कर,
पुनः शापमुक्ति का झांसा, न - -
समझाओ जीवन की नई
परिभाषा।

* *
- - शांतनु सान्याल

शायद सुन रहे हो तुम - -

तुम्हारे वादों में ख़ुदकुशी के सिवा कुछ
भी नहीं, मालूम है हमें मौत खड़ी
है दहलीज़ पे, फिर भी बाहर
तो निकलना ही पड़ेगा
जीने के लिए,
कोई नहीं
था
साथ, जब हम दर ब दर भटके, नहीं
चाहिए तुम्हारा मायावी हाथ
फिर ज़हर पीने के लिए |
वही टूटी चप्पलें,
वही बिखरे
हुए
जिस्म के टुकड़े, हमें याद है सभी फिर
भी हर हाल में जाना होगा, ज़िन्दगी
के लिए उन्हीं राहों में अपना
ख़ून,पानी की तरह
बहाना होगा |

* *
- - शांतनु सान्याल 



कहीं वृष्टि वनों के पार - -

उस अंतिम मोड़ पे कहीं था शायद
मेरे इक जां अज़ीज़ दोस्त का
घर, बहोत सीधा साधा,
जो खोजता था
स्कूल की
खिड़कियों के पार तितलियों का - -
शहर, बादलों का ठिकाना,
निझुम पर्वतों में
छुपे हुए
जुगनुओं का आशियाना, और इसी
खोज ने उसे छोड़ दिया बहुत
पीछे, वक़्त के साथ
लोग बदलते
गए, वो
आज भी न जाने क्या ढूंढता है - -
अतीत के पन्नों में अपना
पता पूछता है, वो कल
भी अकेला था वो
आज भी
तन्हां है, फिर भी ख़ुश है अपनी
दिल की गहराइयों में, क्या
हुआ ग़र ज़माना उस
से ना आशना
है, ये
ज़रूरी नहीं सिर्फ़ तुम्हारे पैमाने
से ज़िन्दगी संवारी जाए,
कभी कभार क्यों न
ज़मीर के लिए
जीत के
बाज़ी हारी जाए - -

* *
- - शांतनु सान्याल 

25 अगस्त, 2020

सजल प्रतिबिम्ब - -

इस जहाँ में कोई शख़्स नहीं, जो न
करे ख़ुद की नुमाइश, हर कोई
चाहे आसानी से हर चीज़
को हासिल करना, ये
दौर है इंतहां,
ख़रीद -
फ़रोख़्त का, हर हाल में है कोशिश,
ख़ुद को अग्रता में शामिल
करना। बहोत मुश्किल
है चाहतों का जल -
रंग छवि होना,
मेरी
तुलिकाओं के तो रंग देहाती हैं - -
आसां नहीं बाज़ार में उसका
हावी होना, लिहाज़ा
मेरे हाथों में दो
बूंद शबनम
के सिवा
कुछ
भी नहीं, मेरा हासिल है तेरी आँखों
का प्रतिच्छवि होना।

* *
- - शांतनु सान्याल   


  

अंदर का आदमी - -

किस अदा से उसने भूख को
इक बिमारी में बदल
दिया, फिर एक
मौत का
कोई
दस्तावेज़ न रहा, मंदिर हो -
या मस्जिद यूँ ही उजड़ते
बसते रहे, जो उजड़
गए खिलने से
पहले उनका
कहीं
कोई उल्लेख न रहा। सिर्फ़
पोशाक के रंग बदल
गए, अंदर से वो
आज भी
बर्बर
से कम नहीं, हम आज भी
हैं अपने ही देश में एक
ख़ानाबदोश, वो
आज भी
किसी
विषाक्त तरुवर से कम -
नहीं, वही अंतहीन,
बेरंग है हमारी
ज़िन्दगी
का
सफ़र, हम जहाँ थे वहीँ -
रह गए खुले आसमां
के नीचे, न गाँव
कोई, न रहा
अपना
कोई रौशनी का शहर। - -

* *
- शांतनु सान्याल  


  

24 अगस्त, 2020

अल्बम के पृष्ठों में कहीं -

जनशून्य प्लेटफॉर्म, आखरी ट्रेन भी
जा चुकी, न किसी का इंतज़ार,
न ही कोई मिलन बिंदु की
तलाश, दूर तक कुछ
है तो सिर्फ़ यादों
की परछाइयां,
ज़िन्दगी
के धूप - छाँव, नोक - झोंक, हार -
मनुहार, कुछ पल जो होते हैं
सिर्फ़ एहसास के लिए,
तुम और मैं और
वो टूटी हुई
बेंच,
निःस्तब्ध रात्रि, धुंध भरी राहों में
जब तलाशते रहे हम कुछ
ख़ुशी की गहराइयाँ,
सुदूर ऊंघती सी
सघन  नील
पहाड़ियों
में टिमटिमाते थे कुछ चिराग़, या
उभर चली थीं जुगनुओं की
बस्तियां, सुरमयी अँधेरे
में, और भी ख़ूबसूरत
लगीं तुम्हारी
डूबी - डूबी
सी वो 
आँखें, जिन्हें देख जी उठे थे उस -
पल, सभी बेजान सी वादियां,
इक मख़मली छुअन की
तरह रहती है रूह के
बहोत अंदर
ख़ुश्बुओं
से
लबरेज़, हमारी मुद्दतों पुरानी वो
अप्रकाशित कहानियां, दूर तक
कुछ है तो सिर्फ़ यादों की
परछाइयां।

* *
- - शांतनु सान्याल

आकाशमुखी उड़ान - -

उन पिघलते पलों में कहीं खुलते हैं
पुष्पदल, और गहरी सांसों में
उठते हैं सहस्त्र गंधकोष,
उन्हीं अनाहूत क्षणों
में होता है कहीं
जीवन का
नव -
रूपांतरण, एक अभिनव उड़ान का
उद्घोष। जब टूट जाएँ सभी
दैहिक कांच के आवरण,
पिंजर से मुक्त
तभी हो
पंछी
निर्मेघ गगन की ओर, अट्टालिकाएं
न उसे रोक पाएं, न कोई वज्र
की ज़ंजीर, आकाशमुखी
जब हो आवाहन,
कोई न रोक
पाए तब
मुक्ति
युद्ध के आमंत्रण। उन पलों में मिट -
जाएँ सभी दिलों के फ़ासले, जब
हर कोई गाए एक ही सुर में
विजय गान, चाहे जिस
गली कूचे से कोई
निकले दिलों
में न रहे
कोई
शून्य स्थान।

* *
- - शांतनु सान्याल


 



पारदर्शी आसमान - -

उँगलियों के नोक से कभी भीगे
कांच की खिड़कियों में मेरा
नाम लिखना, उड़ते
बादलों को मेरा
सलाम
कहना, मैं अभी भी हूँ शून्य में
तैरता हुआ, तुम्हें ग़र मिल
जाए सितारों का जहाँ,
मेरे बिखरने की
कहानी
तमाम कहना। मैं जहाँ हूँ वहां
रौशनी आती नहीं उन्मुक्त
हो कर, ताहम ज़िन्दगी
को तलाश है एक
रोशनदान की,
ज़मीं को
तो बाँट लिया लोगों ने धर्म -
अधर्म की हदों में, जो न
देखे विभेदन की
दूरबीन से,
मुझे
तलाश है उस पारदर्शी - - -
आसमान
की।

* *
- - शांतनु सान्याल 

  

23 अगस्त, 2020

बहुरूपियों का अधिनायक - -

हर एक मोड़ पर हैं बहुरूपी, कोई
हनुमान बने बैठा है और
कोई महा काली,
कोई चंदन
लिए
फिरता है कोई जनता को लगाए
चूना, सरकार की जेब करे
ख़ाली। दूर काँस वन
पार इक पहाड़ी
नदी बहती
है, मैं
वहां अक्सर उसे तलाश करता हूँ
जो मेरे अंतरतम में रहती है।
हर शख़्स है यहाँ मृग -
तृषा का शिकार,
मुखौटे और
चेहरे में
फ़र्क़ नहीं कर पाता, और फिरता
है उम्र भर यूँ ही निर्विकार।
हर एक रेड - सिग्नल
पर हूँ मैं शून्य
हाथ बढ़ाए
हुए,
शीशों के पार हो तुम, हर एक - -
हरित भूमि पे नज़र गड़ाए
हुए। जो दिन में ठाकुर
जी की डाली लिए
हुए फिरता
है, वही
सांझ ढले अंध गली से चल कर
ठेके में मुझसे मिलता है।
और वो चूना वाला,
असल में सभी
बहुरूपियों
का अधिनायक है,तिहत्तर  - -
सालों से वही एकमात्र
उन्नयन का बड़ा
परिचायक है।

* *
- - शांतनु सान्याल

,

अंतःनील अनुराग - -

उन्हीं अश्रु बूंदों में है छुपा कहीं जन्म -
रहस्य, उन्हीं आँखों के प्रतिबिम्ब
में है तैरता नग्न शैशव और
उन्हीं सुप्त आँखों में है
विश्रृंखल जीवन का
अंतःनील, उन्हीं
हाथों में है
परम
सुख, उसी अंचल में है समाया लुप्त
मरू सलिल। तुम हो चाहे कोई
महत पीठाधीश या अजेय
अधिपति, बन जाओ
क्यों न महा -
मानव
फिर
भी तुम हो उसी गर्भगृह के असहाय
भ्रूण, उसी अंधकार गुफा से है
तुम्हारी उत्पत्ति, उन्हीं
अश्रु बूंदों में है निहित
पृथ्वी की अशेष
ख़ूबसूरती,
जन्म -
मृत्यु की पुनरावृति - - - - - - - - - -
* *
- - शांतनु सान्याल 

हासिए से उभरते लोग - -

अशांत सागरों के जल समीर थे वो
जो मरू वक्षों में सिंचन करते
रहे, ख़ुद को उजाड़ कर
के, केवल देश हित
का चिंतन
करते
रहे। न जाने कहाँ गए वो लोग - -
जिन्होंने की थी समभाव की
परिकल्पना, नहीं देखा
था उन्होंने कभी
ऐसे मेरुदण्ड
विहीन
समाज का सपना। हर तरफ क्यों
आती है ज़ंजीर की आहट, क्यों
लोग लोग भूल चले हैं अब
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ पुर -
ज़ोर सवाल
उठाना,
अब भी है हर तरफ़ गहरा अंधकार,
ये कैसा अदृश्य सम्मोहन है
हमारे आसपास, क्यों
भूल चले हैं लोग
हाथों में
नए सुबह के लिए मशाल उठाना।

* *
- - शांतनु सान्याल 

22 अगस्त, 2020

इबादत कर के देखेंगे - -

आज फिर तेरी इबादत कर के देखेंगे,
अब इल्ज़ामों से हमें ख़ौफ़ नहीं
होता, कि कौन है बुत और
कौन निराकार देवता,
तेरी निगाह में
है अगर
दो
बूंद ज़िन्दगी की, सारी  दुनिया से - -
हम अदावत कर के देखेंगे,
लोग कहते हैं कि दोनों
जहान मिल जाते हैं
सजल आँख के
अन्तःस्थल
में, चलो
फिर
आज तुमसे आख़री मुहोब्बत कर के
देखेंगे, फिर सजने को है इक
बार मजलिस ए आसमां,
आख़री पहर, तेरे
पहलू में, हम
भी गुले -
शबाना के मानिंद शिरकत कर के - -
देखेंगे, आज फिर तेरी इबादत
कर के देखेंगे।

* *
- शांतनु सान्याल


   

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